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महालक्ष्मी मंदिर – चंदवासा (शामगढ़)

शामगढ़ तहसील के चंदवासा में होलकर रियासतकालीन करीब 250 साल पुराना महालक्ष्मीजी का मंदिर है। यह मंदसौर-नीमच जिले में इकलौता प्राचीन मंदिर है। वैसे तो वर्षभर दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं लेकिन दीपपर्व के दौरान यहां विशेष रूप से लोग पूजन व दर्शन करने पहुंचते हैं। दीपावली पर बुधवार को महाआरती की गई। गुरुवार को अन्नकूट होगा।

चंदवासा धमनार की पहाड़ी और उस पर बने श्रीधर्मराजेश्वर मंदिर व पांडवकालीन गुफाओं के कारण प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र होल्कर स्टेट में आता था। पुजारी गंगाराम तिवारी (65) ने बताया कि मंदिर 250 साल से भी ज्यादा पुराना है। इसकी स्थापना क्षेत्र में रहने वाले दक्षिणी ब्राह्मणों द्वारा होल्कर शासनकाल में की गई थी। उस दौर में यहां करीब 150 परिवार दक्षिण ब्राह्मणों के हुआ करते थे और वे देवी महालक्ष्मी की उपासक थे। हमारे पास उपलब्ध जो पांड़ुलिपियां हैं उसके कुछ पन्नों का हिंदी में रूपांतर करवाया था। उसके अनुसार इस क्षेत्र में चंबल नदी किनारे महाराजा यशवंत राव होल्कर आते रहते थे। एक बार मंदिर का निर्माण करने वाले दक्षिणी ब्राह्मणों ने उनसे मंदिर के लिए मदद मांगी थी। तब महाराजा ने जमीन के साथ पूजन आदि सामग्री के लिए प्रतिमाह राशि देने की व्यवस्था की थी। होल्कर की राजधानी भानपुरा से इंदौर जाने के बाद एक-एक कर दक्षिणी ब्राह्मण यहां से जाने लगे और आजादी पहले तक सभी परिवार यहां से इंदौर सहित अन्य शहरों में चले गए। हमारे पूर्वज शुरू से ही दक्षिणी ब्राह्मणों से जुड़े थे। इसी कारण यहां की पूजा का अधिकार हमें मिला और हमारा परिवार मंदिर की देखरेख कर रहा है।

लक्ष्मीजी के साथ विराजित है देवी अन्नपूर्णा
मंदिर में धन और वैभव की देवी महालक्ष्मी की सफेद पत्थर से बनी बैठी हुई मुद्रा में प्रतिमा है। जबकि पास में ही धान्य की देवी अन्नपूर्णा व श्रीगणेशजी की प्रतिमा है। साथ ही श्रीराधा-कृष्ण व बजरंग बली की प्रतिमा भी है, जो समकालीन है। मंदिर में विराजित लक्ष्मीजी के पास गणेशजी व देवी अन्नपूर्णा और राधाकृष्ण के साथ अन्य प्रतिमाएं।

मान्यता है कि हर मनोकामना हाेती है पूरी
मान्यता है कि महालक्ष्मी के दर्शन करने और मन्नत करने पर पूर्ण होती है। जिनकी मानता पूर्ण होती है वे दीपावली पर पूजन व दर्शन करने अवश्य आते हैं। पुजारी गंगाराम तिवारी ने बताया कि यदि धन-धान्य का अभाव और तो यहां आकर माताजी के सामने प्रार्थना और मन्नत करने से वह पूरी होती है। इसके लिए दीपावली के दिन यहां कलावा(नाड़ा) जिसे सामान्य भाषा में पूजन का धागा कहते है। मनोकामना बोलते हुए बांधा जाता है। मनोकामना पूर्ण होने पर उसे खोलकर मानता पूरी करते हैं।