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दूसरे और अंतिम दिन श्रम संगठनों की हड़ताल जारी रही – सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा के लिए कर्मचारी प्रतिबद्ध

मन्दसौर। 10 केन्द्रीय श्रम संगठनों की 12 सूत्रीय मांगों को लेकर आहूत राष्ट्रव्यापी दो दिवसीय हड़ताल के दूसरे दिन पुनः विभिन्न विभागों के अधिकारी, कर्मचारी गांधी चौराहे पर एकत्रित हुए, जिनमें बड़ी संख्या में बैंक कर्मी, बीएसएनएल, पोस्ट आफीस, बीमा विभाग, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा उषा कार्यकर्ता व सहायिका, इंटक, सीटू तथा अन्य कई विभागों एवं कारखाना, श्रमिक कर्मी एवं श्रम संगठनों के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता सम्मिलित हुए।

सभा को विभिन्न पदाधिकारियों ने संबोधित करते हुए कहा कि सरकार की जनविरोधी एवं श्रम विरोधी नीतियों से सर्वहारा वर्ग त्रस्त है, केन्द्र सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतरी, वह फिक्स टर्म एम्पलायमेन्ट योजना लाई है, जिसके अन्तर्गत नौकरीयां अस्थाई रहेगी और कर्मचारियों/कामगारों को स्थाई नौकरी की सुविधाएं जैसे पंेशन, पीएफ की पात्रता नहीं रहेगी, इस नई योजना से देश भर के कर्मचारियों एवं कामगारों में व्यापक आक्रोश है।
वक्ताओं ने सरकार द्वारा लाये गये नये कानून इन्सोल्वेंसी और बैंक्रप्सी कोड का भी विरोध किया इसके अन्तर्गत केंद्र सरकार द्वारा नया कानून लाई हैं, इसमें कंपनी, प्रोपराइटर और व्यक्ति जो लेनदारी नहीं चुका पाते हैं, उनका मूल्यांकन करके निपटान करना। इसमें 180 दिनों में निपटान का प्रावधान हैं इसे अधिकतम 90 दिन और बढ़ाया जा सकता हैं। यूनियन का कहना है कि जानबूझकर लोन अदा नहीं करने को अपराध घोषित किया जाना चाहिए उनके वोटिंग पावर बंद किये जाने चाहिए, उनका पासपोर्ट जब्त किया जाना चाहिए उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए, इस बिल में तो 30 प्रतिशत में निपटान कर डिफ़ॉल्टर को फायदा पहुँचाया जा रहा है। वक्ताओं ने कहा कि विभिन्न विभागों में लगभग 50 प्रतिशत पद खाली पड़े है जिससे कर्मचारियों पर कार्य बोझ बढ़ रहा है और सेवाएं प्रभावित हो रही है। पर्याप्त भर्ती करने की बजाय सरकारी विभागों को बदनाम करके निजीकरण, ठेका पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। 74 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है। ट्रेड यूनियन के उपर प्रहार किया जा रहा है। अंग्रेजों के जमाने में जो सुविधाएं और प्रावधान कामगारों ने प्राप्त किये थे, उन्हें खत्म करने का षड़यंत्र हर पल, हर क्षण किया जा रहा है। केन्द्र सरकार सीबीआई से सीबीआई को लड़वा रही है, इनकम टैक्स अधिकारियों को सीवीसी से लड़वा रही है, बैंकों के ऊपर इतना दबाव डाल दिया गया है कि रिजर्व बैंक के गर्वनर को भी त्यागपत्र देना पड़ा। बैंका का एनपीए बढ़कर 13 लाख हजार करोड़ हो गया है जिसमें 73 प्रतिशत ऋण इण्डस्ट्रीज का मजदूरों को भी कारखाना मालिकों/कम्पनियों के रहमो करम पर छोड़ दिया है। उनका शोषण किया जा रहा है। गुजारे लायक वेतन/मजदूरी नहीं मिलने के कारण उनका जीवन स्तर निम्न स्तर पर पहुंच गया है। पूंजीवाद का प्रभाव अपने चरम पर है, जो शासन की विभिन्न नीतियों को प्रभावित करके मजदूरों के शोषण का कानून तैयार करा रहे है। सरकार को शायद किसी क्रांति का इंतजार है। श्रमिक मायूस व परेशान है।

10 केन्द्रीय श्रम संगठनों की 12 सूत्रीय मांगे-

1. महंगाई पर नियंत्रण करो।
2. नई भर्ती चालू करो।
3. श्रम कानूनों के उल्लंघन पर नियोक्ता पर कठोर कार्यवाही हो।
4. सभी कामगारों और कर्मचारियों के लिये सामाजिक सुरक्षा।
5. न्यूनतम वेतन 18000 रू. हो।
6. सभी कामगारों के लिये सुनिश्चित पेंशन। एन.पी.एस. समाप्त करना और पुरानी पेंशन बहाल करना।
7. समान कार्य के लिये समान वेतन और स्थाई कार्य के लिये स्थाई भर्ती।
8. केन्द्र और राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों के विनिवेश पर रोक।
9. बोनस, भविष्य निधि के भुगतान और पात्रता पर से उपरी सीमाओं को हटाना।
10. 45 दिनों के अवधि के भीतर श्रम संगठनों का पंजीकरण करना।
11. श्रम कानूनों के लिये प्रस्तावित प्रतिकूल संशोधनों पर रोक लगाना।
12. रक्षा, बीमा, रेल्वे तथा अन्य मुख्य क्षेत्रों में एफ.डी.आई. पर रोक लगाना।

सभा को संबोधित कामरेड गोपालकृष्ण मोड़, महेश मिश्रा, सौभाग्यमल जैन, सतीश दिवाकर, के.के. गौड़, के.के. दुबे, महिला बैंक कर्मी प्रज्ञा जैन, अजीत बंडी, नन्दकिशोर शर्मा, बिजेन्द्र झा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता माधुरी सौलंकी, संगीता जैन, सोनू यादव, संतोष गरासिया, सुरेन्द्र संघवी, मुन्नालाल चंदेल, सुनील जैन, के.सी. सेन, अहमद हुसैन।

इस अवसर पर  विक्रम विद्यार्थी, सुरेन्द्र कुमावत, प्रदीप साकल्ले, विनय शर्मा, अभय भटेवरा, विपुल, वी.पी. शुक्ला, कैलाश माझी, सत्यनारायण भावसार, बी.एम. मित्तल, मनीष जैन, एस. आर. शास्ता, राजेश सोनी, संदीप मुजावदिया, उपेन्द्र राय, भरत नागर, कन्हैयालाल पारूण्डिया सहित सैकड़ों कर्मचारी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आदि उपस्थित थे।

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