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तीन तलाक बिल राज्यसभा से पास हो या लटके, भाजपा को होगा फायदा

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तीन तलाक रोकने के लिए पेश किया गया मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 लोकसभा में तो पास हो गया है, लेकिन अब मोदी सरकार के सामने इसे राज्यसभा में पास करवाने की एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि राज्यसभा में बीजेपी के पास बहुमत नहीं है। ऐसे में उसे अपनी विरोधी पार्टी कांग्रेस का साथ चाहिए। माना जा रहा है कि बीजेपी के नेता इस बाबत कांग्रेस नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अचानक सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल पड़ी है। ऐसे में वह राज्यसभा में इस बिल को लेकर सरकार के खिलाफ ज्यादा मुखर नहीं होगी। ऐसा होता है तो मोदी सरकार का काम आसान हो जाएगा।

मोदी सरकार ने तीन तलाक के खिलाफ बिल ला कर कांग्रेस को फंसा दिया है। कांग्रेस असमंजस में फंस गई। सुप्रीम कोर्ट ने गत 22 अगस्त को तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दे दिया था। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कानून बनाने की सिफारिश भी की थी। केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि हमें पूरा विश्वास है कि कांग्रेस लोकसभा की तरह ही राज्यसभा में भी तीन तलाक बिल पर हमारा साथ देगी और हम बिल को संसद से पारित कराने में कामयाब रहेंगे। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए तीन तलाक बिल आया है। यह महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है।
लोकसभा में जब इस बिल पर बहस शुरू हुई तो शुरू में कांग्रेस इस मांग पर अड़ी थी कि बिल स्टेंडिंग कमेटी में भेजा जाए। पर सरकार तुरन्त बिल पास करवाने का मन बना चुकी थी। कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। राजीव गांधी की गलती से कांग्रेस को हुए नुकसान का उदाहरण सामने था। गुजारा भत्ता देने से इन्कार वाला कानून बनने के बाद कांग्रेस को कभी भी लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस पर अल्पसंख्यक हितैषी पार्टी होने का ठप्पा लग गया। हिन्दू एक जुट होते गए और आज सिर्फ हिन्दुओं के बूते भाजपा सत्ता में है। आज कांग्रेस को अपनी गलती का एहसास है। इसीलिए तो राहुल गांधी गुजरात से हिन्दू बन कर लौटे हैं। सो तीन तलाक पर भी कांग्रेस ने समझदारी से काम लिया। शुरुआती अड़चन के बाद स्पीकर को बिल पेश करने दिया। कांग्रेस सांसद सुष्मिता सेन और अधीर रंजन चौधरी के संशोधन प्रस्ताव भी पार्टी ने वापिस करवाये। लोकसभा में मुस्लिम लीग के ओवैसी तो एक दम अलग थलग पड़ गए।
लोकसभा में भले ही यह बिल पास हो गया हो लेकिन अभी इसको राज्यसभा में पास कराना होगा। लोकसभा में बीजू जनता दल, अन्नाद्रुमक, सपा और तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक पार्टियों ने तीन तलाक बिल का विरोध किया था। हालांकि इन दलों के सांसद सदन में बिल में संशोधन प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहे जिसका फायदा भाजपा को हुआ लेकिन राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है। ऐसे में बिल को पास कराने के लिए दूसरे दलों के साथ की जरूरत है। 245 सदस्यीय राज्यसभा में राजग के 88 सांसद (भाजपा के 57 सांसद सहित), कांग्रेस के 57, सपा के 18, बीजू जनता दल के 8 सांसद, अन्नाद्रुमक के 13, तृणमूल कांग्रेस के 12 और एनसीपी के 5 सांसद हैं, अगर सरकार को अपने सभी सहयोगी दलों का साथ मिल जाता है, तो भी बिल को पारित कराने के लिए कम से कम 35 और सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। संभावना है कि राज्यसभा में कई विपक्षियां पार्टियां बिल का जोर-शोर से विरोध करें। इन विपक्षी दलों का कहना है कि बिल में संशोधन किया जाना चाहिए और तीन साल की सजा का प्रावधान करना गलत है।
अभी नहीं कह सकते कि राज्यसभा में कांग्रेस का क्या रुख रहेगा। यह पहले भी हो चुका है जब लोकसभा में बिल पास करवाने के बाद कांग्रेस ने राज्यसभा में अटकाया था। भाजपा भी अपने फायदे का मूल्यांकन कर ही राज्यसभा में बिल पेश करेगी। राज्यसभा में कांग्रेस के पास दो विकल्प होंगे। पहला विकल्प होगा कि बिल को गिरवा दे पर अब ऐसा नहीं लगता। कांग्रेस की कोशिश होगी कि बिल स्टेंडिंग कमेटी में चला जाए। वैसे अगर ऐसा हो जाए तो भाजपा को दोहरा फायदा होगा। स्टेंडिंग कमेटी के चेयरमेन भूपेन्द्र यादव हैं। बिल पर कांग्रेस की रुकावट से भाजपा को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने का मौका मिलेगा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले स्टेंडिंग कमेटी की रिपोर्ट आ जाएगी। जिससे भाजपा को चुनाव में डबल फायदा होगा। तीन तलाक को अपराध घोषित करने से मुस्लिम महिलाएं जरूर भाजपा की तरफ झुकेंगी।
देश में तीन तलाक को लेकर केंद्र सरकार और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बीच विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। भारत में भले ही इसे खत्म करने पर बहस चल रही हो पर पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और श्रीलंका समेत 22 मुस्लिम देश इसे कब का खत्म कर चुके हैं। दूसरी ओर भारत में मुस्लिम संगठन शरीयत का हवाला देकर तीन तलाक को बनाए रखने के लिए हस्ताक्षर अभियान से लेकर अन्य जोड़तोड़ में लग गए हैं।
मिस्र ने सबसे पहले 1929 में ही तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया था। मुस्लिम देश इंडोनेशिया में तलाक के लिए कोर्ट की अनुमति जरूरी है। ईरान में 1986 में बने 12 धाराओं वाले तलाक कानून के अनुसार ही तलाक संभव है। 1992 में इस कानून में कुछ संशोधन किए गए इसके बाद कोर्ट की अनुमति से ही तलाक लिया जा सकता है। इराक में भी कोर्ट की अनुमति से ही तलाक लिया जा सकता है। तुर्की ने 1926 में स्विस नागरिक संहिता अपना कर तीन तलाक की परंपरा को त्याग दिया। साइप्रस में भी तीन तलाक को मान्यता नहीं है।
भारत के पड़ोसी और दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश पाकिस्तान में भी तीन बार तलाक बोलकर पत्नी से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। बांग्लादेश ने भी तलाक पर पाकिस्तान में बना नया कानून अपने यहां लागू कर तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया। यहां 89 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। तालिबान प्रभाव वाले अफगानिस्तान में 1977 में नागरिक कानून लागू किया गया था। इसके बाद से तीन तलाक की प्रथा समाप्त हो गई। भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में तीन तलाक वाले नियम को मान्यता नहीं है। हालांकि श्रीलंका मुस्लिम देश नहीं है। मलेशिया में कोर्ट की अनुमति से ही तलाक लिया जा सकता है। सूडान में इस्लाम को मानने वालों की जनसंख्या सबसे ज्यादा है। यहां 1935 से ही तीन तलाक पर प्रतिबंध है। अल्जीरिया में भी अदालत में ही तलाक दिया जा सकता है। सीरिया में 1953 से तीन तलाक पर प्रतिबंध है। मोरक्को में 1957-58 से ही मोरक्कन कोड ऑफ पर्सनल स्टेटस लागू है। इसी के तहत तलाक लिया जा सकता है। ट्यूनीशिया में अदालत के बाहर तलाक को मान्यता नहीं है। संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, कतर, बहरीन और कुवैत में भी तीन तलाक पर प्रतिबंध है।
तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत ऐसी बुराई थी जिसे दूर हटाने की कोशिश में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी नाकों चने चबाने पड़ गए। कई लोगों के चेहरे ऐसे उतर गए मानो कड़वा घूंट पिलाया गया हो। मगर नरेन्द्र मोदी सरकार का यह ऐसा कड़वा घूंट है, जिसका असर दवा की तरह होगा और जिसे भारतीय इतिहास में उपलब्धि के रूप में लम्बे समय तक याद किया जाता रहेगा। तलाक-ए-बिद्दत की कुप्रथा शरीयत के मुताबिक नहीं थी, इसे शरीयत के विद्वान भी जानते हैं। यही वजह है कि पाकिस्तान समेत दुनिया के 22 देशों ने इस कुप्रथा से अपना पिंड बहुत पहले छुड़ा लिया, लेकिन हिंदुस्तान को फैसला लेने में वक्त लगा। इसकी वजह राजनीति में पैठ बना चुकी तुष्टीकरण की कुप्रथा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने हक की लड़ाई लड़ रहीं मुस्लिम महिलाओं का खुलकर साथ दिया। अदालत में सरकार के रुख में जो बदलाव आया, उसने उन महिलाओं को पुरुषवादी और धार्मिंक कट्टरता से लड़ने की हिम्मत दी और अदालत ने भी इस बात को समझा कि जितनी देरी होगी, उतनी ही बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक की शिकार होंगी।
हमें सती प्रथा से भी सबक लेना चाहिए जो कानून के जरिए ही बंद हो सका। हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि तीन तलाक जैसी कुप्रथा से भी मुस्लिम महिलाओं को छुटकारा मिलेगा। अगर सती प्रथा पर रोक 19वीं शताब्दी की उपलब्धि है, तो तीन तलाक पर रोक 21वीं शताब्दी की उपलब्धि। सती प्रथा पर रोक के हीरो राजा राम मोहन राय थे तो अब तीन तलाक पर रोक के नायक होंगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।

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