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धर्म और धर्म नायक – परम पूज्य आचार्य प्रवर 1008 श्री जवाहरलालजी म.सा.

किसी भी मकान या महल की मजबूती उसकी पुख्ता नींव पर अवलंबित है। इसीलिये मकान बनाते समय गहरी से गहरी और पुख्ता से पुख्ता नींव डाली जाती है। मानव-जीवन यदि मकान के समान है, तो धर्म उसकी नींव है। बिना धर्म के मानव जीवन टिक नहीं सकता अर्थात् धर्म के अभाव में जीवन, मानव जीवन न रहकर पाशविक जीवन बन जाता है। अतः जीवन को उत्तम मानवीय जीवन बनाने के लिये धर्म रूपी नींव गहरी और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। धर्म रूपी नींव यदि कच्ची रहेगी, मकान शंका, कुतर्क, अज्ञान, अनाचार और अधर्म आदि के तूफानों से हिल जाएगा और उसका पतन हुए बिना न रहेगा।

मकान की नींव मजबूत बनाने के लिये जैसे पानी की, चुने की, रेत की, सीमेंट की आवश्यकता है, उसी प्रकार पलस्तर की और रंग-रोगन आदि की भी अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इसी प्रकार मानव-जीवन रूपी मकान की नींच की मजबूती के लिये सभ्यता, संस्कृति, नागरिकता, राष्ट्रीय भावना, धार्मिकता, कुलीनता, सामूहिकता तथा एकता आदि लौकिक धर्मों के पालन की सर्वप्रथम आवश्यकता है। तत्पश्चात् धर्म को जीवन धर्म बनो के लिये विचारशीलता, क्रियाशीलता आदि लोकोत्तर धर्मों के पालन की भी अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इस प्रकार जब लौकिक और लोकोत्तर धर्मों का ठीक तरह समन्वय करके पालन किया जाता है, तब मानव जीवन का असली उद्देश्य मोक्ष सिद्ध होता है। लौकिक धर्म से शरीर की और विचार की शुद्धि होती है और लोकोत्तर धर्म से अन्तःकरण एवं आत्मा की शुद्धि होती है। इस प्रकार मनुष्य लौकिक और लोकोत्तर धर्म का पालन करके अपने जीवन धर्म, आत्मिक धर्म की शुद्धि और अन्त में सिद्धी का लाभ प्राप्त करता है। जीवन धर्म की शुद्धि और सिद्धी प्राप्त करने के उद्देश्य से शास्त्रकारों  ने लौकिक और लोकोत्तर धर्म रूपी दस प्रकार के धर्मों की योजना की है। यही नहीं, चूंकि धर्मनायकों के बिना धर्म टिक नहीं सकता, अतएव दस धर्मों के अनुसार दस प्रकार के धर्मनायकों की भी सुन्र योजना की गई है।

जैन सूत्र स्थानांग (ठाणांक सुत्त) नामक तीसरे अंगसूत्र में निम्नलिखित दस धर्मों का विधान किया गया हैः-

1. ग्राम धर्म, 2. नगर धर्म, 3. राष्ट्र धर्म, 4. व्रत धर्म, 5. कुल धर्म, 6. गण धर्म, 7. संघ धर्म, 8. सूत्र धर्म, 9. चारित्र धर्म, 10. अस्तिकाय धर्म। इन दस धर्मों का पालन करने के लिये तथा अन्य प्रकार की नैतिक और धार्मिक व्यवस्था की रक्षा के लिये दस प्रकार के धर्मनायकों की योजना की गई है। धर्मनायकों के नाम इस प्रकार हैः-

1. ग्राम स्थविर, 2. नगर स्थविर, 3. राष्ट्र स्थविर, 4. प्रशास्ता स्थविर, 5. कुल स्थविर, 6. गण स्थविर, 7. संघ स्थविर, 8. जाति स्थविर, 9. सूत्र स्थविर, 10. दीक्षा स्थविर

संघ धर्म (संघ धम्मे)

सुखा संघस्य सामग्गी, समग्गानं तपो सुखी

अर्थात संघ की सामग्री (एकता संगठन) सुखकारक है और ऐक्य संगठन पूर्वक रहने वाले श्रावक श्राविका, साधु-साध्वी, समस्त संघ काि तपश्चरण भी सुखकारक होता है- सुत्तनिपात

जैन धर्म और संघ धर्म का अत्यन्त घनिष्ठ संबध है। संघधर्म जैन धर्म रूप विशाल प्रासाद का जीवन स्तम्भ है। जैसे धर्मी के बना धर्म नहीं टिक सकता, इसी प्रकार संघधर्म के बिना जैन धर्म नहीं टिक सकता।

भगवान महावीर के समान सुन्दर संघ योजना का प रिचय किसी भी संघ स्थापक ने नहीं दिया। भगवान महावीर की संघ योजना से सम्पूर्ण आर्यावर्त्त का इतिहास समुज्जवल है। भगवान महावीर का जिन शासन, जो अब तक व्यवस्थित रूप से चल रहा है, सो उनके द्वारा प्ररूपित सम्यक् संयोजना की बदौलत ही। संघ धर्म का ध्येय व्यक्ति के श्रेय के साथ समष्टि के श्रेय का साधन करना है। जब समष्टि के श्रेय का साधन करना संघ धर्म के ध्येय बन जाता है। संघ धर्म को व्यवस्थित रखने का उत्तरदायित्व संघ के प्रत्येक सभ्य पर रहता है। संक्षेप में संघ का धर्म है- संघ के प्रत्येक सभ्य का श्रम साधन करना।

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