Breaking News
कुबेर मंदिर- खिलचीपुरा

शहर से 5 किलोमीटर दूर खिलचीपुरा के कुबेर मंदिर स्थित है। धनतेरस पर यहा श्रद्धालुओं का तांता लगाता है। पशुपतिनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित ग्राम खिलचीपुरा स्थित धौलागढ़ महादेव मंदिर के नाम  से भी इस मंदिर को जाना जाता है। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। विश्व में दो ही स्थान ऐसे हैं, जहां शिव पंचायत में कुबेर भी शामिल हैं।कुबेर प्रतिमा केदारेश्वर मंदिर के बाद मंदसौर में ही है।  मंदसौर की कुबेर प्रतिमा गुप्तकाल की मानी जाती है यह प्रतिमा लगभग 1400 साल पुराने धौलागढ़ महादेव मंदिर में हैं।

इतिहासविद् डॉ. कैलाश पांडेय के अनुसार कुबेर की प्रतिमा उत्तर गुप्तकाल 7 वीं शताब्दी में निर्मित है। मराठा काल में धोलागिरी महादेव मंदिर के निर्माण के दौरान इसे गर्भगृह में स्थापित किया गया। इस मंदिर में भगवान गणेश व माता पार्वती की प्रतिमा भी है। डॉ. पांडेय बताते हैं कि 1978 में इस प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में देखा गया। प्रतिमा में कुबेर बड़े पेट वाले, चतुर्भुजाधारी सीधे हाथ में धन की थैली और तो दूसरे में प्याला धारण किए हुए है। नर वाहन पर सवार इस प्रतिमा की ऊंचाई लगभग तीन फीट है।

डेढ़ हजार साल पुरानी है मूर्ति- पुजारी कन्हैयालाल गिरी ने बताया दुर्लभ कुबेर प्रतिमा डेढ़ हजार साल पुरानी है। इसे गुप्तकाल की माना जाता है। प्रतिमा पहले अन्य किसी स्थान पर थी, जहां से इसे खिलचीपुरा स्थित शिव मंदिर में विराजित किया था। कुबेर की सबसे बड़ी प्रतिमा व प्रसिद्धि के चलते लोग इसे कुबेर मंदिर के नाम से जानने लगे।

कुबेर को धन का देवता कहा जाता है। धनतेरस पर मंदिर में पूजन और दर्शन विशेष फलदायी होता है। इसके चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु हर साल आते हैं। खिलचीपुरा स्थित पश्चिममुखी प्राचीन कुबेर मंदिर में धनतेरस पर पूजन के लिए आस्था का मेला लगाता है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि हर भक्त को सिर झुकाकर दर्शन के लिए जाना पड़ता है। शिव मंदिर में छोटा सा दरवाजा है। जिसकी ऊंचाई 3 फीट है।  इसमें एक साथ दो भक्त प्रवेश नहीं कर सकते। धनतेरस पर मंदिर में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों के श्रद्धालु आते है। दिवाली पर जो महत्व धन की देवी लक्ष्मी के पूजन का है, वही महत्व धनतेरस पर मंदसौर में स्थित भगवान कुबेर के मंदिर में पूजा का भी है। माना जाता है कि इस दिन यहां दर्शन करने से कभी भी धन-दौलत की कमी नहीं होती है।

पहले पूजते हैं कुबेर, वंश पंरपरा से है पुजारी – मंदिरके पुजारी हेमंत गिरी गोस्वामी ने बताया धनतेरस पर मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश के बाद पहले कुबेर का पूजन करते हैं। इसके बाद शिव का पूजन कर जलाभिषेक करते हैं। वंश परंपरानुसार मंदिर की पूजन व्यवस्था पहले उनके पिता कन्हैयालाल गिरी और उनके दादा नंद गिरी ने संभाली। अब वे मंदिर की पूजन व्यवस्था संभाल रहे हैं। धरतेरस पर मंदिर में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों के श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

गर्भगृह में ताला नहीं लगता आज भी– मंदिरके गर्भगृह में तीन फीट के दरवाजे में ताला नहीं लगाया जाता है। मंदिर के पट बंद नहीं करने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। मंदिर की सुरक्षा के लिए 20 साल पूर्व नंदीगृह में सुरक्षा दीवार बनाई थी। सुरक्षा बतौर जाली के दरवाजे लगाए लेकिन गर्भगृह को आज भी खुला रखा है।

कुबेर का निवास वट-वृक्ष कहा गया है। `वाराह-पुराण´ के अनुसार कुबेर की पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन की जाती है। वर्तमान में दीपावली पर धनतेरस को इनकी पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, विश्रवा ऋषि की दो पत्नियां थीं। पुत्रों में कुबेर सबसे बड़े थे। रावण, कुंभकर्ण और विभीषण सौतेले भाई थे।रावण ने मां से प्रेरणा पाकर कुबेर का पुष्पक विमान लेकर लंका पुरी तथा समस्त संपत्ति छीन ली। कुबेर अपने पितामह के पास गये। उनकी प्रेरणा से कुबेर ने शिव की आराधना की। फलस्वरूप उन्हें ‘धनपाल’ की पदवी, पत्नी और पुत्र का लाभ हुआ।