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जिला अस्पताल में रखी ब्लड सेपरेशन मशीन (प्लेटलेट्स) 4 साल से पड़ी है बंद

  • उलझन : मशीन चालू होती तो 32 मरीजों को नहीं भेजना पड़ता बाहर
  • – लायसेंस के लिए निरीक्षण करने एक साल से नहीं आ रही मुंबई से टीम
  • – एक लैब टेक्नीशियन को ट्रेनिंग भी दे दी, अब इसी माह आ सकती है टीम

मंदसौर। बीते साल में डेंगू के 32 मरीजों को प्लेटलेट्स की कमी पर अब इंदौर, बड़ौदा, अहमदाबाद या अन्य जगह रेफर नहीं करना पड़ता, अगर चार साल से जिला अस्पताल में रखी ब्लड सेपरेशन मशीन चालू हो गई होती। राज्य शासन द्वारा जिला अस्पताल को दी गई 35 लाख की ब्लड सेपरेशन मशीन अभी भी सरकारी मकड़जाल में ही उलझी है। इसके भेजने वाली भी सरकार, लायसेंस देने वाली भी सरकारी संस्था और चलाने वाले भी सरकार के आदमी फिर भी चार साल में एक बाद भी मशीन का उपयोग नहीं हो पाया है। मशीन संचालन के लिए लैब टेक्नीशियन को एक साल की ट्रेनिंग लिए भी फरवरी में एक साल पूरा हो गया। पर मुंबई से लायसेंस से आने वाले सरकारी अधिकारियों को अभी तक समय नहीं मिल पाया है। अब उम्मीद है कि इसी माह में कभी भी निरीक्षण के लिए अधिकारियों की टीम आ सकती है।

जिला अस्पताल में एलाइजर एनएस-1 और मेक एलाइजर टेस्ट की सुविधा मौजूद है, लेकिन जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेशन मशीन की सुविधा नहीं होने के कारण डेंगू के मरीजों को इंदौर या अन्य जगह पर रैफर करना पड़ रहा है। डेंगू के मरीज को रक्त प्लेटलेट्स चढ़ाना होते है और रक्त में से प्लेटलेट निकालने का कार्य ब्लड सेपरेशन मशीन करती है। इसके लिए जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेशन मशीन शासन ने चार साल पहले ही अस्पताल में भेज दी थी। मशीन को रखने के लिए जगह नहीं मिल पाने और लायसेंस नहीं मिलने से अब तक मशीन शुरू नहीं हो पाई। रक्त लैबोरेटरी कक्ष के समीप ही ब्लड सेपरेशन यूनिट बनाई गई है वहां पर मशीन लगाई गई है। मशीन को शुरू करने के लिए जिला अस्पताल प्रबंधन ने ऑनलाइन आवेदन 14 माह पहले कर दिया था पर लाइसेंस देने वाले केंद्र के खाद्य एवं औषधि विभाग के अधिकारियों को फुर्सत ही नहीं है। मशीन शुरू होते ही डेंगू सहित अन्य बीमारियों के मरीजों को राहत मिलेगी। ब्लड सेपरेशन में लगने वाली मशीनों के संचालन के लैब टेक्नीशियन राजेंद्र शर्मा मार्च 18 में एक वर्ष की ट्रेनिंग भी पूरी कर चुके हैं।

40 प्रतिशत से अधिक जलने वाले मरीजों को करना पड़ता है रैफर

जनवरी 2015 से अब तक जिले में डेंगू के 64 मरीज मिले है। डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स की जरूरत होती है। इसके लिए ब्लड सेपरेशन मशीन नहीं होने के कारण मरीजों को बाहर रेफर करना पड़ रहा है। बाहर ले जाने और वहां उपचार पर खर्च होता है। इसके साथ ही बर्न के मरीजों को भी बाहर नहीं जाना पड़ेगा। पैथालॉजिस्ट डॉ. सौरभ मंडवारिया ने बताया कि बर्न के मरीजों को प्लाज्मा की जरूरत होती है मशीन चालू होती है तो प्लाज्मा जिला अस्पताल में ही हो जाएगी। अस्पताल में प्रतिमाह औसतन 5-6 केस बर्न (जलने) के आते है। इनमें से 40 प्रश से अधिक जले मरीजों को बाहर रेफर करना पड़ता है। ब्लड सेपरेशन यूनिट शुरू होने से एनीमिया सहित अन्य रोगों के मरीजों को भी सुविधा मिलेगी।

मशीन चलवाकर देख चुके है अधिकारी

जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेशन मशीन प्रारंभ करने से पहले अधिकारियों ने मशीन चलवाकर देखी है। सिविल सर्जन डॉ. एके मिश्रा ने बताया कि लैब टेक्नीशियन राजेंद्र शर्मा को सुपरवाइजर बनाया जाएगा, उनके साथ टेक्नीशियनों की टीम रहेगी।

– मशीन को चालू करने का लायसेंस देने व जगह का निरीक्षण करने मुंबई से खाद्य एवं औषधि प्रशासन वाले आते हैं। एक लैब टेक्नीशियन की ट्रेनिंग भी मार्च 2018 में पूरी हो गई। इस बार लायसेंस देने से पहले निरीक्षण के लिए 13 फरवरी को आने की संभावना है। वह देखेंगे कि मशीने कैसी है? काम कर रही है या नहीं? – डॉ. सौरभ मंडवारिया, आरएमओ, जिला चिकित्सालय।

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