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दशपुर दर्शन

मंदसौर मंदसौर  का प्राचीन नाम है दशपुर, भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही। इस नगरी का पोराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। मंदसौर  के प्राचीन मंदिर एवं पूजा स्थल  जहां एक ओर पुरातत्व शास्त्र की बहुमूल्य धरोहर हैं, वहीं दूसरी ओर ये हमारी आस्‍था एवं विश्वास के आदर्श केंद भी हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु इन मन्दिरों एवं स्थलों पर जाकर मन की शान्ति एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

मध्यप्रदेश के मालवा में शिवना तट पर भारत की प्राचीनतम, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी दशपुर अवस्थित है। दशपुर का इतिहास हमारे देश की सांस्कृति धरोहर है। इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

दशपुर गुप्त काल में भारत का प्रसिद्ध नगर था, जिसका अभिज्ञान मंदसौर (ज़िला मंदसौर, पश्चिमी मालवा, मध्य प्रदेश) से किया गया है। लैटिन के प्राचीन भ्रमणवृत्त पेरिप्लस में मंदसौर को ‘मिन्नगल’ कहा गया है। कालिदास ने ‘मेघदूत’ में इसकी स्थिति मेघ के यात्राक्रम में उज्जयिनी के पश्चात् और चंबल नदी के पार उत्तर में बताई है, जो वर्तमान मंदसौर की स्थिति के अनुकूल ही है-

‘तामुत्तीर्य ब्रज परिचितभ्रू लताविभ्रमाणां, पक्ष्मोत्क्षेपादुपरिविलसत्कृष्णसारप्रभाणां, कुंदक्षेपानुगमधुकरश्रीजुपामात्मबिंम्बं पात्रीकुर्व्वन् दशपुरवधूनेत्रकौतूहलनाम्’।

अभिलेख

दशपुर से 533 ई. का एक अन्य अभिलेख, जिसका संबंध मालवाधिपति यशोवर्मन से है, सौंधी ग्राम के पास एक कूपशिला पर अंकित पाया गया था। यह अभिलेख भी सुंदर काव्यमयी भाषा में रचा गया है। इसमें राज्यमंत्री अभयदत्त की स्मृति में एक कूप बनाये जाने का उल्लेख है। अभयदत्त को पारियात्र और समुद्र से घिरे हुए राज्य का मंत्री बताया गया है। दशपुर में यशोवर्मन के काल के विजय स्तंभों के अवशेष भी है, जो उसने हूणों पर प्राप्त विजय की स्मृति में निर्मित करवाए थे। एक स्तंभ के अभिलेख में पराजित हूणराज मिहिरकुल द्वारा की गई यशोवर्मन की सेवा तथा अर्चना का वर्णन है-

‘चूडापुष्पोपहारैर्मिहिरकुल नृपेणार्चितंपादयुग्मम्।’

इनमें से प्रत्येक स्तंभ का व्यास तीन फुट तीन इंच, ऊँचाई 40 फुट से अधिक और वज़न लगभग 5400 मन था। मंदसौर के आसपास 100 मील तक वह पत्थर उपलब्ध नहीं है, जिसके ये स्तंभ बने हैं।

प्राचीन जैन तीर्थ स्थल

मंदसौर से गुप्त काल के अनेक मंदिरों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जो क़िले के अन्दर कचहरी के सामने वाली भूमि में आज भी सुरक्षित हैं। कहा जाता है कि 14वीं शती के प्रारम्भ में अलाउद्दीन ख़िलजीने इस महिमामय नगर को लूट कर विध्वंस कर दिया और यहाँ एक क़िला बनवाया, जो खंडहर के रूप में आज भी विद्यमान है। दशपुर की गणना प्राचीन जैन तीर्थों में की गई है। जैन स्तोत्रग्रंथ तीर्थमालाचैत्य वंदन में इसका नामोल्लेख है- ‘हस्तोडीपुर पाडलादशपुरे चारूप पंचासरे’। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में दशपुर का उल्लेख किया है। मंदसौर को आज भी आस-पास के गांवों के लोग ‘दसौर’ नाम से जानते और पुकारते हैं, जो दशपुर का अपभ्रंश है। मदंसौर ‘दसौर’ का ही रूपान्तरण है।

इतिहास

गुप्त सम्राट कुमारगुप्त द्वितीय के शासनकाल (472 ई.) का एक प्रसिद्ध अभिलेख मंदसौर से प्राप्त हुआ था, जिसमें लाट देश के रेशम के व्यापारियों का दशपुर में आकर बस जाने का वर्णन है। इन्होंने दशपुर में एक सूर्य के मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में इसका जीर्णाद्वार हुआ, और यह अभिलेख उसी समय सुंदर साहित्यिक संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण करवाया गया था। तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक तथा सामाजिक अवस्था पर इस अभिलेख से पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति – गणपति चौक जनकुपूरा