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नालछा माता मंदिर

जहां एक ही गादी पर विराजते हैं माता और भैरव-निराला है मंदसौर के अतिप्राचीन नालछा माता का दरबार, जो शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है।

जहां एक ही गादी पर विराजते हैं माता और भैरव-निराला है मंदसौर के अतिप्राचीन नालछा माता का दरबार, जो शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। शहर से करीब 5 किमी दूर ग्राम नालछा में स्थित मां नालछा माता का मंदिर अपने आलौकिक चमत्कारों के चलते तो प्रख्यात है, ही वहीं मान्यता है, कि यह ऐसा अद्वितीय मंदिर है, जहां माता रानी और भैरवनाथ दोनों एक ही गादी पर विराजित हैं। मॉ नालछा का यह अतिप्राचीन मंदिर जो कि देश के चुनिन्दा शक्तिपीठों में से एक है। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में भी मिलता है।

विश्व की एकमात्र प्रतिमा जिसमे माँ भवानी (नालछा) और बाबा भैरव एक ही गादी पर विराजित है। श्री नालछा माता मंदिर मंदसौर (दशपुर) नगर के दक्षिण मे पशुपतिनाथ मंदिर से 2.6 किमी एवं ग्राम नालछा , मंदसौर बायपास से भी 0.5 किमी दूरी पर स्थित है। यह स्थान अत्यंत प्राचीन , धार्मिक , चमत्कारिक व दर्शनीय है। श्री नालछा माता मंदिर एतिहासिक दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है। दुर्गा सप्तशती के अध्याय षष्टम मे माँ नालछा रानी का एक और नाम पद्मावती देवी के रूप मे वर्णित है (ऐसी मान्यता है)| जिसमे वे स्वयं अपने समीप भैरो बाबा को स्थान देती है। जो कि प्रमाणित है।

इसका वास्तविक नाम नहरसिंही माता है। नालछा ग्राम का नाम है। प्रचलन है की यहाँ पर माता नालछा के तीनो रूपों के दिव्य दर्शन होते है। (प्रातः में बाल्यावस्था , दोपहर में युवावस्था एवं रात्रि में वृद्धावस्था के दर्शन होते है। ) नवरात्रि के पंचमी को माता का विशेष श्रृंगार स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों से होता है। प्राचीन कहावत है की यह स्थान राजा दशरथ के राज्य अयोध्या की सीमा का अंतिम पड़ाव था। श्रवण कुमार की हत्या राजा दशरथ के हाथों यही हुई थी , जो शिकार खेलने के लिए अपने राज्य की अंतिम सीमा पर आए थे। पूर्व में मंदिर का स्वरूप बहुत छोटा था।

दशपुर नगर की श्रद्धालु जनता ने तन-मन-धन से सहयोग कर मंदिर को माताजी के आशीर्वाद से भव्य स्वरुप प्रदान किया है। वर्त्तमान में माताजी प्रति रविवार प्रातः 8:30 बजे से महाआरती का आयोजन होता है। चैत्र नवरात्रि में प्रतिदिन धार्मिक आयोजन होते है। नवरात्रि के एकम के दिन घट स्थापना व् समापन के अवसर पर रविवार के के मंदिर पर श्रद्धालुओं के सहयोग से महाप्रसादी (लंगर) का भव्य आयोजन किया जाता है। जिसमे हज़ारों धर्मप्रेमी श्रद्धालु श्रद्धा के साथ धर्म लाभ लेते है। साथ ही अश्विन नवरात्रि पर दशहरा समापन पर चूल ( अग्नि प्रवेश ) का आयोजन रखा जाता है। जिसमे हज़ारों श्रद्धालु नर- नारी भाग लेते है। सन् 1992 में मंदिर व्यवस्था एवं देख-रेख का कार्य जय मातादी ग्रुप द्वारा संचालित था। वर्तमान में श्री नालछा माता मंदिर प्रबंध समिति एवं जय मातादी ग्रुप की देख-रेख में मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है। सन् 2000 में माताजी के आशीर्वाद से समिति एवं ग्रुप के तत्वाधान में आचार्य श्री पं. जयदेव जी शास्त्री शंङ्कर वेदांताचार्य , बनारस के आचार्यत्व में संतचंडी महायज्ञ एवं नवदुर्गा मूर्ति प्रतिष्ठा का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस भव्य आयोजन की पूर्णाहूति अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के आचार्य स्वामी 1008 श्री रामदयाल जी महाराज के आशीर्वचनों से पूर्ण हुई। सन् 2002 में अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संत के कर कमलों द्वारा माताजी के मंदिर पर शिखर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ व् मात्र 9 माह की अवधि में 52 फीट ऊँचा शिखर का भव्य निर्माण हुआ।

मंदिर पर शारदेय और चैत्र नवरात्रि में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं, साथ ही प्रति रविवार सुबह शाम माता की महा आरती का आयोजन भी किया जाता है। नालछा माता मंदिर के नियमित भक्तों हरिश अग्रवाल और रमेश अग्रवाल की माने तों मंदिर का इतिहास काफी पुराना है, जिसके बारे में कुछ भी कहा जाना मुश्किल है। बताया जाता है, कि ग्राम नालछा महाराजा दशरथ ही अयोध्या रियासत का अंतिम छौर था। यहां सैकड़ों वर्षो पुराने इस नालछा माता मंदिर की ख्याती करीब 3 दशकों से काफी बड़ी है। शहर ही नहीं अपितु जिले व प्रदेश के विभिन्न अंचलों से भी भक्त यहां माता रानी के दर्शन हेतु आते हैं। श्री अग्रवाल ने बताया कि सभी माता मंदिरों में भैरवनाथ का मंदिर हमेशा माता के मंदिर से अलग नजदीक स्थान पर होता है, लेकिन नालछा माता में ऐसा नहीं है, यहां माता और भैरवनाथ दोनों एक साथ एक ही गादी पर विराजित है। मान्यतानुसार नालछा माता मंदिर अत्यंत चमत्कारी और सिद्ध स्थल है।

यहां प्रति रविवार आने वाले भक्तों का कहना है, कि यहां माता से जो भी सच्चे मन से कोई भी मुराद मांगता है, वो कभी खाली हाथ नहीं लौटता। अब तक शहर के कई धन्ना सेठ मां नालछा के कृपा के उदाहरण हैं। कई लोग एसे भी हैं, जो बिल्कुल रंक थे, लेकिन नालछा माता की नियमित श्रद्धापूर्वक भक्ति से आज वै राजा बन गए हैं।ये होते हैं आयोजनशारदेय नवरात्रि के दौरान नालछा माता मंदिर पर एकम् के दिन घटस्थापना होती है। इसके बाद जेवर श्रृंगार दर्शन, वहन, वाड़ी, चूल आदि के आयोजन होते हैं। इस वर्श भी यह सभी आयोजन होगे।

इतिहास

ईस्वी सन 1691 कट्टर सुन्नी बादशाह मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब मन्दसौर के किले में शाही मुकाम किये हुए था ! वजीर ने आकर खबर दी कि -‘पूरी सेना नालछा के मैदान में ठहरी हुई हे लेकिन बड़ा अजीब नज़ारा पैदा हो गया है।  औरंगजेब ने पूछा- ‘नालछा अजी। वह तो मांडव के किले के निकट है न, मालवा कि राजधानी मांडव को ही तो कहते रहते हे। यहां कैसा मांडव, यहां कैसा नालछा। वजीर पहेलियाँ मत बुझाओ साफ़ साफ़ कहो तुम क्या कहना चाहते हो ? ‘

औरंगजेब के तेवर देख कर वजीर भयभीत हो गया। बादशाह की नाराजगी की दहशत से उसे कंकंपी छूट गई। उसने अपने आपको संभाला तथा कहा -‘ जहापनाह ! यहां भी एक नालछा ग्राम है। जब भी शाही सेना मुकाम करती है, वह इसी मैदान में ठहरती है। अभी भी बादशाह आलम की फ़ौज यहीं ठहरी हुई है। ‘

‘वजीर ! तब दिक्कत क्या है ? क्या कोई काफ़िर टकराने के लिए यहाँ पहुंच गया है ?’ ‘जी नहीं हुजूर ! हुजूर-ए-आला की फ़ौज की छेड़छाड़ किसकी माँ ने शेरनी का दूध पिया है जो करेगा। अभी भी चारों और आपका ही डंका बज रहा है। ‘ ‘फिर क्या बात है ? खबर देते हुए और अपनी बात पूरी करते हुए तुम्हारे चेहरे की हवाइयां क्यों उड़ रही है ? ‘ ‘जी जहांपनाह ! खबर ऐसी ही है। न जाने क्यों वहां फ़ौज में खौफ छा रहा है ?’

औरंगजेब तब संत मंगलदास बैरागी के साथ बैठा चर्चा कर रहा था। मंगलदास बैरागी मन्दसौर खाकी कुआ के संत थे। वे सत्य तथा भक्ति विषय पर बादशाह के साथ शास्त्रों का दृष्टिकोण विवेचित कर रहे थे। वजीर के आने पर बादशाह ने उसकी ओऱ मुखातिब होकर खबर सुनने के लिए बातचीत शुरू कर दी। संत मंगलदास चुपचाप हो गए। वजीर ने कहा कि – ‘ फ़ौज के मुकाम पर एक अदृश्य अनोखा खौफ फैला हुआ है। वहां रह कर शेर के दहाड़ने की जोर जोर से आवाज़ आती है। गुप्तचर विभाग के लोग तथा फ़ौज के रक्षक दूर – दूर तक जंगल छान आये हैं लेकिन कहीं किसी शेर का पता नही हैं। ज्यों ज्यों शेर की खोज की जाती है, शेर की दहाड़ का स्वर तीखा होने लगता है। प्रत्येक सिपाही का ऐसा अनुभव हो रहा है, मानो शेर उसी के एकदम निकट है। वह गुर्रा कर उस पर हमला करना चाहता है। फ़ौज के जवानों का आत्मबल कमजोर हो गया है। फ़ौज की टुकड़ियां शेर की हर क्षण तलाश कर रही है।

औरंगजेब ने कहा – ऐसा स्थान है तो इसे हाथ न लगाया जाए। फ़ौज के सिपाहियों को ताकीद कर दो की वे हर प्रकार से बुतखाने को पाक रखे।

वजीर ने कहा – ‘ जी ! हुकुम ! तथा चला गया। ‘ औरंगजेब पुनः संत मंगलदास बैरागी से चर्चा में व्यस्त हो गया। फ़ौज को ताकीद कर दी गई। उस समय औरंगजेब ने हुक्म दे रखा था की उसकी फ़ौज के रास्ते में जितने भी मंदिर आए उन्हें नष्ट कर दिया जाए। इस कारण हज़ारों मंदिर ध्वस्त कर दिए गए लेकिन औरंगजेब के विषयमे एक धारणा और प्रचलित है, उसे आभास होता था या प्रत्यक्ष होता था की किसी स्थान पर चमत्कार है, किसी विशिष्ट शक्ति का निवास है तो वह उस देवस्थान / मंदिर / आलय को नही गिराता था।