दीपावली को लेकर इतिहास की कुछ रहस्यमय घटनाएँ !!

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दीपावली हिन्दू समाज में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है। दीपावली को मनाने का उद्देश्य भारतीय संस्कृति के उस प्राचीन सत्य का आदर करना है, जिसकी महक से आज भी लाखों लोग अपने जीवन को सुवासित कर रहे हैं। दिवाली का उत्सव पर्वों का पुंज है।

भारत में इस उत्सव को मनाने की परंपरा कब से चली, इस विषय में बहुत सारे अनुमान किये जाते हैं। एक अनुमान तो यह है कि आदिमानव ने जब से अग्नि की खोज की है, शायद तभी से यह उत्सव मनाया जा रहा है। जो भी हो, किंतु विभिन्न प्रकार के कथनों और शास्त्रवचनों से तो यही सिद्ध होता है कि भारत में दिवाली का उत्सव प्रतिवर्ष मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

दीपावली त्यौहार हिन्दू, जैन एवं सिक्ख समुदाय और प्राणी_मात्र के लिए बेहद खास है। रामायण ही नहीं बल्कि महाभारत में भी दिवाली मनाए जाने की वजह बताई गई है।

आइए हम आपको दीपावली को लेकर रहस्यमय 8 घटनाएँ बताते हैं…

1. दीपावली के दिन रावण का वध करके 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आए थे। इस दिन नगरवासियों ने पूरे नगर को सजाकर दिये जलाए थे ।

2. दीपावली के दिन समुंद्र मंथन से माँ लक्ष्मी का प्रागट्य हुआ।

3. दीपावली के दिन राजा विक्रमादित्य का राजभिषेक हुआ।

4.दीपावली के दिन स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना की।

5. दीपावली के दिन हरगोविंद सिंह जी जहांगीर के चुंगल से मुक्त हुए।

6. दीपावली के दिन पांडव 12 साल के अज्ञातवास के बाद वापस आए थे। नगर की प्रजा ने इस दिन दीप जलाकर उनका स्वागत किया था।

7. दीपावली के दिन महावीर तीर्थंकर जी ने मोक्ष प्राप्त किया ।

8. दीपावली के दिन गुरु गोविन्दसिंह विजययात्रा पर निकले थे।

9. दीपावली के दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करके लक्ष्मी जी को बाली की कैद से छुड़ाया था।

यह उत्सव केवल सामाजिक, आर्थिक और नैतिक उत्सव ही नहीं वरन् आत्मप्रकाश की ओर जाने का संकेत करने वाला, आत्मोन्नति कराने वाला उत्सव है।

संसार की सभी जातियाँ अपने-अपने उत्सव मनाती हैं। प्रत्येक समाज के अपने उत्सव होते हैं जो अन्य समाजों से भिन्न होते हैं, परंतु हिंदू पर्वों और उत्सवों में कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं, जो किसी अन्य जाति के उत्सवों में नहीं हैं। हम लोग वर्षभर उत्सव मनाते रहते हैं। एक त्यौहार मनाते ही अगला त्यौहार सामने दिखाई देता है। इस प्रकार पूरा वर्ष आनन्द से बीतता है।

हिंदू धर्म की मान्यता है कि सब प्राणियों में अपने जैसी आत्मा समझनी
चाहिए और किसी को अकारण दुःख नहीं देना चाहिए। संभवतः इसी बात को समझने के लिए पितृपक्ष में कौए को भोजन देने की प्रथा है। नाग पंचमी के दिन सर्प को दूध पिलाया जाता है। कुछ अवसरों पर कुत्ते को भोजन दिया जाता है।

हर ऋतु में नयी फसल आती है। पहले वह ईश्वर को अर्पण करना, फिर मित्रों और संबंधियों में बाँटकर खाना – यह हिंदू परंपरा है। इसीलिए दिवाली पर खील-बताशे, मकर संक्रांति यानि उत्तरायण पर्व पर तिल गुड़ बाँटे जाते हैं। अकेले कुछ खाना हिंदू परंपरा के विपरीत है। पनीरयुक्त मिठाइयाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकर हैं। स्वामी विवेकानंद मिठाई की दुकान को साक्षात् यम की दुकान कहते थे। अतः दिवाली के दिनों में नपी तुली मिठाई खानी चाहिए।

भारत के वे ऋषि-मुनि धन्य हैं, जिन्होंने दीपावली – जैसे पर्वों का आयोजन करके मनुष्य को मनुष्य के नजदीक लाने का प्रयास किया है तथा उसकी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करने का संदेश दिया है। सभी को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनायें

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