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देववाणी संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति-सभ्यता की जागृति का समारोह है कालिदास समारोह- दो दिवसीय समारोह का हुआ समापन

भगवान श्री पशुपतिनाथ सभागृह में आयोजित दो दिवसीय कालिदास समारोह का समापन 19 मार्च की रात्रि को आजमगढ़ उत्तरप्रदेश के नाट्यसंस्था सूत्रधार के द्वारा राकेश मोहन द्वारा लिखित कालिदास पर आधारित नाट्क आषाढ़ का एक दिन जिसका निर्देशन श्री अभिषेक द्वारा किया गया प्रदर्शन से हुआ। नाटक का मुख्य उद्देश्य गंभीर विषय, प्रेम-विरह, संयोग-वियोग-करूणा प्रस्तुत करना था जिसे संस्था के कलाकारों ने बखूबी प्रदर्शित किया। 18 मार्च की रात्रि को भोपाल की अध्र्यकला संस्था द्वारा प्रस्तुत सवा घण्टे की नृत्य नाटिका राम की शक्तिपूजा में विशेषकर जहां वीर रस का प्राबल्य होकर दर्शकों के मन में शौर्य, वीरता का भाव जागृत कर रही थी वहीं 19 मार्च को आजमगढ़ नाट्य संस्था सूत्रधार द्वारा 90 मिनिट का आषाढ़ का एक दिन नाटक गंभीर होकर प्रत्येक दृश्य दर्शकों के मन में करूणा-संवेदना का संचार करता रहा।

स्वागत उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार श्री ब्रजेश जोशी ने सम्पूर्ण भारत में उज्जैन के पश्चात् मंदसौर में कालिदास समारोह आयोजन को किसी चमत्कारिक घटना से कम नहीं बताते हुए कहा कि लगभग 75वर्ष पहले अन्तर्राष्ट्रीय भागवताचार्य गोलोकवासी पं. मदनलालजी जोशी तथा तत्कालिन वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखक स्व. मदनलालजी चोबे द्वारा नगर के साहित्यकारों तथा प्रबुद्धजनों के साथ कमरों में बैठकर कालिदास प्रसंगों पर गोष्ठियां तथा समारोह आयोजित करते वक्त उज्जैन की ही तर्ज पर मंदसौर में भी वृहद स्तर पर कालिदास समारोह मनाने की जो कल्पना की थी तथा जो सपना देखा करते थे भगवान श्री पशुपतिनाथ के अनुग्रह से उनके (ब्रजेश जोशी) मन में देवी अंतःप्रेरणा जागृत होकर विधायक श्री यशपालसिंह सिसौदिया के प्रयास से माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंहजी चैहान द्वारा नगरवासियों को 75 वर्ष पुराने सपने को साकार किया जिसके लिये माननीय मुख्यमंत्री एवं विधायक श्री सिसौदियाजी साधुवाद के पात्र है।
डाॅ. प्रियंका गोस्वामी ने महाकवि कालिदास का जीवन परिचय देते हुए मंदसौर में कालिदास समारोह आयोजन को श्रेष्ठ उपलब्धी बताते हुए कहा कि समारोह का संदेश नगर ही नहीं राष्ट्र में संस्कृत, संस्कृति, संस्कारों के प्रति अभिरूचि जागृत करेगा।
मदनलाल राठौर ने कहा कि संस्कृति को बचाने के लिये हमारे ग्रंथांे का विशेष प्रचार प्रसार किया जाकर आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास होना चाहिए। आपने मंदसौर में आयोजित दो दिवसीय समारोह के लघु प्रयास को ओर अधिक विस्तार दिये जाने पर जोर दिया। आपने कार्यक्रम को आत्मसात कर इसमें ओर अधिक सौपान तय करने की सम्भावना व्यक्त की।
पुलिस अधीक्षक श्री त्रिपाठी ने मंदसौर में कालिदास समारोह पर अत्यन्त हर्ष प्रकट करते हुए कहा कि शास्त्रों मंे साहित्य, संगीत और कला विहीन व्यक्तियों को बिना सिंग के पशु के समान माना गया है इसलिये मानव जीवन में इनका होना आवश्यक है। कालिदास का तादात्म्य मंदसौर से बताते हुए इसे आपने नगर के लिये गौरव का विषय कहा। आपने कहा कि देववाणी संस्कृत भाषा के उन्नयन के जो प्रयास हो रहे है उन्हें ओर आगे गति देने की आवश्यकता है।

समापन समारोह कार्यक्रम का संचालन डाॅ. घनश्याम बटवाल ने किया, आभार आनन्द सिन्हा ने माना।
उपस्थित रहे- गुरूचरण बग्गा, कैलाश जोशी, नरेन्द्रसिंह सिपानी, विक्रम विद्यार्थी, बंशीलाल टांक, उमेश नेक्स, पं. अशोक त्रिपाठी, ब्रजेश आर्य, प्रदीप भाटी, सचिन पारिख, रमेशचन्द्र चन्द्रे, महेश मिश्रा, राजाराम तंवर, अजीजुल्लाह खान, डाॅ. सुषमा सेठिया, बंशीलाल सेठिया, मनीष सोनी, किशनलाल आर्य, मुकेश आर्य आदि। कालिदास की कलादृष्टि पर लोकप्रिय व्याख्यान में विद्वतजनों के हुए व्याख्यान
मन्दसौर। कालिदास समारोह की लोकप्रिय व्याख्यान माला विधायक श्री यशपालसिंह सिसौदिया के मुख्य आतिथ्य तथा श्री मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। व्याख्यान माला के मुख्य वक्ता श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय इन्दौर, डाॅ. संगम पाण्डे नई दिल्ली थे।
अतिथियों का पुष्पहारों से बहुमान कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन के निदेशक आनन्द सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी, डाॅ. घनश्याम बटवाल, बंशीलाल टांक, सचिन पारिख आदि ने किया।
इस अवसर पर डाॅ.घनश्याम बटवाल द्वारा सम्पादित श्री मोहनलाल भटनागर द्वारा लिखित तथा शिवना की पुकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक उत्थान का विमोचन मंचासीन अतिथियों एवं पूर्व मंत्री श्री नरेन्द्र नाहटा द्वारा किया गया।
वक्ताओं के हुए व्याख्यान-
कला समीक्षक श्री संगम पाण्डे- भारतीय सभ्यता विश्व की अन्य 25 सभ्यताओं से विशेष होकर भारतीय सभ्यता अन्य सभी सभ्यताओं पर हावी है। कालिदास की समीक्षा को आपने आसान नहीं बताया, इसके लिये संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है।
श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय- भारतीय कला दृष्टि वहीं है जो कालिदास की कलादृष्टि रही है। समग्रता अर्थात सबसे जोड़ने की विशेष कला भारतीय दर्शन में ही है जो कि अन्यत्र नहीं पाई जाती। भारत प्राकृतिक दृष्टि से सौंदर्य प्रधान हैं कालिदास के ग्रंथों में प्रकृति के समस्त भावों का दिग्दर्शन होता है।
श्री मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी- भारतीय संस्कृति का लक्ष्य भोग नहीं मोक्ष है। भोगों का आसक्ती, उपभोग नहीं बल्कि विवेकपूर्ण अनासक्त होकर सदुपयोग करते हुए अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करना कालिदास का ध्येय रहा है।
उपस्थित रहे- महाविद्यालय पूर्व प्राचार्य ज्ञानचंद खिमेसरा, श्याम चैधरी, स्टेट बैंक प्रबंधक महेश हलधर, शिक्षाविद् मोहनलाल भटनागर, राव विजयसिंह, जयेश नागर, सचिन पारिख, एड. कांतिलाल राठौर, गोपाल पंचारिया, दिनेश तिवारी, नागुलाल परमार, भंवरसिंह भटनागर आदि।
संचालन ब्रजेश जोशी ने किया आभार डाॅ. घनश्याम बटवाल ने माना।

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