Breaking News
ओखाबावजी का मंदिर

मन्दसौर के चंद्रपुरा स्थित प्राचीन ओखाबावजी का मंदिर आज भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर करीब 600 साल प्राचीन है, दशपुर नगरी के प्राचीन मंदिरों में एक ओखाबावजी के मंदिर का इतिहास भी कागज के पन्नों पर अंकित है। धार्मिक मान्यता अनुसार यहां की बावड़ी का जल पीने और भभूति खाने से टाइफाइड मोतीझरा जैसी बिमारी तुरंत ठीक हो जाती है। इस कारण यहां का नाम ओखाबावजी मोतीबावजी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। जून 1698 में तात्कालीन बादशाह आलमगीर ने 27 दिन तक यहां विश्राम किया था, बताया जाता है कि बादशाह उस समय मोतीझरा बीमारी से ग्रसित हो गया फिर ओखाबावजी की महिमा सुनी तो यहाँ की बावड़ी का जल और मंदिर की भभूती से बादशाह स्वस्थ हो गया। इसका वर्णन उन्होंने अपने फारसी भाषा के एक लेख में लिखकर मंदिर के पुजारी बाबा हलकनपुरी मदनपूरी को दिया और मंदिर पर एक तीन बीघा की बावड़ी का निर्माण भी करवाया, उस समय इस क्षेत्र का नाम बावड़ीकला रखा जो आज भी राजस्व रिकार्ड में बावड़ीकला ही दर्ज है। बादशाह आलम ने ओखाबावजी को ओखापीर का नाम भी दिया ताकि यहां साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम हो, तब से लेकर आज तक यहां मुस्लिम धर्म के लोग चादर पेश करते है तो हिन्दू चोला चढ़ाते है।
मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने संवत 1445 में मंदिर के लिए 3700 एकड़ जमीन मंदिर के पुजारी बाबा धनगिरि अगोरनाथ जी को दान दी थी, जिसमें उन्होंने लकड़ी की छाल पर एकलिंग जी भगवान की शपथ लेकर स्वयं के हस्ताक्षर और मोहर लगाई है। यह स्थान राजस्थान के डूंगला में आज भी मौजूद है। इसे महाराणा प्रताप ने पानीझारा बावजी का नाम दिया था बताते है कि इनकी पूजा करने से वहां जलसंकट नहीं आता था।
ओखावावजी मंदिर का ग्वालियर राजघराने से भी गहरा नाता रहा है, ग्वालियर रियासत के महाराजा जीवाजीरावजी सिंधिया द्वारा मंदिर और मठ का जीर्णाेद्धार करवाकर मंदिर के पुजारी को सोंधनी, बावड़ी कला गांव और चन्द्रपुरा की जागिरी प्रदान की गई थी, राजघराने द्वारा अपने कुलदेवता के रूप में भी यहाँ पूजा जाता रहा है। मंदिर का नाम मोतिया महाराज के नाम से जाना जाने लगा, मंदिर में विराजित रजत प्रतिमा भी ग्वालियर महाराज द्वारा भेंट की गई है। उस समय ओखाबावजी 7 दिन तक नगर भ्रमण पर रहे थे उस समय के पुजारी जी तेजगिरीजी महाराज का सम्मान भी हुआ था। उसके बाद कई वर्षों तक मंदिर पर मेला लगता रहा, मन्दसौर और आसपास के लोग मेले में जाते और बटुक भैरव ओखाबावजी का आशीर्वाद पाते। बड़ी महत्ता है बटुक भैरव के पूजन की।