तिहाड़ जाना चाहता हूं मैं

तिहाड़ जेल को लेकर बीते दो दिन से मेरे मन में कुछ चल रहा है। इस जगह के बारे में बरसों पहले तब कौतूहल जागा था, जब आईपीएस रहते हुए किरण बेदी ने यहां के हालात में बुनियादी स्तर के परिवर्तन किए थे। दमदार से दागदार बने कई राजनीतिज्ञों ने इसकी विभिन्न कोठरियों की शोभा बढ़ाई है। अपनी फितरत के चलते इस जेल में रहने का प्रकृतिजन्य अधिकार भी कई लोगों को समय-समय पर कुछ कम तो कुछ लंबे वक्त के तौर पर हासिल होता रहा हैं। इस सब पर मैंने गौर किया, लेकिन अब मामला कुछ बदल रहा है। इच्छा हो रही है कि 22 जनवरी की सुबह सात बजे तक इस जेल के भीतर होने वाले खास किस्म के घटनाक्रमों का साक्षी बनूं। पवन, मुकेश, विनय और अक्षय के पल-पल का मैं नजारा करना चाहता हूं। इच्छा है कि हर पल नजदीक आती मौत का उनकी आंखों में तैरता खौफ साक्षात महसूस कर सकूं। उन्हें हर रात बेचैनी से तड़पता देखूं और हर सुबह उनके चेहरे पर गाढ़े होते इस अहसास का चाय की प्याली के साथ आनंद लूं कि उनके जीवन का एक और दिन कम हो गया है। सात साल पहले की उस रात निर्भया कितना तड़पी और चीखी-चिल्लाई होगी, इसकी कल्पना मात्र से भी सिहरन हो जाती है

लेकिन यह तसव्वुर मुझे सुखद रोमांच से भर दे रहा है कि मौत की सजा सुनने के बाद निर्भया के हत्यारे किस-किस तरह से विलाप कर रहे होंगे। यह खयाल सुनहरे सपने की तरह आंखों में मुस्कुराहट भर दे रहा है कि पवन, मुकेश, विनय तथा अक्षय की किस कदर नींद उड़ चुकी होगी। यहां तक कि मुझे इस खयाली पुलाव में भी लज्जत भरा स्वाद आने लगा है कि चारों की फांसी का मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं। मौत के मुहाने पर खड़े उन सभी को जिंदगी की भीख मांगते देख रहा हूं। मैं ऐसा प्रतिक्रियावादी कभी रहा नहीं। लेकिन निर्भया केस के बीते सात साल में जो कुछ पढ़ा, देखा और सुना, उसके बाद केवल यही खयाल मन में पनपता गया कि चारों के लिए मौत की सजा भी कम होगी। बल्कि उस रिहा किए जा चुके नाबालिग दोषी सहित ये सभी पांच ऐसी सजा के हकदार थे, जिसमें ये जिंदगी नहीं, बल्कि मौत की भीख मांगने लगते। मेरे मन में सवाल भी है कि आखिर 22 जनवरी को जब ये चारों फांसी पर लटक जाएंगे तो देश में क्या कुछ बदल जाएगा। वितृष्णा से मन तो तब ही भर गया था जब अखबार में इनकी फांसी की तारीख तय होने की लीड़ खबर के नीचे बाटम में एक पांच साल की मासूम के साथ उसके पड़ोसी युवक के अनाचार की कहानी भी पढ़ रहा था।

अखबार के ही किसी पन्ने में पटना में एक युवती के साथ गैंगरेप की खबर भी फांसी की इस सजा को मुंह चिढ़ा रही थी। बलात्कार और हत्या के मामले में करीब डेढ़ दशक पहले धंनजय चटर्जी को 2004 में फांसी पर लटकाया गया था। उसके बाद 22 जनवरी दूसरा मौका होगा। देश में आखिरी फांसी याकूब मेनन को मुम्बई विस्फोट के मामले में दी गई थी। यह आजाद भारत में अपराधियों को दी गई कुल 57 वीं फांसी की सजा थी। क्या अपराधियों के मन में इन सजाओं से कोई डर बैठैगा? सजा देने का मकसद शायद यहीं होता है कि लोग सजाओं को उदाहरण के तौर पर लें और ऐसे अपराधों को करने से बाज आएं। यह शर्मनाक ही है कि हमारा कानून और न्याय व्यवस्था ऐसा करने में असफल रहे हैं। देश में पिछले दस साल में पौने तीन लाख से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं। और इन दस सालों में अलग-अलग अपराधों में 13 सौ से ज्यादा लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है। इनमें से सिर्फ चार फांसी पर चढ़े। इनमें भी बलात्कार का कोई आरोपी शामिल नहीं है। नाबालिगों से बलात्कार और हत्या के मामलों में कानून में संशोधन के बाद अब तक अदालतों ने धड़ाधड़ कई आरोपियों को फांसी की सजा सुना दी है।

अकेले मध्यप्रदेश में ही ऐसे अपराधियों की संख्या दो दर्जन से ज्यादा है। जाहिर है हमारी न्याय प्रणाली के कारण इन्हें फांसी पर लटकने में बरसों लग जाएं। न्याय मिलने में देरी भी पीड़ित के साथ एक तरह का अन्याय ही है। अगर फांसी की यह सजाएं कठोर दंड के तौर पर दे रहे हैं तो फिर अपराधियों के मन में इसका खौफ भी होना चाहिए। लेकिन अखबार के पन्ने हमें रोज सुबह बताते हैं कि महिलाओं के साथ अपराध के मामले में समाज बेधड़क है। मुझे लगता है कि निर्भया कांड या ऐसी कोई भी जघन्य वारदात केवल एक अपराध नहीं, बल्कि किसी बेशर्मी भरी चुनौती की तरह हमारे सामने सवाल बनकर खड़ा हुआ था। सवाल यह, हमें जो करना था कर लिया। उन असंख्य लोगों की ही तरह, जिन्हें इस देश की सुराखदार कानून व्यवस्था का पूरा लाभ मिला है। अब देखें तुम हमारा क्या कर लेते हो! 22 जनवरी को लाश बनकर फंदे पर झूलते चार नापाक जिस्म क्या इस सवाल का सटीक जवाब होंगे। यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि यह उत्तर कोई मिसाल कायम करेगा। यह भविष्य के उन अपराधियों के दिल में खौफ का संचार कर सकेगा या नहीं, जो आज भी ऐसे बुरे अपराध के मंसूबे लेकर हमारे-आपके बीच विचरण कर रहे हैं।

शायद इसलिए हैदराबाद में बलात्कार के चार आरोपी पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते हैं तो पूरा देश उसका बेझिझक स्वागत करता है। हमारे सिस्टम की खामियों के चलते ही ऐसा हुआ है। मैं निर्भया के अरोपियों की फांसी को देर आयद, दुरुस्त आयद कहकर अपने और अपनी सरीखी सोच वाले असंख्य लोगों के जज्बात को हलका नहीं कर सकता। मैं खुलकर कहूंगा कि यह विलंब मन को आहत कर गया। देरी तो खैर यह भी खल गयी कि समय रहते कानून में सुधार न होने के चलते निर्भया का छठवां दोषी (एक रामबाबू पहले ही आत्महत्या कर चुका है) सजा-ए-मौत से बच गया। निर्भया अकेली नहीं थी, जिसकी आत्मा, शरीर और प्राण से किसी नाबालिग ने खिलवाड़ किया हो। उससे पहले भी कई ऐसे घटनाक्रम होते रहे हैं। और अब तो रोज सुबह अखबार हमें डराता है, मानवीय नीचता की पता नहीं कौनसी घटना पढ़ने को मिले। हमारा सिस्टम देर से जागने का आदी है। शायद इसलिए निर्भया के साथ क्रूरता के चरम का मूल दोषी वह नाबालिग दरिंदा ही था, जो आज भी समाज में आजाद घूम रहा है। यदि जरूरी कानूनी सुधार की इस प्रक्रिया को पहले ही पूरा कर लिया जाता तो निर्भया का छठवां दोषी भी 22 तारीख को फांसी पर लटका दिया जाता। सारे तथ्यों की रोशनी में मेरा मन अब बदल गया है। तिहाड़ में जाकर इस फांसी को देखने का कोई फायदा नहीं। मुझे निजाम कानपुरी की चिंता से इत्तफाक है, ‘दुनिया में ऐसा वक्त पड़ेगा एक दिन, इंसान की तलाश में इंसान ही जाएगा।’

प्रकाश भटनागर

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