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दुष्कर्मीयों को बीच चौराहे पर हो फांसी अथवा मानसिक बदलाव के अतिरिक्त और कोई कारगर ठोस उपाय नहीं है -बंसीलाल टांक

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मंदसौर। 16 दिसम्बर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली की छात्रा निर्भया का दुष्कर्म का दाग धूलने भी नहीं पाया था कि 6 साल बाद मंदसौर की मात्र 7 साल की मासूम से दरिन्दगी हो गई और जिस प्रकार दिल्ली निर्भया काण्ड में पूरा देश आंदोलित उद्वेलित उत्तेजित हुआ था वैसा ही आक्रोश 29 जून की रात्री को मासूम के साथ होने से जन-जन में फैला हुआ है। म.प्र. की घटना होने से पूरा म.प्र. आक्रोषित है, पड़ोसी राज्य गुजरात-राजस्थान के बाद पूरा राष्ट्र भी मंदसौर की मासूम को न्याय दिलाने-आंदोलन में कूद पड़ा है और गुस्से की यह लहर पूरे भारत में फैलती देखी जा रही है। म.प्र. में ही दिल दिमाग को झकझोरने वाली दुष्कर्म की घटनाएं भोपाल-सागर, इंदौर की मासूम के साथ हो चुकी थी। इन्दौर घटना में फांसी भी सुना दी गई। इसके बावजूद मंदसौर के बाद सतना जिले में 4 साल की मासूम के साथ दुष्कृत्य होने से उसे दिल्ली रेफर किया गया।
एक तरफ दुष्कर्मों के विरोध में पूरा देश जिसमें नन्हें-मुन्ने बालक-बालिकाएं भी फांसी दो-फांसी दो की तख्तियां हाथ में लिये गर्जना करते सड़कों पर रैलियां निकाल रहे है, दुष्कर्मों के खिलाफ आमजन का इतना भारी गुस्सा, भारी दबाव के बावजूद नराधमों के मन में कोई भय, तनिक भी डर नहीं है। जबलपुर में 70 साल का बुड्ढा 5 साल की मासूम को हवस का शिकार बनाना चाह रहा था यह तो गनीमत रही कि बच्ची उसके चंगुल से छूटकर भाग गई। क्या दर्शा रही है ये सब घटनाएं, स्पष्ट है कि दरिंदों के मन में कोई भय नहीं जबकि इंदौर घटना में दरिंदों को फांसी की सजा सुना दी गई है। कारण स्पष्ट है कि दरिंदों के मन में कानून का का कहीं डर नहीं है और हो भी कैसे सकता है। क्योंकि दिल्ली निर्भया काण्ड के आरोपियों को फांसी की सजा तो सुना दी गई परन्तु  6 साल बाद भी क्या फांसी हो गई ? माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी ने बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं अभियान तो अच्छा प्रारंभ किया परन्तु स्कूल जाती मासूम बच्चियों-महिलाओं के साथ निरन्तर बढ़ती ही जा रही दुष्कृत्य दरिंदगी घटनाओं ने सिद्ध कर दिया है कि दरिंदों, शैतानों, नराधम, दैत्यों से जब पढ़ने जा रही बेटियां बच ही नहीं पा रही हो तो पढ़ेगी कैसे ? क्या तो बचेगी और क्या तो पढ़ेगी। सबसे बढ़ा ज्वलंत प्रश्न देश के सामने खड़ा हो गया है कि आखिर इस समस्या का समाधान दरिंदगी को कैसे रोका जाये? पहला हल कानून है। सख्त से सख्त सजा की आवाज आमजन के साथ सरकारें भी इसे दोहराती है परन्तु 6-6 साल बाद भी फांसी न हो और कानून की पेंचीदयों में उलझा रहे तो फिर ऐसा नाजुक कानून किस काम का। मंदसौर मासूम के साथ दुष्कर्म के बाद हाल ही में मुस्लिम राष्ट्र दुबई में बलात्कार की घटना के तत्काल बाद मौत की सजा सुनाई और मात्र 5 मिनिट में उसे बीच चौराहे पर खड़ा करके गोली मारकर चौराहे पर लटका दिया गया। ऐसा कानून भारत में है नहीं और सम्भवतया कभी बनेगा भी नहीं। बन गया होता और प्रयोग के तौर पर एक बार भी अजमा लिया गया होता तो दिल्ली निर्भया काण्ड के बाद 6 सालों में दुष्कर्मो का जो ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है वह नहीं बढ़ता। इसलिये वर्तमान कानून के भरोसे तो बेटियों को छोड़ा नहीं जा सकता क्यांेकि कानून का डर होता तो बाहर दरिंदों के साथ ही घर में सगा बाप-सगा भाई भारत में पैदा होकर एक दुष्कर्मी का दाग अपने पर नहीं लगने देता।
म.प्र. में श्री शिवराजसिंह ने बलात्कारियों को फांसी की सजा मुकरर कर दी है और स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा व्यक्तिगत तौर पर जल्द से जल्द फांसी दिलाने, आमजनों से हस्ताक्षर अभियान-मुहिम चलाने की खबर भी 3 जुलाई को मीडिया में छपी है। माननीय श्री शिवराजसिंह का निर्णय स्वागत योग्य है परन्तु उनको इससे एक कदम और आगे बढ़कर ऐसा कानून बनाने की सिफारिश-प्रयास करना चाहिये कि राष्ट्र की भावना को देखते हुए दरिंदों को फांसी भी बंद कारागाह में नहीं चौराहो पर दी जाना चाहिए। जिससे दुष्कर्मियों को उचित सबक मिल सके।
दुष्कर्म रोकने के लिये दो ही उपाय है या तो सरकार प्रथम चौराहे पर फांसी दे या फिर सरकार खाड़ी प्रदेशों की तरह बलात्कारियों को चौराहे पर फांसी का कानून नहीं बनाये या फिर दूसरा उपाय जो मानसिकता, वैचारिकता, परिवर्तन, बदलाव, मन में कभी किसी के मन में मॉ-बेटी -बहिन को देखकर उसके प्रति मन में भूलकर भी दूषित-दुष्कर्म वासना का भाव उत्पन्न ही नहीं हो और सम्मान का भाव जाग्रह हो जाये और यह भी तभी होगा जब सरकार आगे आयेगी। नेट, टीवी. सीरियलों, विज्ञापनों आदि में उन दृष्यों पर पूर्ण प्रतिबंध लगे जिनसे मन में सात्विकता के स्थान पर कामुकता-वासना को श्रेय मिले। बचपन से ही प्रत्येक घर-परिवार में ही जैसे ही बच्चे सामने होने लगे कार्टून सीरियल भी भारत के महान आदर्श वीर पुरूषों के बचपन के सीरियल दिखाना चाहिए।
एक ओर महत्वपूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम में आध्यात्मिकता-नैतिकता बढाने वाले प्रसंगों, महापुरूषों के चरित्रों का समावेश किया जाये जिससे बचपन से बच्चों में ऐसे अचछे संस्कार दृढ़ हो जाये कि भूलकर भी उनके मन में कभी कोई दुष्कर्म, दुराचार का भाव उत्पन्न ही नहीं होने पाये। दरिंदे नन्हीं-मुन्नी बेटियों का तो जीवन बर्बाद कर देते है और खुद कलंक लेकर फांसी पर चढ़ पाये। फिर किसी को जीवन पर्यन्त मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। इसलिये प्रारंभ से ही ऐसी शिक्षा क्यों न दी जाये जिससे बहुमूल्य जीवन बर्बाद होने से बचाया जा सके।
जब अंग्रेजी हुकूमत में बच्चों को उनके भावी जीवन को उन्नत बनाने के लिये स्कूलों में ‘‘शील शिक्षा, सनातन धर्म की पहली, दूसरी, तीसरी……… पांचवी तक ऐसी शिक्षाप्रद पुस्तकों का पाठ्यक्रम में समावेश होता रहा तो अब क्यों नहीं हो सकता ?
विदेशी हुकुमत के गुलाम हम जरूर रहे लेकिन ढाई सौ वर्ष की गुलामी में ऐसा एक भी उदाहरण पढ़ने-सुनने में नहीं आया कि 4-5 साल से लेकर ढाई-3 साल की मासूम हंसती खेलती बच्चियों के साथ बलात्कार, हत्यायें होती रही हो। आखिर हमने आजादी के 71 वर्षों में क्या पाया – 1948 से ही भ्रष्टाचार का पौधरोपण होकर निरन्तर बढ़ता फलताफूलता गया और भ्रष्टाचार-अनाचार-अत्याचार अन्याय की उपलब्धि के बाद थोड़ी बहुत जो आबरू शेष बची थी वह भी दिन दूना, रात चोगुना दुराचार दुष्कर्म का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। हजारों शहीदों की शहादत का बदला क्या इसी तरह चुकाते रहेंगे ? ‘‘नारी यत्र पुज्येत-तत्र रमन्ति देवताः’’ भारत की नारी सम्मान के इस महामंत्र को।

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