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तलाई वाले बालाजी

हमारी भारतीय संस्कृति एवं सनातन हिन्दू धर्म में यद्यपि ईश्वर को कण-कण में व्याप्त माना जाता है, परन्तु फिर भी कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहाँ देवता के दर्शन अधिक चैतन्य होते हैं। हमारे तीर्थ स्थान, पवित्र नदियाँ एवं सरोवर तथा देव मंदिर के ऐसे अनेकों उदाहरण से हम भलीभाँति परिचित है। श्री बालाजी का ऐसा ही अनूठा मंदिर मन्दसौर नगर में स्थित है। भक्तजनों का ऐसा मानना है कि साक्षात् हनुमान जी भगवान यहाँ विराजै है।
मालवा का दशपुर नगर जिसे आजकल मन्दसौर नाम से जाना जाता हैं, कवि कालिदास द्वारा मेघदूत में गाया गया नगर है। इस नगर में श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। श्री राम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी जो शूरता, वीरता, दक्षता, बुद्धिमता आदि गुणों के पुंज है तथा जिनकी भक्ति करने से भक्तों के सभी संकट दूर होते हैं तथा समस्त मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती है इसलिये यहाँ के नर-नारी श्री बालाजी के रूप में श्री हनुमान जी को पूजते, सजाते एवं दुलारते हैं। इस मंदिर को तलाई वाले बालाजी के मंदिर से भी जाना जाता है।
तलाई वाले बालाजी की प्रतिमा अन्य बालाजी की प्रतिमाओें से काफी भिन्न है। इनके अदभूत दर्शन से ही भक्त का आत्मकल्याण एवं सांसारिक भावनाओं की पूर्ति भी होती है। इसी कारण यहां प्रतिदिन भक्तों का मेला लगा रहता है। प्रतिमा के तेज एवं भक्तों को आध्यात्म शक्ति मिले, इस हेतु यहां प्रतिदिन चैला चाढ़ाया जाता है साथ ही रोजाना होने वाली पूजा भी महत्वपूर्ण है इन सभी दैनिक क्रियाएं प्रतिमा के तेज को और बढा रही। बरसों से चोले चढाने के क्रम यहां पर चलता है। तलाई वाले बालाजी के भक्त मंदसौर नगर में ही नहीं, विदेशों में भी रहते हैै। वह नियमित दर्शन करने और मनोकामना मांगने के लिए साउथ अफ्रीका, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, केन्या आदि देशों से आते हैं।

इतिहास- लगभग 700 वर्ष पुरानी बालाजी की प्रतिमा प्रारम्भ में विशाल वटवृक्ष के नीचे विराजित थी, यह स्थान शहर से दूर सूबा साहब (कलेक्टर) बंगले के पास स्थित था। मंदिर के पास ही एक तलाई थी जिस पर वर्तमान में नगरपालिका तरणताल स्थित हैं। किवंदती हैं कि इस प्रतिमा की स्थापना अत्यंत सिद्ध परमहंस संत द्वारा की गयी थी, बहुत समय तक यहाँ बनी धर्मशाला, तलाई एवं मंदिर साधु संतों एवं जमातों का विश्राम एवं आराधना स्थल रहा।
उपलब्ध प्रमाणों से ज्ञात होता हैं कि नगर की प्रमुख फर्म एकामोतीजी के श्री फूलचंद जी चिचानी, श्री बद्रीलालजी सोमानी, श्री नत्थूसिंह जी तोमर ने लम्बे समय तक अपनी सेवाएं दी। (अन्नत श्री विभूषित ब्रह्मलीन पूज्य राजारामदास जी महाराज अधिष्ठाता, श्री पंचमुखी बालाजी मंदिर, भीलवाड़ा) ने भी 1940 ई. में यहाँ रहकर साधना की हैं।
सन 1964 में बालाजी मंदिर न्यास के गठन के बाद मंदिर परिसर का योजनाबद्ध तरीके से विस्तार किया जा रहा रहा हैं । 1995 के पश्चात् मंदिर के पुनर्निर्माण के कार्य के अंतर्गत 85 फ़ीट ऊँचा शिखर तथा निज मंदिर का निर्माण लगभग पूणर्ता की ओर है, इसमें बालाजी के स्थानीय भक्तों के अतिरिक्त देश-विदेश में फैले भक्तों का सहयोग रहा हैं ।
मंदिर के आस-पास का सारा इलाका बालागंज के नाम से ही जाना जाता हैं। बालागंज के सभी रहवासी भगवान को अपना परिजन ही मानते हैं और स्वयं को उनके अपने भी यहाँ के युवाओं के बल, बुद्धि, एवं प्रताप में बालाजी की फलक व्याप्त हैं और सारा नगर इसे मानता भी हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बालाजी मंदिर के पास होने के कारण संभवत: पूरे क्षेत्र का नाम बालागंज पढ़ा होगा।

आस-पास सहित दूर-दूराज के क्षेत्रवासी नगर के इस प्राचीन हनुमान जी के मंदिर को तलाई वाले बालाजी के नाम से जानते है। प्राप्त जानकारी अनुसार यह प्रतिमा करीब 1000 साल पुरानी है एवं जिले में ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अद्वितीय है, जिसे तलई वाले बालाजी के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की यह मान्यता है कि यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है। इस प्राचीन मंदिर को भव्य स्वरूप देने के लिए निर्माण कार्य पिछले 20 सालों से चल रहा है। जिसमें शिखर का निर्माण हो चुका है। अन्य निर्माण कार्यजारी है। मंदिर निर्माण में लगने वाले पिंक पत्थर को बंशी, पहाडपुर (राजस्थान) से मंगवाया गया है। मंदिर में भारत ही नही बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते है।

दैनिक आरती समय- भगवान श्री तलाई वाले बालाजी सभी के संकटों को दूर करते हैं व सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। इस कारण से भक्तजनों तथा माता-बहिनों की अगाध श्रृद्धा इस मंदिर पर है। मंदिर के पट प्रातः 5:30 पर खुलते हैं। प्रातः 7 बजे राम रक्षा स्त्रोत का हवन होता है। प्रातः 7:30 बजे आरती एवं प्रसाद वितरण के बाद 8 बजे बालाजी को रामचरित मानस का पाठ सुनाया जाता है। प्रातः 11 बजे भगवान को भोग लगाया जाता हैं। दोपहर 12 बजे से 4:30 तक विश्रांति के लिए पट मंगल हो जाते हैं। पुनः मंदिर के पट सांय 4:30 खुलते हैं। सांय 5 बजे भगवान को सुन्दरकाण्ड सुनाया जाता है। सांय 7 बजे मुख्य आरती की जाती हैं इसके पश्चात् रात्रि 10 बजे शयनकाल तक भजनकीर्तन किया जाता है।

बालाजी का चौला- यह एक ऐसा अनूठा मंदिर हैं जहाँ चौला चढ़ाने के लिए वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मंगलवार को चौला चढ़ाने के लिए 2042 तक की तिथियाँ अभी से बुक है। आस्था का अनूठा सैलाब यहाँ प्रतिदिन दिखाई देता है। हनुमान जयंती एवं राम नवमी की छटा तो अत्यंत दिव्य और निराली होती है। मंदिर में प्रतिदिन श्री बालाजी को चोला चढ़ाया जाता है और त्योहारों पर विशेष चोला चढ़ाया जाता है। चोला घोदान की राशि इस प्रकार है-
1. सामान्य दिनों में श्री बालाजी को चोला चढ़ाने की राशि – 351/- रूपये
2. मंगलवार और शनिवार को श्री बालाजी को चोला चढ़ाने की राशि – 501/-के रूप में
3. श्री हनुम जयंती पर श्री बालाजी को चोला चढ़ाने की राशि – 2100/- रूपये
4. शिवरात्रि, जन्ममस्तमी, रामनवमी और एकदशी को श्री बालाजी को चोला चढ़ाने की राशि – 1100/- रूपये
5. राम संरक्षित स्त्रोत प्रतिदिन हवन राशि – 51/- रुपए

प्रसाद- बालाजी को मालवा-मेवाड़ का मिष्ठान्न चूरमे का लड्डू बहुत पसंद है, भक्तगण प्रति मंगलवार एवं शनिवार को चूरमे के लड्डू का भोग लगाते हैं। भोग के बाद प्रसाद के रूप में इसे ही बाँटा जाता है।

मंदिर समिति- वर्तमान में बालाजी मंदिर न्यास के अध्यक्ष पद को धर्मनिष्ठ, समाजसेवी, एडवोकेट श्री धीरेन्द्र जी त्रिवेदी सुशोभित कर रहे हैं, उनके साथ पूर्ण समर्पित भाव से उपाध्यक्ष श्री दिलीप जी जोशी, सचिव श्री भागीरथ जी हिवे, सह-सचिव श्री धन्नालाल जी माली, कोषाध्यक्ष श्री गोपाल जी गोयल तथा श्री ओमप्रकाश जी व्यास, न्यासीगण श्री जयप्रकाश जी सोमानी, श्री सुशील जी गुप्ता, श्री महेश जी कटलाना, श्री अशोक जी गुप्ता, श्री निरंजन जी अग्रवाल एवं श्री हरिओम सिंह जी तोमर कार्य कर रहे है।

बंदरों ने नहीं बनने दिया था शिखर
बालाजी प्रबंध समिति के अध्यक्ष धीरेन्द्र त्रिवेदी ने बताया कि यहां जब मंदिर शिखर निर्माण कार्य शुरू हुआ तो बंदरों ने बहुत परेशान किया। करीब 5 साल तक बंदरों ने शिखर नही बनने दिया। बाद में विधिवत यहां विद्वान दादाजी कृष्णशंकर शास्त्री ने विद्यावाच स्पति कराया। इसके बाद आचार्यश्री रामानुजजी के मार्गदर्शन में निर्विघ्न मंदिर निर्माण शुरू हो गया।

मंदिर न्यास के विशेष अनुरोध पर भागवत विद्यापीठ अहमदाबाद के अधिष्ठाता पूज्य दादाजी श्री कृष्णशंकर जी शास्त्री ने अपने सुयोग्य एवं सबसे प्रिय शिष्य आचार्य रामानुज जी को मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण होने तक देखरेख करने का आदेश दिया, 1997 से आचार्य रामानुज जी के मार्गदर्शन में ही सारा कामकाज निर्बाध एवं सफलतापूर्वक चल रहा है। आचार्य जी ने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सम्पूर्ण मन्दसौर वासियों को एकसूत्र में बांध रखा है, प्रतिवर्ष उनके अनुष्ठान में सारा अंचल भाग ले रहा हैं, अब वे हमारे ही बन गए है । उनकी प्रेरणा से भक्तगण तन, मन, एवं धन को बालाजी की सेवा में लगाकर स्वयं को धन्य मानते हैं।

श्री बालाजी टेम्पल, तलाई वाले बालाजी