Breaking News

त्रिकालदर्शी श्री पशुपतिनाथ का मंदिर भी वास्तुदोष की चपेट में कैसे ?

वास्तु शास्त्री के कहने पर वास्तु दोष मानकर भगवान श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर परिसर में स्थित आकर्षक शंख झरने को बंद करने तथा वहां से हटाने के समाचार पर से दशपुर जागृति संगठन के साथ अन्य संगठनों द्वारा हाल ही में प्रबंध समिति अध्यक्ष, कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा। वास्तव में वास्तुदोष उसे लगता है जो उसमें निवास करते है तथा जीवन यापन करते है। वास्तु दोष सही मायने में भवन, मकान में अवश्य लागू होता है परन्तु उस स्थान पर जहां कि सूर्य का प्रकाश तथा हवा का स्वतंत्र प्रवेश नहीं होता हो। जहां तक पशुपतिनाथ मंदिर तथा सम्पूर्ण परिसर का प्रश्न है, यहां पर कोई गृहस्थी निवास नहीं करता और ऐसे में जो स्वयं काल का महाकाल, देवों का देव महादेव निवास करता हो, वहां भला वास्तु दोष किस प्रकार अपना प्रभाव दिखा सकता है। यद्यपि वास्तु शास्त्र का भी महत्व हो सकता है। वास्तु शास्त्र को मानने वालों के लिये वास्तु दोष निवारण की मान्यता को भी चाहे नकारा नहीं जा सकता हो और सांसारिक परिवेश में एक साधारण मानव, गृहस्थी जो वास्तु में विश्वास रखता हो उसके निजी व्यक्तिगत जीवन में यह सब मान्य हो सकते है। उसका कोई विरोध नहीं परन्तु जो स्वयं दोषों का निवारण करता हो जो स्वयं त्रिकालदर्शी हो, वह वास्तु दोष की चपेट-लपेट में कैसे आ सकता है। उसके स्वयं के घर (मंदिर) में यदि वास्तु दोष का अड्डा लग जावेगा तो फिर अन्य कैसे बच सकेंगे।
6 लाख 60 हजार की राशि कम नहीं होती, मनोकामना अभिषेक से शेष बची इतनी बढ़ी राशि से जिस झरने की स्थापना की गई है इसको भी मद्देनजर रखकर झरने को बंद नहीं किया जाना चाहिए। जैसा कि गायत्री परिवार ने दर्शाया है इस झरने में शंख के नीचे एक करोड़ गायत्री महामंत्र, महामृत्युंजय तथा ऊँ नमः शिवाय महामंत्र स्थापित किया गया है और नाम महिमा में कहा भी गया है कि ‘‘जासु नाम लेत भव सिन्धु सुखाहि’’ एक बार जिसका नाम लेने मात्र से जब संसार रूपी सागर भी सूख जाता हो, समस्त दोषों का निवारण हो जाता हो तो फिर जिस स्थल पर एक करोड़ मंत्र नींव में स्थापित किये गये हो, जहां से जल प्रवाहित होता हो, ऐसे झरने से भला वास्तु दोष किस प्रकार अपना प्रभाव दिखा सकता है। वास्तव में वास्तु दोष हो तो भी वह तब स्वीकार करने योग्य होता जब झरना स्थापित होने के बाद यदि मंदिर की दानपेटी में दान की राशि आना बंद हो जाती या उसमें कमी हो जाती अथवा मंदिर का कोई विकास/प्रगति नहीं होती। वास्तु दोष के संदर्भ में पहले का गेट बंद करना भी उपर्युक्त प्रतीत नहीं होता क्योंकि इसके प्रवेश के समीप ही मंदिर से संबंधित चित्रों की प्रदर्शनी भी लगी हुई जिससे दर्शन करने के लिये आने जाने वाले दर्शनार्थी देख लेते थे परन्तु गेट बंद किये जाने से इस प्रदर्शनी का भी बिना पूर्ण जानकारी के अधिकांशः दर्शनार्थी बिना देखे ही पूर्व दिशा गेट (दरवाजे) से निकल जाते है।
हम सभी देख रहे है कि, मंदिर का विकास भी हुआ और हो रहा है। लगभग 400 किलो से अधिक चांदी से महारूद्रयंत्र तथा वर्तमान में नीचे जलाधारी का निर्माण किया जा रहा है। इतना ही नहीं दानराशि में दिन दुगुनी रात चैगुनी वृद्धि होती जा रही है तो फिर इस झरने अथवा अन्य स्थल गेट आदि के निर्माण में कैसे वास्तु दोष को माना जा सकता है। जिन्होंने श्री पशुपतिनाथ महादेव के यहां वास्तु दोष बताया है लगता है वे अभी भगवान भोलेनाथ पशुपतिनाथ, कल्याणदाता-सत्यं शिवं सुन्दरम् की अलौकिक महिमा से अनभिज्ञ है। संज्ञान नहीं हैं।

 

Post source : बंशीलाल टांक (मो.नं. 7697872264)

About The Author

I am Brajesh Arya

Related posts