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हजरत नाहर सैयद दरगाह – मंदसौर

हिन्दू मुस्लिम कौमी एकता की मिसाल है हजरत नाहर सैयद दरगाह

हर साल की तरह इस साल भी लगेगा यहा तीन दिवसीय मेला

मालवा व मेवाड में सुफी परम्परा लगभग 1200 वर्ष पुरानी है। मालवा में सुफी परम्परा की शुरूआत हिजरी सन 285 में हुई तब से लेकर अब तक सुफी संतो ने पुरे मालवा ने हिन्दू मुस्लिम भाई चारे का संदेश देते हुए दोनो कौमों के मध्य आपसी सौहार्द कायम करने का काम किया।

मंदसौर की नाहर सैयद दरगाह भी हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की प्रतीक है। हर साल होली के त्योहार पर यहां बाबा नाहर सैयद का उर्स मनाया जाता है। हिन्दु मुस्लिम दोनो कौम के लोग बिना किसी भेदभाव के हर साल यहॉं उर्स में पहुॅचते है और उनके दर पर शीश नवाते है और मन्नते मांगते है। नाहर सैयद बाबा की दरगाह पर उर्स के मौके पर महिलाऐ पास स्थित यहां के तालाब में स्नान कर अपनी गोद भरने की मन्नत मांगती है तो बाबा के आशीर्वाद से औलाद पाने की उसकी तमन्ना जरूरी पुरी होती है। हर साल हजारों की संख्या में महिलाये नाहर सैयद के उर्स में आती है और मन्नते मांग कर अपनी तमन्ना पुरी करती है। यहां जितनी मुस्लिम महिलायें आती है उतनी ही हिन्दू महिलाये भी आती है और बाबा की दरगाह पर जियारत कर अपनी मन्नत पुरी करती है। निसतान दम्पत्ति को नाहर सैयद खुदा के आशीर्वाद से औलाद देते है।

हजरत नाहर सैयद की दरगाह सभवत पुरे हिन्दुस्तान में ऐसी दरगाह है जहां सुफी संतका उर्स हिजरी सन चॉद की तारिख से नही मनाया जाता बल्कि हिन्दु तिथि से मनता है। हर वर्ष होली पर ही बाबा का उर्स आता है। सैकडो सालो से यह परम्परा मंदसौर में चल रही है। नाहर सैयद का जन्म 16 वी शताब्दी में धार जिले में हुआ । वे अध्यात्म व गुरू की तलाश में कम उम्र ही निकल गये और 17 साल की उम्र में अजमेर पहुॅचे और ख्वाजा गरीब नवाज के वशंज खवाजा हसन चिश्ती के शिष्ट बन गये। सैयद नाहर एकान्त में साधना करना पसद करते थे। उन्होने मंदसौर नगर के समीप एक तालाब में जिसे अब नाहर सैयद तालाब कहते है। वहा उन्होने एक पुराने विशाल पेड के तने में अपना मुकाम बनाया। इस पेड के तने में उन्होने 34 साल कीउम्र तक धर्म साधना की । हिजरी सन् 985 अर्थात 1579 में उन्होने अपनी देह का त्याग किया। आज उसी पेड के तने में उनकी मजार है। सैयद नाहर को जिस पेड के तने में जहॉं वे रहते थे उसी जगह सुपुर्ते खाक किया गया । उनके अनुयायीयो ने उसी जगह उनकी मजार बनाई।

कहा जाता है कि उनके 11 चिल्ले थे अर्थात 11 मुकाम थे लेकिन उनके अन्य मुकामों की अभी कोई अधिकृत जानकारी नही है। हजरत नहार सैयद एकान्त में साधना करने वाले सुफी संत थे। भारत में सुफी संतो की परम्परा ने सदैव एकता व भाईचारे का संदेश दिया है। कट्रपंथी फिरकापरस्त ताकतों को सुफी संतो ने सदैव नकारा है। भारत में सुफी संतो की परम्परा के कारण हिन्दु मुस्लिम भाईचारा सदैव कायम रहा है और आगे भी कायम रहेगा। भारत सुफी संतो की तपोभूमि है यहॉंसे पुरी दुनिया को शांति व मानवता का पैगाम सुफी संतो ने दिया है। यह सभी लेख गुल्जारे एतरार पुस्तक में दर्ज है। इस पुस्तक का लेखक कमाल उ्द्दीन रे.अ.के शिष्य मो गांेसी सत्तारी ने किया है।

मालवा में सुफी परम्परा की शुरूआत 285 हिजरी में हुई मंदसौर क्षैत्र में सुफी बुजुर्ग मदारी सत्तारी अरगुनी सभी परम्पराओं के सुफी संत आये इसके साथ ही कादरी जाफीरी सत्तारी अल्वी नक्श -बंदी आदि सुफी संतो ने खुदा की एकान्त में इबादत के अलावा कव्वाली, मुशायरा और संगीत के माध्यम से खुदा की इबादत को प्रोत्साहन दिया और समाज में जातिवाद, छुआछुत और अमीर गरिब के भेदभाव को दूर करने की कोशिश की ।इन सुफी संतो ने शिक्षा का महत्व बताकर अज्ञानरूपी अंधकार को भी दूर करने का प्रयास किया। इन सुफी संतो ने समाज में प्रचलित कुप्रथाओं के विरूद्ध जिहाद छेडा। पिर मदार, पिर अमान उल्ला इराकी बी बी नसीबा के साहब जायदे जानेमन जनती भांजे गोसुल आजम और पिर अब्दुल वाहीद गोदर शाह चिमन चिश्ती, गेबशाह टोडे, पिर सैयद मीरा अली दातार पंच पिर और सैयद नहार बियाबानी जैसे सुफी संतो ने मालवा क्षैत्र में कठोरतम धर्म साधना की। सैयद बक्शु ने नशे के खिलाफ लोगो को आगाह किया और नशे की बुराईयो से समाज को दूर रहने की प्रेरणा दी। इन सभी सुफी संतो के चमत्कारों की कई कहानिया आज भी प्रचलित है। मंदसौर जिले में धार्मिक सामाजिक पुर्नजागरण में इन सुफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

नाहर सैयद बाबा की दरगाह पर  41 वर्षो से मंदसोर नपा परिषद उर्स के मोके पर मेला आयोजित करती आयी है। प्रहलाद बंधवार की पूर्व परिषद ने इस मेले की ख्याति बढाने के लिये काफी काम किया था। पहले यह मेला एक दिन का लगता था तथा मेला में केवल कव्वाली का प्रोगाम होता था। बंधवार की नपा परिषद ने इस मेला को तीन दिवसीय किया। मेला में सुफीयाना कव्वाली व मुशायरा का आयोजन करने की परम्परा बंधवार के कार्यकाल में ही शुरू हुई जो कि अब तक जारी है। नाहर सैयद तालाब की बाउण्डीवाल बनाने और नाहर सैयर रोड के विकास के लिये बंधवार की परिषद ने काम किया। आज नाहर सैयद मेला और उर्स अपनी ख्याति के कारण पुरे देश में पहचान बना चुका है।

संकलनकर्ता- सैयद सलीम शाह, बागवाले, सदर शाह जमात मंदसौर

454 वे उर्स के मौके पर विशेष आलेख