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भारतीय ध्वज संहिता, तिरंगे के कानून, उसका अपमान और इतिहास

15 अगस्त 1947 वह दिन जब हिंदुस्तान अंग्रेजी की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आजाद हुआ था। हर साल हम इसी दिन 15 अगस्त या स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। राष्ट्रीय ध्वज-तिरंगा भारत के राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। तिरंगे पर हर भारतीय को दिल गर्व है। तिरंगे की शान को बरकरार रखने के लिए हर भारतीय अपनी जान को दांव पर लगा देता है। हर स्वतंत्रता दिवस पर हर भारतीय प्रधानमंत्री लालकिले से झंडा फहराते हैं। लेकिन 15 अगस्त, 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। जवाहर लाल नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लालकिले से झंडा फहराया था।

सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज तिरंगा संहिता-2002 में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-2002 को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है। ज्ञात हो कि 15 अगस्त भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस है। दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आज़ाद हुआ। ब्रिटेन से बहरीन 15 अगस्त, 1971 को और फ्रांस से कांगो 15 अगस्त, 1960 को आज़ाद हुआ।

भारतीय ध्वज संहिता भारतीय ध्वज को फहराने व प्रयोग करने के बारे में दिये गए निर्देश हैं। इस संहिता का आविर्भाव २००२ में किया गया था। भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-२००२ में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-२००२ को २६ जनवरी २००२ से लागू किया गया है।

  • जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  • सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।
  • झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।
  • झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।
  • फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।
  • झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
  • किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।
  • झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।
  • जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।

 

जनिये तिरंगा फहराने का सही तरीका।

1-जब भी तिरंगा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहां से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे। सरकारी भवन पर तिरंगा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।
2-तिरंगे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि तिरंगे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए। तिरंगे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुंह श्रोताओं की ओर हो तो तिरंगा उनके दाहिने ओर हो।
3- जब तिरंगा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो भी तिरंगे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए। फटा या मैला तिरंगा नहीं फहराया जाता है। जब तिरंगा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।
4- तिरंगा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए। तिरंगा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
5-किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय तिरंगे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा। तिरंगे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

फ्लैग कॉड ऑफ़ इंडिया के अनुसार प्लास्टिक का झंडा फहराने की मनाही है. झंडा सिर्फ कॉटन, सिल्क या खादी का होना चाहिए। फहराया जाने वाला झंडा क्षतिग्रस्त ना हो। इतना ही नहीं झंडे का आकार रेकटगल और अनुपात 3:2 होना चाहिए।

इसके अलावा झंडे का इस्तेमाल यूनिफार्म पर सजावट के सामान के लिए किया जाना भी गलत है। भारतीय ध्वज सहिंता के अनुसार झंडा जमीन से छूना नहीं चाहिए। ऐसे ध्वज को फहराया जाना भी इस क़ानून के अनुसार अपराध है जिसका रंग उड़ चुका हो।

बता दें कि ऐसा करने पर जेल भेजे जाने का प्रावधान है. जिसे जुर्माने सहित 3 साल तक के लिए बढ़ाया भी जा सकता है।

तिरंगे का अपमान-
– फलैग कोड ऑफ इंडिया के तहत झंडे को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाएगा।
– उसे कभी भी पानी में नहीं डुबोया जा सकता।
– प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एकट-1971की धारा-2 के अनुसार ध्वज ओर संविधान के अपमान करने वालों के लिए कड़ा कानून है।
– तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहन लेना भी गलत है। अगर कोई व्यक्ति कमर के नीचे तिरंगा बनाकर कोई कपड़ा पहनता है तो ये भी सरासर तिरंगे का अपमान है।

जानें कब-कब किस-किसने किया हमारे राष्ट्र ध्वज का अपमान-
– 1994 में मिस यूनिवर्स बनने के बाद सुष्मिता सेन ने दिल्ली के एक घोड़ाबग्गी में तिरंगे को बग्गी के पीछे बांधा था, जिसे लेकर मामला दर्ज हुआ था।
– साल 2000 में इंडियन फैशन वीक के दौरान फैशन डिजाइनर मालिनी रमाली पर तिरंगे के अपमान का केस दर्ज किया गया था।
– नवीन जिंदल की सात साल की चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साल 2004 में सभी भारतीयों को साल के किसी भी दिन तिरंगा फहराने का मौलिक अधिकार दे दिया।
– साल 2011 में अभिनेत्री मंदिरा बेदी ने तिरंगे की बॉर्डर वाली साड़ी पहनी थी, जिसे तिरंगे का अपमान करार देते हुए मामला दर्ज किया गया था।
– साल 2011 में सचिन तेंदुलकर के खिलाफ तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ कयोंकि उन्होंने तिरंगे वाला केक काटा था।
– साल 2011 में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हुआ था। कयोंकि उन्होंने तिरंगे के नजदीक अपने पैर रखे थे।
– साल 2012 में क्रिकेट वल्र्ड कप के दौरान किंग शाहरूख खान ने उल्टा झंडा लहराया था, जिसके बाद उन पर केस दर्ज हुआ था।
– साल 2014 में मल्लिका शेरावत ने तिरंगा पहनकर गाड़ी के बोनेट पर तस्वीर खिंचवाई थी, जिसके बाद उन पर भी केस दर्ज हुआ था।

तिरंगे का इतिहास
* हम 2 दिनों बाद आजादी की 70वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं. 15 अगस्त के दिन प्रत्येक भारतीय तिरंगे को सम्मान देता है. हर सड़क-मकान की छत पर तिंरगा लहराता नजर आता है. हर भारतीय को तिरंगा अपनी जान से भी अधिक प्यारा होता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं तिरंगे के इतिहास के बारे में. आगे की स्लाइड्स में जानें क्या है हमारे तिरंगे का इतिहास!
* 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान चौक में इस झंडे को फहराया गया था. इस झंडे में तीन पट्टियां थीं. जिनका रंग हरा, पीला और लाल था और इस झंडे के बीच में पीली पट्टी पर वन्देमातरम लिखा हुआ था. पहला झंडा 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था. 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था. इस झंडे को लाल, पीले और हरे रंग की पट्टियों से बनाया गया था. ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए थे. बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम लिखा गया था.
* 1907 में पेरिस में मैडम बीकाजी कामा ने झंडा फहराया था. ये झंडा पहले झंडे से अलग था. इस झंडे में सबसे केसरिया, पीला और हरा रंग था. पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निकाले गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. कुछ लोगों की मान्यता है कि दूसरा झंडा पहले झंडे जैसा ही था. सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे.
* तीसरे झंडे को 1917 में मान्यता दी गई. ये झंडा कुछ इस तरह दिखाई देता था. डॉ॰ एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तीसरे झंडे को फहराया. इस झंडे में 5 लाल और 4 हरी पट्टियां थीं. सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे. ऊपरी किनारे पर बायीं ओर यूनियन जैक था. एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था.
* 1921 में हरे और लाल रंग के झंडे को गैर आधिकारिक ढ़ग से मान्यता दी गई. इस झंडे में हरे और लाल के साथ एक बड़ा सा चरखा भी था. कांग्रेस के सत्र बेजवाड़ा में इसे प्रदर्शित किया गया था. आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया. यह दो रंगों का बना था. लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्वं करता था. गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए.
* वर्ष 1931 तिरंगे के इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष है. तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय झंडे के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली. यह झंडा केसरिया, सफेद और बीच में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था. यह भी साफ तरह से बताया गया था कि इसका कोई साम्प्रदायिक महत्त्व नहीं होगा.
* 22 जुलाई 1 9 47 को संविधान सभा ने वर्तमान झंडे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया. आजादी मिलने के बाद इस झंडे के रंग और उनका महत्व बना रहा. लेकिन झंडे में चलते हुए चरखे की जगह सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दे दिया गया. इस तरह कांग्रेस पार्टी का तिरंगा स्वतंत्र भारत का तिरंगा बना गया.

झंडे का सम्मान
भारतीय कानून के अनुसार ध्वज को हमेशा ‘गरिमा, निष्ठा और सम्मान’ के साथ देखना चाहिए। “भारत की झंडा संहिता-२००२”, ने प्रतीकों और नामों के (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, १९५०” का अतिक्रमण किया और अब वह ध्वज प्रदर्शन और उपयोग का नियंत्रण करता है। सरकारी नियमों में कहा गया है कि झंडे का स्पर्श कभी भी जमीन या पानी के साथ नहीं होना चाहिए। उस का प्रयोग मेज़पोश के रूप में, या मंच पर नहीं ढका जा सकता, इससे किसी मूर्ति को ढका नहीं जा सकता न ही किसी आधारशिला पर डाला जा सकता था। सन २००५ तक इसे पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता था। पर ५ जुलाई २००५, को भारत सरकार ने संहिता में संशोधन किया और ध्वज को एक पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग किये जाने की अनुमति दी। हालांकि इसका प्रयोग कमर के नीचे वाले कपडे के रूप में या जांघिये के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज को तकिये के रूप में या रूमाल के रूप में करने पर निषेध है। झंडे को जानबूझकर उल्टा, रखा नहीं किया जा सकता, किसी में डुबाया नहीं जा सकता, या फूलों की पंखुडियों के अलावा अन्य वस्तु नहीं रखी जा सकती। किसी प्रकार का सरनामा झंडे पर अंकित नहीं किया जा सकता है।

Post source : Source Wikipedia

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