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जगदीश मंदिर – खानपुरा

जगदीश मंदिर, शिवना तट, खानपुरा, मन्दसौर

भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए सुखद समाचार

मन्दसौर में शिवना तट पर 500 से अधिक वर्षों से बिराजे हैं- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (4 जुलाई) रथयात्रा दिवस पर विशेष

मन्दसौर (निप्र) अभी तक बहुत ही कम लोगों को यह ज्ञात है कि ऐतिहासिक व प्राचीन नगरी दशपुर (मन्दसौर) में शिवना नदी के पावन तट पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के काष्ठ स्वरुप में विग्रह विराजित हैं। शिवना मैया सैंकड़ों वर्षों से जिनके चरण पखार रही है। पुरातन समय से यह जगदीश मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मन्दसौर (मध्यप्रदेश) के खानपुरा में बाढ़ नियंत्रण पाल के पास स्थित भावसार धर्मशाला से मात्र एक सौ मीटर दूर लच्छा बनाने वालों की गली में आगे जाकर शिवना मैया के तट पर स्थित है। इस मंदिर के पत्थरों की बनावट व शिल्पकला के अनुसार जानकारों का यह मानना है कि यह मंदिर अति प्राचीन होकर 500 से अधिक वर्ष पुराना है। मंदिर में विराजित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के विग्रह दारु (काष्ठ) के हैं जो पुरी (उड़ीसा) के विश्व विख्यात भगवान जगन्नाथ मंदिर की प्रतिकृति है। इस पावन धाम पर अनेक साधु-संतों ने समय-समय पर वास किया है। यह एक सिद्ध स्थल है। इस पवित्र तीर्थ स्थल की मान्यता है कि यहां पर केवल ब्रह्मचारी ही आश्रय प्राप्त करते आए हैं। किसी गृहस्थ को भगवान यहां आश्रय प्राप्त नहीं करने देते हैं। जो भी यहां जगत के नाथ की शरण में आता है प्रभु उस पर पूरी तरह कृपावंत होते हैं। भक्त अपनी आशा से अधिक यहां से पाकर जाता है।

मन्दसौरवासियों का यह परम सौभाग्य है कि परम प्रभु हमारे यहां प्राचीन समय से बिराजे हैं। पूरे भारतवर्ष में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की असीम कृपा से ही कुछ विशिष्ट स्थानों पर मंदिरों की स्थापना हुई है। यह हमारे उपर उनकी बड़ी ही कृपा है। जगत् के नाथ के करोड़ों भक्त हैं लेकिन वे बार-बार पुरी (उड़ीसा) जाने में समर्थ नहीं हो पाते हैं। ऐसे प्रभु के भक्तों के लिए यह एक बहुत ही सुखद समाचार है। वे जब चाहें प्रभु के दर्शनों का लाभ आसानी से ले सकते हैं।

भगवान जगन्नाथ के दर्शन एवम् पूजा तत्काल फल देने वाली है। जगन्नाथ भक्तों के दुःख दूर करने वाले व असीम आनंद प्रदान करने वाले हैं। संसार में भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए ही भगवान जगन्नाथ का काष्टमय प्राकट्य हुआ है। इसका पूरा विधान स्कंद पुराण में उल्लेखित है। आमतौर पर मंदिरों में पाषाण अथवा धातु की होती है व भगवान अपनी पत्नी के साथ विराजते हैं जबकि जगत् के नाथ दारू (काष्ठ) स्वरुप में अपने भाई व बहिन के साथ बिराजते हैं।

मन्दसौर स्थित भगवान जगन्नाथ धाम के बारे में यहां के भक्तों द्वारा स्वयं अनुभव की गई अद्भुत व भावनात्मक अनेक गाथाएॅं सुनने को मिलती है। परम प्रभु के अनन्य भक्त खानपुरा निवासी वयोवृद्ध श्री नन्दलाल परमार ’’प्रेम’’ अपने बाल्यकाल से ही भगवान जगन्नाथ की सेवा में लगे हैं। प्रभु के बारे में चर्चा करते समय उनकी आंखों में एक अलग ही चमक आ जाती है। वे बताते हैं कि यह कोई साधारण स्थान नहीं है, यह एक तपो भूमि है। उन्होंने बताया कि जगत के पालनहार मुझे दर्शन देते हैं। इनकी मुझ पर व मेरे परिवार पर बड़ी ही कृपा है। लगभग 5-6 वर्ष पूर्व रथयात्रा दिवस पर समाचार पत्रों में समाचार पढ़कर आए एक दर्शनार्थी ने मुझे चर्चा के दौरान बताया कि कई वर्षों पूर्व मुझे यहां सेवा का अवसर प्राप्त हुआ था। आज मैं जो कुछ हूॅं वह भगवान जगन्नाथ की कृपा से हूॅं।

इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर में पांच फीट उॅंची खड़े भक्त हनुमानजी की विशाल व आकर्षक प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित है जो बहुत ही प्रतापी व चमत्कारी है।

गोपालकृष्ण पंचारिया (न्यास अध्यक्ष)
9827363040