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बड़ी होली : मंदसौर शहर

मंदसौर बड़ी होली का नाम तो सब लोग बचपन से कहे या दशकों से सुनते आ रहे है लेकिन इसका नाम ये क्यो पड़ा ये कोई नहीं जानता, इसका राज इस नाम मे ही छुपा है। यहा शहर की सबसे पुरानी परम्परा कहे या उसका वास्ता जुड़ा है इस बड़ी होली से शहर की एकता का परिचायक है ये “बड़ी होली”

होली आते ही शहरवासियों को विरासत में मिली परंपराओं का जिक्र होने लगता है। समय के साथ इन परंपराओं का निर्वहन फीका जरूर हो गया, लेकिन खत्म नहीं हुआ। शहर क्षेत्र में न्यायालय परिसर से सटे इलाके को ‘बड़ी होली’ के नाम से पहचाना जाता है। इसका यह नाम पड़ने के पीछे की कहानी होली पर ही आधारित है। दशकों पहले तक बड़ी होली के दहन का इंतजार पूरा शहर करता था। रात 3.30 बजे बड़ी होली दहन होने के बाद इस की आग से ही शहर के 12 पुरों की होलियों का दहन होता था। सबसे पहले जलने के कारण यहां की होली को शहर की सबसे बड़ी होली कहा जाता था, इसी के चलते क्षेत्र का नाम ही बड़ी होली पड़ गया।

आज बड़ी होली क्षेत्र में शहरभर की ही तरह ही होलिका दहन होता है। इसमें जिस स्थान पर होलिका रोपी जाती है वहां 100 बरस से भी अधिक समय से होलिका दहन हो रहा है। क्षेत्र का नामकरण बड़ी होली क्यों हुआ, नई पीढ़ी को ठीक से इसकी जानकारी ही नहीं है। बड़ी होली निवासी 90 वर्षीय सागरमल रजवानिया ने बताया कि पूरे शहर में जब एकमात्र स्थान पर होलिका का दहन होता था, वह स्थान वर्तमान का बड़ी होली क्षेत्र ही है।

बड़ी होली मे होलिका दहन के बाद में खानपुरा, जनकुपुरा, मदारपुरा, नृसिंहपुरा, नयापुरा, खाजपुरा, खिलचीपुरा, चंदरपुरा, जगतपुरा सहित सभी 12 पुरों में दहन प्रारंभ हुआ। सभी क्षेत्रों के लोग इस क्षेत्र की होली को बड़ी कहने के साथ बड़ेपन का सम्मान भी देते रहे। इसी कारण 12 पुरों की होलिका को जलाने के लिए बड़ी होली जलने का इंतजार होता था। रजवानिया ने बताया कि रात 3.30 बजे बड़ी होली में लापा लगता था। इसके बाद शहर क्षेत्र में स्थित 12 दरवाजों से 12 पुरों के लोग आते और यहां से आग ले जाकर अपने-अपने पुरों की होली जलाते थे। करीब तीन दशक पहले तक भी ऐसा ही होता था, लेकिन बाद में धीरे-धीरे शहर बढ़ने के साथ ही 21वीं सदी के मंदसौर में यह परम्परा खत्म होने लगी। 12 पुरों के साथ ही शहर में 200 से अधिक स्थानों पर होलिका दहन होता है। लेकिन शहर को 20वीं सदी से विरासत में मिली इस परम्परा को शहर क्षेत्र के भोईवाड़ा, कोलीवाड़ा, सिंगार गली, कंधोरा गली, गो पान वाली गली सहित आधा दर्जन क्षेत्रों के लोग आज भी निभा रहे हैं। इन क्षेत्रों की होलियों दहन के लिए बड़ी होली से ही आग पहुंचती है। बड़ी होली आज भी रात 3.30 बजे के बाद ही जलती है।