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खिड़की माताजी का मंदिर

शिवना नदी के किनारे स्थित खिड़की माता मंदिर अतिप्राचीन है। इस मंदिर को लेकर कई किवदंतिया है। माताजी के दरबार में करीब 4 पीढ़ी से सेवा-पूजा कर रहे परिवार के प्रतिनिधि पंडित कैलाश व दुर्गाशंकर परमार के मुताबिक खिड़की माताजी की चमत्कारिक प्रतिमा करीब 350 वर्ष पूर्व मंदिर के समीप ही शिवना तट पर एक बरगद के पेड़ के नीचे प्रकट हुई थी। प्राचीन मंदिर में सैकड़ो साल से लोग मन्नत मांगने आते है। मन्नत पूरी होने पर वे यहां विधि- विधान से पूजा-अर्चना कराते है। खासकर जिनके स्वयं के मकान नहीं होते, यदि वे सच्चे मन से माता की पूजा अर्चना कर माता के प्रांगण के पत्थरों से घरोंदे बनाते है तो माताजी उनकी इच्छा पूर्ण करती है। नवरात्रि पर्व पर इस स्थान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। चैत्र और शारदेय दोनों ही नवरात्रियों में माता के दरबार में प्रतिदिन पूजा-अर्चना, हवन और धार्मिक आयोजनों के दौरान अधिक संख्या मेंश्रद्धालु आते है। मंदसौर- प्रतापगढ़ बायपास से आधा किलोमीटर दूर महू- नीमच रोड़ पर स्थित खिड़की माता मन्दिर पर होली के बाद शीतला सप्तमी पर अधिक संख्या में भक्त आते है। शीतला सप्तमी पर श्री खिड़की माता मंदिर निर्माण समिति और नगरपालिका के संयुक्त तत्वावधान में 2 दिवसीय खिड़की माता मेला लगता है। इसमें मंदसौर ही नहीं बल्कि मालवा व राजस्थान के भक्त पहुंचते है। इस दौरान खिड़की माताजी का दरबार विशेष रूप से श्रृंगारित रहता है जो आकर्षण का केन्द्र होता है।

अपरम्पार है चमत्कारिक खिड़की माताजी की लीला- घरोंदे बनाने से पूरी होती है घर की मन्नत, निःसंतान को मिलता है चिराग : भारतीय संस्कृति, धार्मिक स्थलों और गौरवमयी इतिहास की त्रिवेणी माने जाने वाले मन्दसौर नगर की पवित्र धरा जहां विश्व के मानचित्र पर अष्टमुखी भगवान श्री पशुपतिनाथ महादेव के मन्दिर को लेकर अंकित है। इसी मन्दसौर में जीवनदायिनी माँ शिवना के तट पर स्थित अतिप्राचीन खिड़की माताजी का मंदिर भी पौराणिक महत्व, अभूतपूर्व इतिहास और चमत्कारिक दर्शनों को लेकर एक विशेष स्थान रखता है। खिड़की माताजी की लीला न केवल चमत्कारिक बल्कि अपरम्पार भी है।
माताजी के दरबार में करीब 4 पीढ़ी से सेवा-पूजा कर रहे परिवार के प्रतिनिधियों पंडितगण कैलाशजी, दुर्गाशंकरजी, रमेशजी व सुरेशजी परमार के मुताबिक खिड़की माताजी की चमत्कारिक प्रतिमा करीब 350 वर्ष पूर्व मंदिर के समीप ही शिवना तट पर एक बरगद के पेड़ के नीचे प्रकट हुई थी। प्राकट्य के बाद से ही माताजी का आशीर्वाद और चमत्कार देखने लायक रहा। लोगों का हर कष्ट हरने वाली खिड़की माताजी के मन्दिर में तब से आज तक न केवल रोगों से मुक्ति मिलती है बल्कि मंदिर परिक्षेत्र में घरोंदा भर बनाकर मन्नत मांगने से भक्तों के मकान की मन्नत भी पूरी हो जाती है। इतना ही नहीं निःसंतान दम्पत्ति व परिवार पर भी माता का आशीर्वाद बरसता है और संतान की प्राप्ति होती है। बताया जाता है कि, मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां माता के दरबार में खीर, पुड़ी व हलवे की प्रसादी का भोग लगाकर धन्यवाद भी ज्ञापित करते है।

यहां घरौंदे बनाने से पूरी होती है घर की मुराद- शिवना नदी किनारे स्थित खिड़की माता मंदिर अतिप्राचीन है। यहां कई किवदंतिया हैं। प्राचीन मंदिर में सैकड़ों साल से लोग मन्नत मांगने आते हैं। खासकर जिनके स्वयं के मकान नहीं होते, यदि वे सच्चे मन से माता की पूजा अर्चना कर माता के प्रांगण के पत्थरों से घरोंदे बनाते है तो माताजी उनकी इच्छा पूर्ण करती है। नवरात्रि पर्व पर इस स्थान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। चैत्र और शारदेय दोनों ही नवरात्रियों में माता के दरबार में प्रतिदिन पूजा-अर्चना, हवन और धार्मिक आयोजनों के दौरान अधिक संख्या में श्रृद्धालु आते हैं।

नवरात्रा में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब- वैसे तो खिड़की माता के दरबार में भक्त अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते ही है लेकिन नवरात्रा में यहां का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। चैत्र और शारदेय नवरात्रा में माता के दरबार में न केवल विविध आयोजन होते है बल्कि भक्तों का सैलाब भी जमकर उमड़ता है। मन्दसौर से लेकर मालवांचल और सीमावर्ती राज्यों से लेकर दूर-दराज तक के लोग यहां पहुंचते है और घरोंदे बनाकर अपनी मन्नत माता के दरबार में करते है। चैत्र नवरात्रा में नगरपालिका और मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में लगने वाला मेला आकर्षण का केन्द्र रहता है।

आठ सालों से जारी है कायाकल्प- एक समय था जब खिड़की माताजी मंदिर और माता के दरबार तक पहुंचने के लिए भक्तों को सड़क और पथ नहीं होने से भारी बाधाओं का सामना करना पड़ता था, लेकिन आज मंदिर अपने नये स्वरूप में आकर आकर्षण का केन्द्र बन गया है। वर्षों पुराने अति प्राचीन धार्मिक स्थलों में शुमार श्री खिड़कीमाता मंदिर के कायाकल्प को लेकर करीब 8 साल पहले श्री खिड़की माता मंदिर समिति और जनप्रतिनिधियों ने पहल की जो निरंतर जारी है। 8 सालों में धोलपुर के लाल पत्थरों से मंदिर आज पूरी तरह सजकर तैयार है। माताजी के दरबार में भक्तों के लिये आवश्यक सुविधाएं तैनात है। इतना ही नहीं 23 सितम्बर 2009 से शुरू हुआ जिर्णोद्धार आज करीब-करीब पूर्णता की ओर है। मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम ने भी खिड़की माता मंदिर के पौराणिक महत्व, भक्तों की आस्था, पर्यटन और दर्शनीय केन्द्र की संभावनाओं को देखते हुए पर्यटन विकास निगम ने भी 30 लाख रूपये की लागत से यहां शेड और बगीचे का निर्माण करवाया है। आज पर्यटन के मानचित्र पर खिड़की माता मंदिर एक दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित होता दिखाई दे रहा है। माताजी के दरबार में हर वर्ग पूरी श्रद्धा से विकास के लिये आहूति के लिये कटिबद्ध दिखाई देता है। इतना ही नहीं चंडीगढ़ के रॉक गार्डन की तर्ज पर आकर्षक गार्डन का निर्माण आकर्षण का केन्द्र बन रहा है।

अब सुलभ हुआ माता के दरबार में पहुंचना- सालों पहले खिड़की माता मंदिर तक पहुंचने के लिये भक्तों को भारी तपस्या करना पड़ती थी। पथरीले और जंगल भरे इलाकों से गुजरकर भक्त यहां पहुंचते थे लेकिन विकास के दौर में अब माताजी के मंदिर तक पहुंचना पूरी तरह सहज व सुलभ हो गया है। मंदिर समिति और जनप्रतिनिधियों के संयुक्त प्रयासों से मंदसौर बायपास से सीधे मन्दिर तक न केवल पक्का रोड़ बन गया है बल्कि जगमगाती लाईटे देखकर ही विकास का अंदाजा लग जाता है।

खिड़की माता मेला-आस्था का सैलाब- अति प्राचीन खिड़की माता मंदिर पर विगत कई वर्षों से मन्दसौर नगरपालिका परिषद् एक दिवसीय मेला शीतला सप्तमी के दिन (चैत्र कृष्ण सप्तमी) लगाकर इस मन्दिर की ख्याति बढ़ाने में अग्रसर है। चैत्र माह, बसंत ऋतु एवं होली के पर्व के मध्य शीतला सप्तमी का पर्व विशेष आस्था व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसमें नगर की महिलाएं होलिका दहन के बाद प्रतिदिन माताजी का पूजन करती है और शीतला सप्तमी के दिन पूर्व माताजी को नैवेद्य अर्पण करने के लिये विविध व्यंजन तैयार किए जाते है और दूसरे दिन शीतला सप्तमी के पर्व पर माताजी का पूजन कर उस ठण्डे नैवेद्य का भोग लगाया जाता है, जिससे शीतला माता की कृपा से बालकों को होने वाले कई रोगों से मुक्ति मिलती है। इस अवसर पर मन्दसौर में शिवना नदी के किनारे स्थित आस्था के केन्द्र चमत्कारिक खिड़की माता मन्दिर पर सभी वर्ग की महिलाओं द्वारा हर्षोल्लास से पूजन अर्चन किया जाता है एवं ठंडे पदार्थों का सेवन किया जाता है। यही एक दिवसीय मेले का भी आयोजन होता है। इसमें भजन संध्या व कई कार्यक्रम सम्पन्न किए जाते है।
इस अति प्राचीन खिड़की माता मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ आता है और भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि एवं संतान व भजन की मनोकामना पूर्ण होती है। यहां की यह मान्यता है कि जो भक्त यहां मन्दिर परिसर के आसपास पत्थरों के घरोंदे बनाते है, उनकी मकान की मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है।
शीतला सप्तमी पर माताजी के सामने इन श्लोग का पाठ करने से सभी प्रकार के रोगों व बाल रोगों से मुक्ति मिलती है-

शीतले त्वं जगन्माता, शीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री, शीतलायै नमो नमः।।
रासभो गर्दभश्रैव, खरो, वैशाखनन्दन।
शीतला वाहन श्रैव, दूर्वाकन्द निकृन्तन।।
एतानि खर-नामानि, शीतलाग्रे तु पठेत।
तस्य गेहे शिशुनांच, शीतला रूद्र न जायते।।

शीतला माता को ठंडे भोजन का लगाएंगे भोग- होली के पर्व की समाप्ति के बाद सातवें दिन अर्थात शील सप्तमी के दिन हिन्दू समाज की महिलाएं अपने घरों में एक दिन पूर्व बनाए गए भोजन पकवान आदि को अलसुबह शीतला माता मंदिर में माता के समक्ष ले जाकर भोग लगाएंगी और इसके बाद अपने घरों में आकर सभी भोजन करते है। शीतला माता मंदिर में महिलाएं घरों से बनाएं गए भोजन आदि की थाली लेकर माता को भोग लगाने के लिए पहुंचती है। यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है। मान्यता यह भी है, कि माता को भोग लगाने के बाद कभी गंभीर बीमारी नहीं होती है और घर में भी माता की कृपा बनी रहती है।

सुबह से ही लगती है लाइन-
– सप्तमी के दिन मां शीतला के मंदिर पर सुबह 2-3 बजे से लाइनें लगाना प्रारंभ हो जाती हैं। हर साल सुबह 4 बजे मंदिर जाते है, तब कहीं एक-दो घंटे के इंतजार के बाद पूजन करने को मिलता है।
– हर वर्ष काफी इंतजार के बाद ही मां शीतला की पूजा करने को मिल पाती है। पर्व के चलते मंदिरों पर श्रद्घालुओं की सुविधा के लिए टेंट, पानी आदि की व्यवस्था रहती है।

आरोग्य के लिए करेंगे शीतलामाता का पूजन- शीतला माता की आराधना करने के लिए महिलाओं, पुरुष तथा बच्चे भी काफी संख्या में पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्घि की कामना करते है। माता को ठंडे भोजन का भोग लगता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को शीतलामाता की पूजा और ठंडा भोग लगाने का विधान है। माता को एक दिन पूर्व बनाया भोजन का भोग लगाया जाता है। इसके पीछे ऋतु परिवर्तन से होने वाले रोगों से बचने का विज्ञान है। व्रतधारी गर्म पदार्थ का सेवन नहीं करते। कथा सुनने का भी विशेष महत्व है।

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