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श्री वहि पार्श्वनाथ जैन तीर्थ, मंदसौर

है ये पावन भूमि, यहाँ बार – बार आना ।
प्रभु पार्श्व के चरणों में आकर के झुक जाना ।।

मन्दसौर शहर से मात्र 15 कि मी की दुरी परवही स्थित इस तीर्थस्थल की स्थापना राजा संप्रति ने की थी। यहां भगवान वही पार्श्‍वनाथ की काले रंग की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में विराजमान है। मूर्ति के स्थित पास बाघ की आकृति बेहद खूबसूरत प्रतीत होती है। श्री वही पार्श्‍वनाथ श्वेतांबर जैन तीर्थ नामक ट्रस्ट इस मंदिर को संचालित करता है। वही गाँव के नाम से प्रभुजी का नाम वही पार्श्वनाथ पड़ा है।

भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें (23वें) तीर्थंकर हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 3 हजार वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्‍ण एकादशी के दिन महातेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिये एक ओर जा रहे हैं। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहाँ पंचाग्नि जला रहा है, और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा— ‘दयाहीन’ धर्म किसी काम का नहीं’।

यह आचर्य श्री कल्याणसागर जी महाराज का समाधिस्थल, श्री णमोकार महामंत्र साधना केन्द्र प्रदेश मे ही नही अपितु पूरे देश मे आस्था का केन्द्र बन गया है। प्रकृति के सुरम्य वातावरण मे फ़ैले इस पवित्र क्षेत्र मे प्रारम्भ मे श्री आदिनाथ जिनालय एवं ध्यान केन्द्र की स्थापना की गई है। धीरे-धीरे क्षेत्र का विकास हुआ और आचार्य श्री कल्याणसागर जी म. सा. की भावना के अनुरुप यहा भगवान पार्श्वनाथ के भव्य मन्दिर एवं मान स्तंभ का निर्माण करवाया गया। मन्दिर की मुख्य वेदी मे भगवान पार्श्वनाथ कि कालेप्रस्तर की अत्यन्त मनोहर, पद्मासन प्रतिमा स्थपित की गई, दुसरे तल पर भी भगवान पर्श्वनाथ की प्रस्तर एवं अष्ठधातु की विशाल प्रतिमाएं विराजमान की गई है। इसके साथ ही चौबीसो तीर्थंकरो की प्रतिमाएं चौबीसी के रुप मे दर्शनार्थ विरजित है।

श्री णमोकार महामंत्र साधना केन्द्र, महू-नीमच हाइवे पर स्थित होने से लम्बी यात्राओं पर निकलने वाले यात्रियो के लिये ठहरने व रात्री विश्राम हेतु भी यह उप्युक्त स्थल है। अतः यहा सुदुर क्षेत्र से आने वाले श्रावक भी यहा आकर दर्शन आदि का लाभ प्राप्त करते है।

वास्तव मे यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां असीम आनन्द व शान्ति की अनुभूती की जा सकती है। यहा तीर्थ वन्दना कर सातिशय पुण्य लाभ प्राप्त करते हुए आनन्द के स्पंदन को प्राप्त किया जा सकता है।

प्राचीनता का प्रमाण

शास्त्रों के अनुसार संप्रतिराजा ने इस तीर्थ का निर्माण करवाया है। इतिहास के अज्ञात पृष्ठों की वजह से यहाँ का मंदिर कितना प्राचीन है यह अंदाज लगाना मुश्किल है, फिर भी मूर्ति की अद्भुत भव्यता, मनोहर प्राचीन शैली के शिल्प से ज्ञात होता है कि यह तीर्थ 11वीं शताब्दी से पूर्व का है जो टीले पर बना हुआ है।

श्री पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन से उनकी भव्यता से स्वयं यात्री सिर झुका लेता है। कभी – कभी रात्रि में नृत्य संगीत के मधुर स्वरों का सुनाई देना, घंटानाद होना, मन के अरमानों की पूर्ति होना पूर्व में पौष दशमी के दिन मूलनायक के गभारे की दीवारों से केसर निकलना आदि इसी तीर्थ की प्राचीनता की साक्षी होने वाली घटना मानी जाती है।

विश्व की अद्भुत प्रतिमा

वही गाँव में वेलु में से निर्मित श्याम वर्णीय सात फनों से युक्त श्री वही पार्श्वनाथ बिराजमान है। प्रभुजी ३३ इंच ऊँचे व २३ इंच चौड़े है। प्रभु की पलाठी के दोनों और व्याघ्र की आकृति है। उस बाघ की पूंछ प्रभुजी की पाठी से होकर फनों पर निकलती है। प्राय: इस जिनालय का निर्माण संप्रतिराजा ने कराया था। प्रतिमाजी अत्यंत ही आकर्षक व मनमोहक है।

वृद्ध पुरुषों द्वारा प्राप्त किंदवंती अनुसार एक गाय प्रतिदिन टीले पर आकर अपना दूध स्वयं ही वहां गिराकर चली जाती थी। मालिक को शंका होने पर उसने जानकारी ली तो उसे आश्चर्य हुआ उसने टीले पर गड्ढा खोदना प्रारम्भ किया। थोड़ा – सा गड्ढा होने पर वर्तमान मूलनायक भगवान की प्रतिमा का मस्तक भाग बाहर आया। सावधानी से खुदाई करने पर श्यामरंगी 23 वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथजी भगवान की भारत में पहली एवं अद्भुत सुबह, दोप., शाम तीन रूप में सिंह के ऊपर विराजित आठ सर्प के फनों वाली बालुरेत से निर्मित भव्य प्रतिमा नज़र आई। भाव विभोर होकर प्रतिमा को बाहर लाकर वहीं पर संप्रतिराजा ने एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

तीर्थ पहुँच मार्ग

यह तीर्थ वर्तमान मंदसौर से 15 कि.मी. दूर महू-नीमच हाइवे से 2 कि.मी. पश्चिम में एवं खण्डवा-अजमेर रेल्वे लाइन के पिपलिया स्टेशन से 5 कि.मी. दूर है एवं केशरियाजी-उदयपुर जाने के रास्ते में यह तीर्थ स्थित है। वायु मार्ग से उदयपुर या इंदौर उतरकर यहाँ पहुँच सकते है।

अतः अनेक संघो एवं श्रीमंतो के सहयोग द्वारा तीर्थोध्दार का भागीरथ पुरुषार्थ प्रारम्भ किया जा रहा है। आशा है कि इस पुण्य कार्य में आप सभी का पूर्ण सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त होगा। श्री बही पार्श्वनाथ महातीर्थ एक प्राचीन और महान चमत्कारी तीर्थ है एक बार आने पर यहाँ बार – बार आने का मन उल्लास करता है।

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