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देह व्यापार एक अभिशाप
इसे आप देश का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि एक तरह हम इंटरनेट युग में जी रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत के कुछ ऐसे गांव हैं जहां लड़कियों को जिस्म बेचना उनकी मजबूरी या धंधा नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही एक परंपरा है जिसे एमपी का मंदसौर और नीमच जिला शिद्दत से निभा रहा है। बछाड़ा समुदाय हैं जिनकी परंपरा है कि जिस घर में बड़ी बेटी है वो देह व्यापार करेगी। हद तो यह है कि यह परंपरा को समुदाय के लोग अपने जीवन का हिस्सा मान चुके हैं और उन्हें अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है खुद महिलाएं और लड़कियां भी इस बात का बुरा नहीं मानती हैं और खुशी-खुशी इस व्यापार का हिस्सा बन जाती हैं।
अर्थलाभ के लिए स्थापित संकर यौन संबंध वेश्यावृत्ति कहलाता है। इसमें उस भावनात्मक तत्व का अभाव होता है जो अधिकांश यौनसंबंधों का एक प्रमुख अंग है। विधान एवं परंपरा के अनुसार वेश्यावृत्ति उपस्त्री सहवास, परस्त्रीगमन एवं अन्य अनियमित वासनापूर्ण संबंधों से भिन्न होती है। संस्कृत कोशों में यह वृत्ति अपनाने वाले स्त्रियों के लिए विभिन्न संज्ञाएँ दी गई हैं। वेश्या, रूपाजीवा, पण्यस्त्री, गणिका, वारवधू, लोकांगना, नर्तकी आदि की गुण एवं व्यवसायपरक अमिघा है – ‘वेशं (बाजार) आजोवो यस्या: सा वेश्या’ (जिसकी आजीविका में बाजार हेतु हो, ‘गणयति इति गणिका’ (रुपया गिननेवाली), ‘रूपं आजीवो यस्या: सा रूपाजीवा’ (सौंदर्य ही जिसकी आजीविका का कारण हो); पण्यस्त्री – ‘पण्यै: क्रोता स्त्री’ (जिसे रुपया देकर आत्मतुष्टि के लिए क्रय कर लिया गया हो)।

देह व्यापार पूरी दुनिया में आज भी महिलाओं की दैहिक स्वातंत्रता पर कलंक है। भारत जैसे देश में भी लंबे समय से महिलाएं देह व्यापार जैसे घिनौने धंधे में उतरने को मजबूर हैं। हालांकि 1956 में पीटा कानून के तहत वेश्यावृत्ति को कानूनी वैधता दी गई, पर 1986 में इसमें संशोधन करके कई शर्तें जोड़ी गईं, जिसमें सार्वजनिक सेक्स को अपराध माना गया और यहां तक कि इसमें सजा का प्रावधान भी रखा गया, लेकिन इसे विडंबना कहें कि दुर्भाग्य कि आज भी देश में कई ऐसे इलाके हैं, जहां लड़कियां ऐसा करने को मजबूर हैं। देखिए भारत के 10 ऐसे रेड लाइट एरिया, जिनकी एशिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा होती है। जीबी रोड दिल्‍ली राजधानी दि‍ल्ली स्थित जीबी रोड का पूरा नाम गारस्टिन बास्टिन रोड है। यह राजधानी दिल्ली का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। हालांकि इसका नाम सन् 1965 में बदल कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया। इस इलाके का भी अपना इतिहास है। बताया जाता है कि यहां मुगलकाल में कुल पांच रेडलाइट एरिया यानी कोठे हुआ करते थे। अंग्रेजों के समय इन पांचों क्षेत्रों को एक साथ कर दिया गया और उसी समय इसका नाम जीबी रोड पड़ा। जानकारों के मुताबिक देहव्यापार का यहां सबसे बड़ा कारोबार होता है, और यहां नेपाल और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लड़कियों की तस्करी करके यहां को कोठों पर लाया जाता है। वर्तमान में एक ही कमरे में कई केबिन बनें हैं। कमाठीपुरा मुंबई फैशन, फिल्मों और बिजनेस का शहर मायानगरी मुंबई का एक इलाका कमाठीपुरा पूरी दुनिया के सबसे प्रमुख रेडलाइट एरिया में चर्चित है। बताया जाता है कि यह एशिया का सबसे पुराना रेडलाइट एरिया है। इस एरिये का इतिहास सन् 1795 मे पुराने बॉम्बे के निर्माण से शुरू होता है। बताया जाता है कि इस इलाके में निर्माण क्षेत्र में काम करने वाली आंध्रा महिलाओं ने यहां देह व्यापार का धंधा शुरू किया था और कुछ ही सालों, यानी की 1880 में यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए ऐशगाह बन गया। कमाल की बात यह है कि आज भी यह देहव्यापार के लिए इस क्षेत्र को पूरे देश में बखूबी जाना जाता है। एक अनुमान के मुताबिक यहां तकरीबन 2 लाख सेक्स वर्कर्स का परिवार रहता है, जो पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा है। सोनागाछी कोलकाता: देश के पूर्वी भाग के सबसे बडे महानगर सोनागाछी को एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया माना जाता है। अनुमान के मुताबिक यहां कई बहुमंजिला इमारते हैं, जहां करीब 11 हजार वेश्याएं देह व्यापार में लिप्त हैं। उत्तरी कोलकाता के शोभा बाजार के पास स्थित चित्तरंजन एवेन्यू में स्थित इलाके में वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को बाकायदा लाइसेंस दिया गया है। यहां इस व्यापार को कई तरह के समूह चलाते हैं, जिन्हें एक तरह से गैंग कहा जाता है। एक अनुमान के मुताबिक इस स्लम में 18 साल से कम उम्र की करीब 12 हजार लड़कियां सेक्स व्यापार में शामिल हैं ग्वालियर: मध्य प्रदेश में एक तरह से सिंधिया परिवार की सरजमीं पर ग्वालियर में रेशमपुरा एक बड़ा रेडलाइट इलाका है। यहां देह व्यापार के लिए विदेशी लड़कियों के साथ मॉडल्स, कॉलेज गर्ल्स भी हैं। यहां एक तरह से कॉलेज गर्ल्स के लिए बाकायादा ऑफिस खोले जाने लगे हैं। इंटरनेट और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है। कॉलगर्ल्स को ठेके पर या फिर वेतन पर रखा जाता हैं। मीर गंज इलाहबाद: यूं तो इलाहाबाद गंगा, जमुना और सरस्वती के संगम के चलते प्रयागराज तीर्थ के रूप में पूरे भारत में प्रसिद्ध है। लेकिन यहां बाजार चौक में मीरगंज इलाके में स्थित इतिहास एक रेडलाइट ऐरिया है जो तकरीबन डेढ़ सौ साल पुराना है। यहां की पुरानी इमारतों से ढकी हुई बंद गलियों में आपको यहां का वेश्याबाजार दिखाई देगा। हर घर के बाहर सज-धज कर तैयार महिलाएं हर आने जाने वाले को अपने पास बुलाती नजर आ जाएंगी। जानकारी के अनुसार यहां पर पहले कोठे चलते थे और यहां पुराने जमीदार मुजरा देखने आते थे। यहां अवैध तरीके से देह व्‍यापार होता है। कभी पूरे देश में कभी शिक्षा का केंद्र रहा इलाहबाद यहां स्थित मीरगंज इलाके में स्थित कोठे के लिए भी प्रसिद्ध है। शिवदासपुर, वाराणसी: दुनिया के प्राचीन शहरों में से एक वाराणसी एक तरह से हिंदुओं का सबसे पवित्र तीर्थ है, लेकिन यहां देह व्यापार का इतिहास भी कई पुरानी गलियों में दिखाई देता है। यहां की दालमंडी और शिवदासपुर जैसे इलाके सालों पुराने देह व्यापार की मंडिया हैं। शिवदासपुर वाराणसी रेलवे स्टेशन से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर स्थित इलाका यहां के रेडलाइट इलाके के रूप में फेमस है। यह एक तरह से यूपी का सबसे बड़ा रेडलाइट इलाका है। इसी तरह यहां स्थित दालमंडी इलाका भी तमाम तरह के कानूनी पाबंदियों के बाद भी आज भी चल रहा है। यहां की तंग गलियों में घर के बाहर खड़ी लड़कियां ग्राहकों को उसी पारंपरिक तरीके से रिझाती नजर आती हैं, जैसे एक समय यहां चलने वाले कोठे में पारं‍परिक रूप से चलन में था। बुधवार पेठ पुणे: पुणे का बुधवार पेठ स्‍थान भी देश के फेमस रेडलाइट ऐरिया में से एक है। यहां बड़ी संख्‍या में नेपाली लड़कियां देह व्‍यापार मे संलिप्‍त हैं गंगा-जमुना नागपुर: महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में इतवारी इलाके में गंगा-जमुना इलाका है, जहां वेश्यावृत्ति चलती है। यह इलाका देह व्यापार के लिए जाना जाता है। चतुरभुज स्‍थान मुजफ्फरपुर: बिहार का मुजफ्फरपुर इलाका राज्य के बड़े रेडलाइट इलाकों में से एक है। बताया जाता है कि उत्तरी बिहार का यह सबसे बड़ा रेडलाइट इलाका है। मेरठ कबाड़ी बाजार: पश्चिमी यूपी के बड़े शहर मेरठ में स्थित कबाड़ी बाजार बहुत ही पुराना रेड लाइट एरिया है। यहां अंग्रेजों के जमाने से देहव्यापार किया जाता है। यहां देह व्‍यापार के धंधे मे अधिकांश नेपाली लड़कियां ही हैं।

भारत में वेश्यावृत्ति

भारत में वेश्यावृत्ति या देहव्यापार अभी भी अनैतिक देहव्यापार कानून के तहत आते हैं। समय – समय पर इसके कानूनी मान्यता को लेकर चर्चायें गर्म होती रहती हैं। सेक्सवर्करों तथा कुछ स्वयंसेवी संगठनों के द्वारा इस तरह की मांग उठती रहती है। कुछ वर्ष पहले महिला यौनकर्मियों का कोलकाता में एक अधिवेशन हुआ जिसमें यौनकर्मियों के संगठन `नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्सवर्कर्स` ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

लेकिन बगैर कानूनी मान्यता के भी पूरे देश में यह कारोबार धरल्ले से चल रहा है। देश में आज कुल ग्यारह सौ सत्तर रेड लाईट एरिया है। इसमें व्यापारिक दृष्टिकोण से सबसे ज्यादा धंधा वाला एरिया है कोलकात्ता और मुम्बई। एक आकड़े के अनुसार करोड़ों रूपयो का साप्ताहिक बाज़ार है अकेले मुम्बई का रेडलाईट एरिया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा एक ऐसा क्षेत्र है जहां देह व्यापार की प्रथा का एक लम्बा इतिहास है। इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पहले जो ` मुजरा ´ तथा नाच – गानों के केन्द्र के रूप में जाने जाते थे वही बाद में वेश्यावृत्ति के अड्डों के रूप में मशहूर हो गए।

एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में यौनकर्मियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही हैं। 1997 में यौनकर्मियों की संख्या 20 लाख थी जो 2003-04 तक बढ़कर 30 लाख हो गई। 2006 में महिला और बाल विकास विभागद्वारा तैयार रिपोर्ट में यह भी पाया गया था कि देश में 90 फीसदी यौनकर्मियों की उम्र 15 से 35 साल के बीच है।

ऐसे भी मामले देखने में आए हैं जिसमें झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तरांचल में 12 से 15 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों को भी वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकात्ता से सटा दक्षिण 24 – परगना ज़िले के मधुसूदन गांव में तो वेश्यावृत्ति को ज़िन्दगी का हिस्सा माना जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वहां के लोग इसे कोई बदनामी नहीं मानते। उनके अनुसार यह सब उनकी जीवनशैली का हिस्सा है और उन्हें इस पर कोई शर्मिंन्दगी नहीं है। इस पूरे गांव की अर्थव्यवस्था इसी धंधे पर टिकी है।

देश में रोजाना 2000 लाख रूपये का देह व्यापार होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 68 प्रतिशत लड़कियों को रोजगार के झांसे में फंसाकर वेश्यालयों तक पहुंचाया जाता है। 17 प्रतिशत शादी के वायदे में फंसकर आती हैं। वेश्यावृत्ति में लगी लड़कियों और महिलाओं की तादाद 30 लाख है। मुम्बई और ठाणे के वेश्यावृत्ति के अड्डों से तो खण्डित रूस और मध्य एशियाई देशों की युवतियों को पकड़ा गया है। भारत में वेश्यावृत्ति के बाजार को देखते हुए अनेक देशों की युवतियां वेश्यावृत्ति के जरिए कमाई करने के लिए भारत की ओर रूख कर रही हैं।

मुम्बई पुलिस के दस्तावेजों के मुताबिक बाहर से आकर यहां वेश्यावृत्ति में लिप्त युवतियों में उज्बेकिस्तान की युवतियाँ सबसे ज्यादा हैं। गृह मंत्रालय के वर्ष 2007 के आंकडे़ के अनुसार भारत में तमिलनाडु और कर्नाटक देहव्यापार में शिर्ष पर हैं। 2007 के आंकडे़ के अनुसार वेश्यावृत्ति के 1199 मामले तमिलनाडु में और 612 मामले कर्नाटक में दर्ज किए गए। ये मामले वेश्यावृत्ति निवारण कानून के तहत दर्ज किए गए हैं।

वेश्यावृत्ति और कानून (भारत)

भारतवर्ष में वैवाहिक संबंध के बाहर यौनसंबंध अच्छा नहीं समझा जाता है। वेश्यावृत्ति भी इसके अंतर्गत है। लेकिन दो वयस्कों के यौनसंबंध को, यदि वह जनशिष्टाचार के विपरीत न हो, कानून व्यक्तिगत मानता है, जो दंडनीय नहीं है। “भारतीय दंडविधान” 1860 से “वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक” 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। वेश्यावृत्ति का उन्मूलन सरल नहीं है, पर ऐसे सभी संभव प्रयास किए जाने चाहिए जिससे इस व्यवसाय को प्रोत्साहन न मिले, समाज की नैतिकता का ह्रास न हो और जनस्वास्थ्य पर रतिज रोगों का दुष्प्रभाव न पड़े। कानून स्त्रीव्यापार में संलग्न अपराधियों को कठोरतम दंड देने में सक्षम हो। यह समस्या समाज की है। समाज समय की गति को पहचाने और अपनी उन मान्यताओं और रूढ़ियों का परित्याग करे, जो वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन प्रदान करती हैं। समाज के अपेक्षित योगदान के अभाव में इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

ऐसे भी गांव जहां परंपरा है सेक्स बेचना

जिस्मफरोसी को लेकर तमाम कैंपेन चलाए जा रहे हैं। वहीं कई परिवार ऐसे हैं जो पीढियों से जिस्मफरोसी में जकडे हुए हैं। इनकी परंपरा में जिस्म को बेचना आ गया है। प्रथा के अनुसार ऐसा भी एक स्थान देष के मध्यप्रदेष में है जहां प्रथा के अनुसार परिवार की बडी बेटी को अपना जिस्म बेचना पडता है। परिवार परपंरा की बात कहकर बेटियों से जिस्मफरोसी करवाता है। उन्हे दूसरों के पास जाकर अपने ष्आपको समर्पित करना होता है।

मध्यप्रदेश का मंदसौर और नीमच जिले देह व्यापार की वजह से सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। यहां दशकों से देह व्यापार चल रहा है और अब तो पिछले कुछे सालों में ये कारोबार काफी फैल भी गया है। अब जिस्मफरोशी के काम में छोटी-छोटी बच्चियों को भी झौंका जा रहा है। एक विशेष समुदाय के परिवार मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के रतलाम, मंदसौर व नीमच जिले में रहते है। इन तीनों जिलों के 68 गांवों में इस समुदाय के लोग रहते हैं। तीनों जिले राजस्थान की सीमा से लगे हुए हैं। यूं तो मंदसौर व नीमच अफीम की खेती के लिए जहां दुनियां में जाना जाता लेकिन देह व्यापार भी उनकी पहचान बन चुकी है। 150 साल पहले अंग्रेजों ने इन्हें यहां बसाया था और  बाद में पेट भरने के लिए देह व्यापार इनका अपना मुख्य जरिया बन गया।

इस समुदाय के लोग खुद को राजपूत बताते हैं। उनका कहना है कि उनके वंशज राजवंश के इतने वफादार थे कि दुश्मनों के राज जानने के लिए वो अपनी महिलाओं को गुप्तचर बनाकर वेश्या के रूप में भेजते थे। वो महिलाएं अपने ष्अंगो का प्रदर्षन करती थी। यहां तक की हम बिस्तर होकर सामने वाले की वासनापूर्ति तक करती थी। ऐसा भी कहा जाता है कि अंग्रेज करीब 150 साल पहले इन्हें नीमच में अपने सिपाहियों की वासनापूर्ति के लिए राजस्थान से लाये थे।

मजबूरी में करती हूं सेक्स, परिवार चलाने के लिए बेचना पड़ता है जिस्म

इंदौर मंदसौर नीमच यह इलाका दुनियाभर में अफीम की खेती के लिए पहचाना जाता है। अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका, मैक्सिको के साथ अफीम उत्पादकों की सूची में शामिल भारत का यह क्षेत्र एक और कारण से कुख्यात है। सरकारी नियंत्रण में अफीम उत्पादित करने वाले राजस्थान की सीमा से सटे मध्यप्रदेश के मंदसौर, नीमच और रतलाम जिलों में देह व्यापार का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है। दरअसल पंरपरा के नाम पर अपनी ही बेटियों, बहुओं और पत्नी से देह व्यापार करवाने वाला बांछड़ा समुदाय देह व्यापार के इस बढ़ते नेटवर्क का सबसे बड़ा कारण है। जिस्म बेचकर पेट पालने में कोई संकोच नहीं करने वाले इस समुदाय में मां-बाप स्वयं ही अपनी बेटियों को इस धंधे में उतारते हैं।

ये बुराई अब हाईप्रोफाईल और हाईटेक होती जा रही है। इस काम में फंसी कच्ची उम्र की लड़कियों के कपड़े पहनने का ढंग तो बदला ही है। वे अब ग्राहकों को लुभाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट और वाट्स एप्प का उपयोग करने लगी हैं।

मां भाभी और बडी बहन सिखाती है पुरुषों को खुश करने के हुनर
बांछड़ा समुदाय में घर की बहन, बेटियों से देह व्यापार करवाने का चलन है। आश्चर्य की बात ये है कि इस जाति के लोग इसे बिलकुल भी गलत या बुरा नहीं मानते, उल्टा इनके यहां मां, भाभी और बड़ी बहन खुद कम उम्र की बच्चियों को पुरुषों को खुश करने के हुनर सिखाती हैं, ताकि वो इस काम में बेहतर हो सकें।

ड्रेसअप बदला, ग्राहकों को लुभाने का तरीका भी
रतलाम, नीमच और मन्दसौर से गुजरने वाले हरेक हाई वे पर शाम ढलते ही एक अलग नज़ारा दिखने लगता है। यहां बने लगभग हर ढाबे या चाय की दुकान पर आसपास रहने वाली लड़कियों का झुंड नजर आने लगता है। स्लीव लेस सलवार सूट, जीन्स-टीशर्ट या किसी अन्य माड ड्रेस में नज़र आने वाली इन लड़कियों को हाइवे के अासपास बैठे या गिल्ली डंडा जैसे अन्य खेले खेलते देखा जा सकता है। यहीं से शुरू होता है ग्राहकों को लुभाने का सिलसिला। डेरे के भीतर जाते ही इन लड़कियों के हाईटेक रंग ढंग दिखने लगते हैं, जहां ये स्मार्ट फोन और वाट्स एप खेलती नज़र आती हैं।
हर एक के पास है स्मार्ट फोन और फोन पर है सहेलियों के फोटोज
अपना नाम छुपाने की शर्त पर इनमें से एक लड़की ने बताया कि उनके गांव की ज़्यादातर लड़कियों ने नई तरह के कैमरे वाले फोन खरीद लिए हैं। जिन पर ये अपनी सहेलियों के फोटोज और कई बार वीडियो भी रखती हैं। यदि कोई ग्राहक इनकी जगह किसी ओर लड़की की डिमांड करता है तो ये तुरंत उसे अपने मोबाइल से फोटो निकालकर दिखा देती हैं। ज़रुरी होने पर कभी-कभी वाट्स एप पर भी भेज देती हैं।
बेटी के लिए मांगते है मन्नत,उसकी कमाई पर चलता है घर
बांछडा जाति के लोग अपने घर में बेटी पैदा होने के लिए मन्नत मांगते हैं। उसकी परवरिश भी खास तरीके से की जाती है। थोडा बड़ा होने पर घर की महिलाएं उसे पुरुषों को खुश करने के हुनर सिखाने लगती हैं। उसके बाद उसे धंधे में उतार दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक बांछडा समुदाय की एक हज़ार से भी ज़्यादा लड़कियां देह व्यापार के इस कुचक्र में फंसी हुई हैं। इस समाज के पुरुष इनकी कमाई के भरोसे ही रहते हैं खुद कोई काम नहीं करते।
उज्जैन रेंज के आईजी मधुकुमार बाबू ने चर्चा में कहा कि उन्हें भी इस बात की सूचना मिली है कि अब ये लोग हाइटेक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में पुलिस ने नीमच और रतलाम में इनके खिलाफ कारवाई की है, लेकिन समस्या ये है कि इस जाति के लोग इस काम को बुरा मानते ही नही हैं। इस बुराई को अकेले क़ानून से नहीं मिटाया जा सकता। समाज को जागरुक करना ही इसका एकमात्र उपाय है।
निया के इस इलाके में आज भी वक्त ठहरा हुआ है। सैकड़ों सालों से यहां की घड़ी बंद हो गई है। हाई-वे के किनारे बसे इन गांवों-डेरों में सदियों से चल रही कुप्रथा आज भी जारी है। एक समुदाय है, जो परंपरा की दुहाई दे कर अपने घर की बड़ी बेटी से जिस्मफरोशी कराता है। परंपराओं की दुहाई जिस्मफरोशी के लिये दी जाती है, लेकिन जब सुविधाओं की बात होती है तो आधुनिकता की दुहाई दी जाती है।

अफीम की खेती के लिए पहचाना जाने वाला मध्यप्रदेश का मंदसौर और नीमच जिला देह व्यापार के कारण चर्चाओं में बना रहता है। महिलाओँ के हालात सुधारने व सशक्तिकरण की कई योजनाएँ चल रही हैं, वहां चर्चाओं का बाजार कई बार आम जनता से लेकर कई बार विधानसभा तक भी पहुंच चुका है, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।

यहां दशकों से देह व्यापार चल रहा है। पिछले कुछे सालों में जिस्म की मंडियों का विस्तार हुआ है। खासकर, अब देह व्यापार में अब छोटी-छोटी बच्चियों को भी ढ़केला जा रहा है। चिंताजनक यह है कि देह व्यापार के चलते इस जिले में एड्स भी तेजी से अपना दायरा बढ़ा रहा है। जिले में एक विशेष समुदाय के परिवार मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के रतलाम, मंदसौर व नीमच जिले में रहते हैं। इन तीनों जिलों में कुल 68 गांवों में इन समुदाय के डेरे बसे हैं। मंदसौर शहर क्षेत्र सीमा में भी इस समुदाय का डेरा है।

तीनों जिले राजस्थान की सीमा से लगे हुए हैं। रतलाम जिले में रतलाम का शहरी इलाका, जावरा, आलोट, सैलाना, पिपलौदा व बाजना तहसील हैं। मंदसौर जिले में मंदसौर, मल्हारगढ़, गरोठ, सीतामऊ, पलपुरा, सुवासरा व नीमच में नीचम, मनासा व जावद तहसील है।

मंदसौर व नीमच जिला अफीम उत्पादन के लिए जहां दुनिया में प्रसिद्ध है, वहीं इस काले सोने की तस्करी के कारण बदनाम भी है। इन तीनों जिलों की पहचान संयुक्त रूप से इस समुदाय के परंपरागत देह व्यापार के कारण भी होती है। 150 साल पहले अंग्रेजों द्वारा यहां बसाये गए इस समुदाय ने पेट भरने के लिए देह व्यापार को अपना मुख्य जरिया बना लिया है।

जानें हैरान कर देने वाली कहानी 
इस समुदाय की उत्पत्ति कहां से हुई, यह कुछ साफ नहीं है। जहां समुदाय के लोग खुद को राजपूत बताते हैं, जो राजवंश के इतने वफादार से थे कि इन्होंने दुश्मनों के राज जानने अपनी महिलाओं को गुप्तचर बनाकर वेश्या के रूप में भेजने में संकोच नहीं किया। कुछ लोगों का तर्क है कि करीब 150 साल पहले अंग्रेज इन्हें नीमच में तैनात अपने सिपाहियों की वासनापूर्ति के लिए राजस्थान से लाये थे। इसके बाद ये नीमच के अलावा रतलाम और मंदसौर में भी फैलते गये।

सरकार ने किया प्रयास
ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस जाति को देह व्यापार से निकालने कोई जतन नहीं किया हो, लेकिन इस समुदाय के लोग पेट भरने के लिए दूसरे कामों के बजाय जिस्म बेचना अधिक सरल मानते हैं। वेश्यावृत्ति को दूर करने के लिए शासन ने 1992 में जाबालि योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत समुदाय के छोटे बच्चों को दूषित माहौल से दूर रखने के लिए छात्रावास का प्रस्ताव था। इस योजना को दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन जिस्म की मंडियां अब भी सज रही हैं। इस समुदाय को जिस्मफरोसी के धंधे से बाहर निकालने कई बड़े एनजीओ भी लगातार सक्रिय हैं।

कभी करते थे नाच-गाने का प्रोग्राम

समुदाय के लोग कभी गुर्जरों के समक्ष नाच-गाना करते थे। ये कभी स्थायी नहीं रहे। एक गांव से दूसरे गांव भ्रमण कर अपना गुजर बसर करते थे।

 

विधानसभा में भी उठा मुद्दा 

समुदाय में व्याप्त परंपरागत देह व्यापार का मुद्दा मध्यप्रदेश विधानसभा में पहले भी गूंज चुका है। इस परंपरा को रोकने के लिए विधानसभा सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित कर चुकी है। 23 फरवरी, 1983 को राज्य की विधानसभा में इस मुद्दे को लेकर लंबी बहस हुई थी। बाबूलाल गौर ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया था कि रतलाम और मंदसौर के राजस्थान से लगे हिस्सों में जाति की लगभग 200 बस्तियों में वेश्यावृत्ति अपनाना पड़ रहा है। इस प्रथा को रोकने सरकार पहल करे।

समुदाय की प्रथा

समुदाय में प्रथा के अनुसार घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है। रतलाम नीमच और मंदसौर से गुजरने वाले हाई-वे पर समुदाय की लड़कियां खुलेआम देह व्यापार करती हैं। वे राहगीरों को बेहिचक अपनी ओर बुलाती हैं। इस धंधे में उनका पूरा परिवार मदद करता है।

वैश्या बनना बुरा नहीं माना जाता
ऐसा माना जाता है कि ये समुदाय के लोगों ने राजपूतों की रक्षा के लिए अपनी महिलाओं को वैश्या के रूप में गुप्तचर बनाया था इस कारण इनके यहां वैश्या बनना बुरा नहीं माना जाता है।

इस समुदाय के लोग ग्रुप में रहते हैं, जिन्हें डेरा कहते हैं। समुदाय के अधिकतर लोग झोपड़ीनुमा कच्चे मकानों में रहते हैं। इनके बारे में यह भी कहा जाता है कि मेवाड़ की गद्दी से उतारे गये राजा राजस्थान के जंगलों में छिपकर अपने विभिन्न ठिकानों से मुगलों से लोहा लेते रहे थे। माना जाता है कि उनके कुछ सिपाही नरसिंहगढ़ में छिप गये और फिर वहां से मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के काडिय़ा चले गये।

जब सेना बिखर गई तो उन लोगों के पास रोजी-रोटी चलाने का कोई जरिया नहीं बचा। गुजारे के लिए पुरुष राजमार्ग पर डकैती करने लगे और महिलाओं ने वेश्वावृत्ति को अपना लिया। ऐसा कई पीढिय़ां तक चलता रहा और अंतत: यह परंपरा बन गई।

मर्दों का देह व्यापार

दोस्तों, आज तक आपने रेड लाइट इलाकों के बारे में काफी सुना होगा, जहां औरतों का देह व्यापार होता है। मर्दों का देह व्यापार – दोस्तों, आज तक आपने रेड लाइट इलाकों के बारे में काफी सुना होगा, जहां औरतों का देह व्यापार होता है। लेकिन आज हम आपको जिस गली के बारे में बता रहे हैं वहां औरतों का नहीं, बल्कि मर्दों का देह व्यापार होता है। डॉक्टर, इंजीनियर से लेकर सभी तरह के मर्द यहां पर बिकते हैं। और आपको जानकर काफी हैरानी होगी, कि ये गली किसी दूसरे देश में नहीं, बल्कि भारत देश में हीं है। जी हां दोस्तों भारत की इस बदनाम गली में मर्दों का होता है देह व्यापार।खबरों की मानें तो इस काम में अच्छे-अच्छे परिवार के लड़के  जिनमें इंजीनियरिंग और डॉक्टरी करने वाले छात्र शामिल होते हैं।मर्दों का देह व्यापार की इस मंडी में हैंडसम और भोले-भाले लड़कों की बोली लगती है। पैसे कमाने की खातिर लोग यहां अपना जिस्म बेचते हैं। इन लड़कों को ‘कॉल बॉयस’ के नाम से जाना जाता है। दोस्तों, आपको बता दें कि भारत की ये बदनाम गली कहीं और नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में है।रात होते हीं इस गली में महिलाएं पहुंचने लगती हैं मर्दों का देह व्यापार के लिए। आज तक आपने रेड लाइट इलाकों में महिलाओं को इस व्यापार मैं लिप्त पाया होगा। लेकिन पहली बार जब मर्दों के देह व्यापार की इस मंडी के बारे में खबर फैली, तो हर कोई जानकर हैरान रह गया।रात के 9 बजते हीं मर्दों का देह व्यापार की मंडी सजने लग जाती है। और सुबह के 4 बजे तक ये धंधा चलता रहता है। इस मंडी में एक से बढ़कर एक पैसे वाली महिलाएं पहुंचती हैं। और अपने पसंद के लड़के को खरीदकर उनके साथ शारीरिक शोषण करने का काम करती है। कहते हैं कि महिलाएं जिन लड़कों को खरीदती हैं, उनके साथ इस तरह के शारीरिक शोषण करती हैं, जिसे देखकर किसी के भी रूह कांप जाए।खैर जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि जिस तरह महिलाओं के द्वारा वेश्यावृत्ति के धंधे को शुरुआत में अपनाया गया और धीरे-धीरे इस में तरक्की होता चला गया। ठीक उसी तरह, हो सकता है कि मर्दो के देह व्यापार का धंधा भी बढ़ता जाए और देश भर में ये फैल जाए। आखिर पैसे की जरूरत को पूरा करने के लिए जब महिलाएं इस तरह के दलदल में अपने कदम डालती हैं। तो पुरुष भी पैसों के लिए इस तरह के कार्य कर सकते हैं, और कर भी रहे हैं।