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डे केअर सेन्टर पर वरिष्ठजनों की विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ

राह कांटोें से भरी है कुशलता से गुजरना है- रमेशचन्द्र चन्द्रे

मन्दसौर। अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस एक अक्टोबर के अवसर पर पं. दीनदयाल उपाध्याय वृद्धजन सेवा केन्द्र मंदसौर पर सेवानिवृत्त महासंघ अध्यक्ष श्री श्रवण कुमार त्रिपाठी, सीनियर एडवोकेट परशुराम पाटीदार, वरिष्ठजन रामप्रसाद व्यास एवं शिक्षाविद् रमेशचन्द्र चन्द्रे के सानिध्य में ‘‘वृद्धजनों की समस्याएं एवं समाधान’’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ।
इस अवसर बोलते हुए श्री चन्द्रे ने कहा कि, वृद्धजनों की सबसे बड़ी समस्या अपनों का व्यवहार और तिरस्कार है। सूझबूझ से इस समस्या का हल स्वयं वृद्धजन ही कर सकते है। अपनों से अधिक अपेक्षा न करते हुए परिवार के अन्य सदस्यों को अधिक टोका टकी न करते हुए, स्वयं को समाज एवं देश हित के कार्यों में व्यस्त रखें तो मंजिल आसान हो सकेगी क्योंकि ‘‘राह कांटों से भरी है कुशलता से गुजरना है।’’
ओमप्रकाश मिश्रा ने कहा कि ‘‘बाप का घर बेटे का हो सकता है किन्तु बेटे का घर बाप का नहीं हो सकता। आखिर क्यों ?
वासुदेव त्रिपाठी ने कहा कि जीवन में तीन वृद्धजनों का सहयोग करें तथा शेष लोगों को भी तीन उपकार करने के लिये प्रेरित करे।
आर्य समाज पुरोहित रमेशचन्द्र राव ने कहा कि वृद्धावस्था आती है लेकिन अकेले नहीं जाती, साथ ले जाती है। हमें बिगड़ेल किरायेदार के अनुसार मुंह बिगाड़ते हुए नहीं बल्कि खुशी खुशी साथ जाना चाहिये।
सत्यनारायण पंचारिया ने कहा कि जीवन में परिवार को समय दिया और काम समय पर किया तो परिवार भी आपको समय देगा।
मोहनलाल गुप्ता ने कहा कि जो व्यक्ति परिवार के साथ रहा तो परिवार उसके साथ रहेगा। इसके अलावा समाज एवं महासंघ के अधिक से अधिक लोगों से सम्पर्क करके खुशी महसूस करता हूॅ।
अम्बालाल चन्द्रावत ने कहा कि जहां समस्या होती है वहीं समाधान मिलते है। जरूरत है उनको पहचानने की क्योंकि वृद्धजन अपने पुराने अनुभवों को प्रसाद की तरह बांटे तो सब लेंगे, परोपकार सबसे बड़ा पुण्य और परपीड़ा सबसे बड़ा पाप है। यही बात 18 पुराणों के माध्यम से समझाई गई है।
रामप्रसाद व्यास ने कहा कि सुख-दुख गाड़ी के दो पहिये है, चुप रहना और सहन करना सबसे बड़ा मंत्र है। घर पर ज्यादा समय रूकना भी घर वालों पर बोझ जैसा है।
परशुराम पाटीदार ने कहा कि वृद्धावस्था के लिये कुछ समय अवश्य बचाकर रखे जाना चाहिए। ये विचार इंग्लेण्ड की महारानी ने एक साक्षात्कार में कहा था क्योंकि वृद्धावस्था एक गिरती दिवार है, जिसके पास कोई खड़ा रहना नहीं चाहता।
महासंघ जिलाध्यक्ष श्रवण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि सेवाकाल में हमारा समय घर से बाहर गुजरा है। इसलिये सेवानिवृत्ति के बाद हमारा घर पर ही रहना घर वालों को मान्य नहीं होता है। वहीं हमारी निष्क्रियता बड़ती है। डे केअर सेंटर इस समस्या का सुन्दर समाधान है। यहां पर आए तो अपने हम उम्र के साथ बातचीत, खेल एवं व्यवहार आपकी जिन्दगी की दिशा बदल देंगे।
सचिव नन्दकिशोर राठौर ने कहा कि लम्बी उम्र से अधिक महत्वपूर्ण है छोटी सी जिन्दगी। कुछ लोग छोटी उम्र में भी अधिक जी लेते है तो कुछ पूरी उम्र मेें थोड़ी जिन्दगी ही जी पाते है। बुढ़ापा भी आनंद से पूर्ण हो सकता है। यदि हम अपने लिये भी जिये, संतुलित खाए, रिश्तों को निभाएं, मित्रों को समय दें, देवदर्शन करें, सामाजिक सक्रियता बढ़ाए, बच्चों को प्यार एवं युवाओं को दुलार, हम उम्र का सत्कार, तभी होगा हमारा बेड़ा पार।
गोष्ठी में राजेन्द्र पोरवाल, नवनीत ढाबी, नरेन्द्र राणावत, सत्यनारायण श्रीवास्तव, ओमप्रकाश श्रीवास्तव, हरिशंकर शर्मा, अशोक क्षोत्रिय, राउत, राजेन्द्र पाठक, श्री अरोरा ने गोष्ठी में सहभागिता की। गोष्ठी का निष्कर्ष वृद्धजनों को एक दिन के हार फूल के बजाय सम्मान के साथ घर एवं समाज में सहयोग, उचित व्यवहार एवं एकांकी पन से मुक्ति, पोते-पोतियों का लाड़ प्यार एवं थोड़ी सी आर्थिक आजादी दीर्घ जीवी बना सकती है।

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