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तीन बार गांधीजी ने सरदार पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष बनने से रोका 

भारत रत्न सरदार पटेल भारत मॉं के उन सपूतों में सम्मिलित किये जाते हैं जिन्होने अपने चमक दमक भरे जीवन को तिलांजलि देकर देश सेवा का व्रत लिया और आजीवन पूर्ण निष्ठा से निभाया। लौह पुरूष के नाम से जाने पहचाने जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की आज जयंति है। इस अवसर पर उनका स्मरण अत्यंत ही स्वाभाविक और प्रासंगिक है। बहुत कम लोग जानते हैं बडा ही चमक दमक भरा जीवन जीने में विश्वास करने वाले पटेल अपने माता पिता की चौथी संतान थे। वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। पटेल अपने शालीन और और गंभीर व्यक्तित्व के लिये जाने जाते थे और उच्चस्तरीय तौर तरीकों और चुस्त अंग्रेजी पहनावे के लिये पहचाने जाते थे वे अहमदाबाद के फैशनपरस्त गुजरात क्लब के ब्रिज के खिलाडी ही नहीं वरन उस खेल के चैंपियन थे। वल्लभभाई बहुत ही सफल बैरिस्टर थे एक सफल वकील के रूप में उन्होने कई बार अंग्रेज पुलिस और न्यायाधीशों को चुनौती देकर प्रभावित किया था। सन 1917 में वे महात्मा गांधी के अनुयायी बन गए। यहॉं तक कि उन्होने अंग्रेजी पोशाख जिसे वे शौक से पहनते थे का भी उन्होने त्याग कर दिया। पटेल गांधी के सत्याग्रह से आजीवन जुडे रहे लेकिन उन्होने कभी भी गांधी के नैतिक विश्वासों और आदर्शों के साथ अपने को नहीं जोडा क्योंकि उनका मानना था कि उन्हे सार्वजनिक रूप से लागू करने का गांधी का आग्रह भारत के तात्कालीन राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक है। फिर भी वे गांधी के अनुयायी बने रहे। स्वाधीनता के लिये चले आंदोलन में महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू ओर सरदार पटेल के बीच हमेशा अपने प्रिय जवाहर को तवज्जो दी और पटेल को पीछे रखा जबकि तात्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में पटेल की विचारधारा और कार्यशैली भारतीय गणतंत्र के अधिक अनुरूप थी बजाए पं. जवाहरलाल नेहरू के। इसलिये यदि यह कहा जावे कि महात्मा गांधी ने सरदार पटेल के द्वारा उनको दिए गए सम्मान के बदले में केवल उनका अहित किया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह बात जितनी सही है कि पटेल सर्वकालिक महान नेता थे उतना ही सच यह भी है कि पं. जवाहरलाल नेहरू से उनके गहरे वैचारिक मतभेद थे। नेहरू विदेशी संस्कृति और विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे तो सरदार पटेल विशुद्ध भारतीयता के आधार पर सोचते थे इसके अतिरिक्त अन्य भी कई ऐसे विषय थे जिन पर उन दोनो के विचारों में मतभेद प्रकट होते थे। केवल एक ही बात ने उन दोनो को साथ खडा कर रखा था और वह ये कि दोनो ही गांधी जी के अनुयायी थे। इसे इस देश की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में ही माना जावेगा कि गांधीजी ने हमेशा नेहरू का पक्ष लिया। गांधीजी ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार पटेल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से रोका, दूसरी बार 1937-38 में गांधीजी ने पटेल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से रोका और तीसरी बार पुनः 1945-46 में पटेल गांधीजी के मना करने के कारण अध्यक्ष नहीं बन सके और आश्चर्य इस बात का है कि तीनों ही बार पटेल की जगह नेहरू को गांधीजी ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया। मुद्दे भले ही हर बार अलग अलग रहे लेकिन अध्ययन बताते हैं कि यदि पटेल को कमान सौंपी गई होती तो देश का चित्र आज कुछ और होता संभवतः पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री हो सकते थे।गुजरात में भारी वर्षा से फसल तबाह होने के बावजूद बम्बई सरकार द्वारा पूरा सालाना लगान पसूलने के फैसले के विरूद्ध उन्होने गुजरात के कैरा जिले में आंदोलन की योजना बनाई। बाराडोली में किये गए आंदोलन में सरदार पटेल ने नेतृत्व किया और यदि वे किसानों का पक्ष रखने नहीं पहुॅंचते तो इस देश को लौह पुरूष नहीं मिलता। बाराडोली के सत्याग्रह ने पटेल के जीवन की दिशा बदल दी और वे राष्ट्रवादी नेता के रूप में पहचाने जाने लगे। आज हम जिस भारत के नक्शे को देख रहे हैं और जिस भू भाग में हम रह रहे हैं वह वास्तव में सरदार पटेल की ही देन है क्योंकि जिन 600 से अधिक रियासतों के साथ स्वाधीन भारत दिया गया था यदि उनका भारतीय संघ में समय रहते विलय नहीं कराया होता तो हम कल्पना कर सकते हैं कि आज के भारत का क्या स्वरूप क्या होता। जब पं. नेहरू प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे तब सरदार पटेल अपने सचिव मेनन के साथ भारतीय रियासतों को भारतीय संघ में विलय कराने की तैयारी कर रहे थे। यह तो सरदार पटेल की नीति ही थी कि 15 अगस्त 1947 के पूर्व हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ को छोडकर शेष सभी भारतीय रियासतें भारत संघ में सम्मिलित हो गई थीं। बाद में जूनागढ और हैदराबाद को भी भारत के पक्ष में समर्पण कराने में पटेल सफल रहे लेकिन कश्मीर के विषय को पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपने पास रखा और वह समस्या आज भी भारत के लिये सरदर्द बनी हुई है। सरदार पटेल ने कश्मीर के विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने पर भी क्रडी आपत्ति ली थी। देश की बिखरी पडी रियासतों के एकीकरण के विषय पर महात्मा गांधी ने भी लिखा था कि पटेल रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे। वास्तव में वल्लभभई पटेल का व्यक्तित्व ही ऐसा था जिसने उन्हे भारत का लौह पुरूष बनाया। आज गुजरात में समुद्र तट पर खडा सोमनाथ का मंदिर भारत के गौरवशाली इतिहास का परिचय देते हुए खडा है तो यह सरदार वल्लभ भाई पटेल का ही संकल्प था कि यह मंदिर बन सका। सरदार पटेल भारत में कालजयी व्यक्तित्व के रूप में हमेशा अमर रहेंगे। 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में सरदार पटेल चिरनिद्रा में सो गए लेकिन उसके पूर्व उन्होने जो किया उसने भारतीय इतिहास में उनको सदैव के लिये अमर बना दिया। पुण्य स्मरण।
– डॉ. क्षितिज पुरोहित 9425105610

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