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धार्मिक स्‍थल

जब धार्मिक स्थलों की बात होती है तो मन्‍दसौर की ओर बरबस ही नजर ठहर जाती है। निश्चित ही भारत धार्मिक स्थलों के मामले में अमीर है। लेकिन हम बात कर रहे हैं दुनिया के उन प्रमुख स्थलों की जो जितने प्रसिद्ध हैं उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और विवादित भी। हिन्दू धार्मिक स्थलों के रुप में विश्‍व विख्‍यात पशुपतिनाथ मंदिर व बही पार्शवनाथ मन्दिर देश में प्रसिद्ध तीर्थ स्‍थल के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए हैं ओर यह हमारे लिए गर्व की बात है कि यह मन्‍दसौर में स्थित है । जन मानस में इन स्थलों के प्रति प्रगाढ श्रद्धा तथा भक्ति है। प्रत्येक स्थल से कोई न कोई मान्यता सम्बद्ध है तथा प्रत्येक की अपनी मौलिक विशेषताएँ हैं।

1. दुधलेश्‍वर मन्दिर, चिरमोलिया (तहसील मन्‍दसौर):-
मन्‍दसौर सीतामऊ मार्ग पर चिरमोलिया नामक ग्रा में स्थित यह मन्दिर जगन्‍नाथ महादेव के मन्दिर के नाम से जाना जाता है। डॉ. वाकणकर ने मन्दिर की दीवारों व प्रवेश द्वारों के आसपास उत्‍कीर्ण अनेक नामों का अध्‍ययन कर पता लगाया कि इसका प्राचीन नाम ‘दुधलेश्‍वर’ ही था। मूल मन्दिर प्रतिहारकाल में निर्मित हुआ होगा जिसके तोड़े जाने पर मराठा काल में इसका पुन: जीर्णोंद्धार किया गया।

2. कोटेश्‍वर महादेव (तहसील सीतामऊ) :-
सीतामऊ से पश्चिम में कोई 8 कि.मी. दूर यह स्‍थान एक गीड़ नदी के तट पर स्थित है। यहाँ सीतामऊ राजवंश की कोठी भी बनी है। मन्दिर के समीप धर्मशाला व भोजन बनाने की भी सुविधा है।

3. कालेश्‍वर (तहसील गरोठ) :-
साठखेड़ा नामक गाँव में संवत् 1317 में इस मन्दिर की स्‍थापना की गई, ऐसा यहाँ के पण्‍डाजी का मत है। कलात्‍मक काँच जड़े इस मन्दिर में कालेश्‍वर भैरव की चार प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। सर्प विष के निदान हेतु यह स्‍थान प्रख्‍यात है। इनके नाम से कच्‍चे सूत की तांती धारण करने से विष उतर जाता है, ऐसी मान्‍यता है।

4 दुधाखेड़ी माता जी (तहसील भानपुरा):-
भानपुरा-गरोठ मार्ग पर लगभग 1 कि.मी. पैदल चलकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। मन्दिर में महिषासुर – मर्दिनी की प्रतिमा है। यहाँ अनेक रोगों के निदान हेतु ग्रामीण यात्रा करते हैं। यहाँ सिंधिया होल्‍कर शासकों द्वारा निर्मित धर्मशालाएँ है।

5. ताखाजी (तहसील भानपुरा):-
भानपुरा से लगभग 22 कि.मी. उत्तर-पूर्व में स्थित इस निर्जन स्‍थल के सबसे करीब का ग्राम नावली है। गहन वन श्री में स्थित इस स्‍थान पर एक विशाल प्राकृतिक कुण्‍ड है जिसमें लगभग 100 फीट ऊँचे से जलप्रताप गिरता है। जनश्रुति है कि जनमेजया के नागयज्ञ से निकलकर तक्षक यहाँ गिरा था। यहाँ तक्षक की विशाल मानवाकार प्रतिमा है। सप्‍तनागों के घटाटोपयुक्त तक्षक के दाहिने हाथ में कमल व बाएँ में चसक हैं। नीचे एक ओर नाग व एक ओर धनवन्‍तरी का अंकन है। प्रतिमा 12 वीं सदी की है। इस स्‍थान की खोज जेम्‍स टॉड ने की थी।

6. बही पार्श्‍वनाथ (तहसील मल्‍हारगढ़) :-
नीमच-महू मार्ग पर 2 कि.मी. दूर ग्राम बही में पार्श्‍वनाथ का मन्दिर है। इसके अतिरिक्‍त जैन श्‍वेताम्‍बर तीर्थ परासली (तहसील गरोठ) अंत्रालिया, भानपुरा, संधारा, नीमथूर तथा मन्‍दसौर में अत्‍यधिक सुन्‍दर व कलात्‍मक जैन मन्दिर विद्यमान है।

7. बाबा रामदेव जी का मंदिर (मल्‍हारगढ़) :-
बाबा रामदवे जी का यह मंदिर मल्‍हारगढ़ जिला मन्‍दसौर मध्‍य प्रदेश में स्थित है। इसे मालवांचल का रामदेवरा भी कहते है। बाबा रामदेव के भक्त श्री लूणदास जेलिया निवासी राजाजी का करेड़ा (राजस्थान) व्यथित होकर चलते-चलते परिवार सहित जावरा स्टेट मल्हारगढ़ आ बसे यहाँ विधि-विधान से बाबा की पूजा अर्चना करते रहे। यहाँ बाबा की भक्ति करते देख रामदेव स्वयं प्रकरण हुए तथा कहा लूणदास क्या कर रहा है श्वेत घोड़े पर सवार बाबा को देख भक्त लूणदास जावरा नवाब का कारिंदा समझे तथा पांव पकड़ लिये। बाबा रामदेव ने लूणदास से कहा रोज तुम मेरे चरण पड़ते हो अब तो छोड़ तब बाबा रामदेव ने कहा कि जिसकी तु पूजा करता है मैं स्‍वयं बाबा रामदेव हॅू। भक्त लूणदास को विश्वास नहीं हुआ। तब बाबा रामदेव ने कहा मारवाड़ तथा गुजरात में तो मेरे कई भक्त है। मालवा में तेरे बराबर कोई भक्त नहीं है। इस अंचल में मेरा पूजा का प्रचार तू ही करेगा। मेरी पूजा का प्रचार-प्रसार सही रुप से कर। तब बाबा ने उपदेश दिया ओर कहा कि में तुझे बताता हॅू वेसा कर, लूणदास ने सुना तो हैरत में पड़ गये, कहां मेरी इतनी साम्थर्य कहां मैं अपने घर पर आपकी पूजा करता हॅू वही बहुत है तब बाबा ने कहा यहां से 1 कोस दूरी पर जो भी पहाड़ी (मगरा) आये, वहां मेरे चरण कमल मिलेंगे तथा 8-9 फीट खुदाई करना पूजा अर्चना की सारी सामग्री जमीन में मिलेगी।
भक्त लूणदास ने डरते हुए ग्राम के पटेल तथा ग्राम के वरिष्ठ जनों को यह बात कही। भक्त की सादगी पूर्ण दिनचर्या एवं पूजा अर्चना से गांव के जन वैसे ही प्रभावित थे। भक्त की बातों पर पूर्ण विश्वास कर गांव के नर-नारी ढोल नगाड़े के साथ बताई गई जगह जेलिया पारा (मगरा) पर खुदाई की गई। लगभग साढ़े आठ फीट खुदाई करने के बाद बाबा रामदेव के चरण कमल शंख घड़ियाल आदि सामग्री निकली वो ही चरण कमल आज मंदिर में विराजमान है एवं चबुतरा बनाकर उक्त सामग्री की पूजा अर्चना करते-करते यहां दीन दुखियों की मुरादें पूरी होने लगी। अंधों की आंखें खुलने लगी, बांझों को पुत्र रत्नों की प्राप्ति हाने लगी। हजारों पालने प्रतिवर्ष बंधने लगे। बिमारी व्याधियों समाप्त होने लगी तथा रोज मेला सा लगने लगा। यात्रियों हेतु स्नान आदि के लिए कुईया खुदाई गई। केवल सोलह हाथ गहाराई पर कुईयां में दूख निकला तथा अथाह पानी केवल 4 – 4 फीट चौड़ी कुईयां में रहने लगा। भक्तों की मुरादें, व्याधियां, इस पानी से दूर होने लगी। जिसका प्रचार-प्रसार मालवा अंचल, मेवाड़ में होने लगा तथा रामदेवरा के नाम से मल्हारगढ़ माना जाने लगा और बाबा रामदेव ने स्वयं बाबा लूणदास की भक्ति से प्रेरित होकर जीवित समाधि लेने हेतु भक्‍त लूणदास को सपने में आकर आदेश प्रदान किया, आदेशानुसार भक्त लूणदास ने सम्पूर्ण समाज और नगरवासियों के समक्ष जीवित समाधि ली। समाधि लेने के पश्चात मंदिर की और महिमा बढ़ने लगी। परे भदवामास में मेला भरने लगा तथा दूर दराज से भक्त पैदल यात्रा कर आने लगे तथा अपने मन की मुरादें पाने लगे। सम्पूर्ण हिन्दुस्‍तान के प्राचीन मंदिरों में इस मंदिर का तीसरा स्थान है तथा मेवाड़ मालवांचल का प्रथम प्राचीन मंदिर है। उक्‍त मंदिर का दो बार पूर्व में जीर्णोंद्धार हो चुका है। वर्तमान में मंदिर स्थित कुईयां का पानी खारा रहता है तथा भदवामाह में मेले के समय मीठा हो जाता है इतनी कम गहराई तथा कम चौड़ी कुईयां का पानी कभी सूखता नहीं। सैकड़ो वर्षों से आज पर्यन्‍त किसी ने पानी सुखते हुए आज नक नहीं देखा।
उक्‍त मंदिर पर अनेकों चमत्कार समय-समय पर होते रहे है एक बार ग्रामवासियों की मनगढंत शिकायतों पर तत्कालीन जावरा नवाब स्वयं मंदिर पर आये तथा पुजारी को भला बुरा कहते हुए जूते सहित मंदिर ही सीढ़ी पर चढ़ने लगें। बाबा के चमत्कार ने तुरन्त उन्हें अंधा कर दिया तत्पश्चात पुजारी द्वारा बाबा की अरदास करने तथा नवाब के कुईयां के पानी से स्नान करने के बाद ही उनकी आंखों की रोशनी लोटी। तब नवाब ने पुजारी से कहा बोलों मंदिर के लिये क्या आवश्यकता है तब पुजारी ने बताया कि मुझे मंदिर के लिये कुछ नहीं चाहिये सब बाबा पूर्ति करते है।
मंदिर पर एक बार चोरी हुई तथा मंदिर के सारे सोने चांदी के जेवरात लूट कर चोर ले गये वे एक कोस भी नहीं जा पाए और सबके सब अंधे हो गये। पुनः मंदिर की सामग्री जेवराज मंदिर पर स्थापित करने के बाद ही उनकी आंखों की रोशनी लोटी।
आज भी भादवा सुदी एकम बीज तथा तीज का तीन दिवसीय मेला सेकडों वर्षो से मंदिर परिसर में लगता चला आ रहा है। तथा बाबा का चल समारोह निकलता है। मंदिर परिसर की व्यवस्था बाबा लूणदासजी जेलिया के वंशज प्रन्द्रह पीढ़ी से करते चले आ रहे है तथा वर्तमान में गांव में मेले की व्यवस्था नगर पालिका द्वारा संचालित की जाती है।
आज बाबा रामदेवजी के गांव-गांव मंदिर है परन्तु उक्त मंदिर जैसा कोई चमत्कारी एवं प्राचीन मंदिर नहीं है। बाबा के मंदिर का जिर्णोद्धार 2014 व 2015 किया गया।

8. अष्‍टमुखी शिव (पशुपतिनाथ) :-
यह प्रतिमा सोमवार 10 जून 1940 में शिवना के गर्भ से उदाजी धोबी को प्राप्‍त हुई थी। बाबू शिवदर्शनलाल जी अग्रवाल ने इसे घाट पर लाकर रखवाया। पुज्‍य प्रत्‍यक्षानन्‍दजी ने अपने अथक प्रयासों से 24 नवम्‍बर 1961 में इसे प्रतिष्ठित कराकर इसे ‘पशुपतिनाथ’ नाम प्रदान किया व मन्दिर निर्माण का श्रीगणेश किया।
पशुपतिनाथ की यह दुर्लभ प्रतिमा 7.25 फीट ऊँची, गोलाई में 11.25 फीट तथा वजन में 125 मन (पक्‍का) या 46 क्विंटल 65 किलो 525 ग्राम है। शिल्‍पशास्‍त्र के अध्‍येताओं के अनुसार यह प्रतिमा गुप्‍त औलिकर युग में निर्मित जान पड़ती है। (अर्द्धनिर्मित मूल प्रतिमा) सम्‍पूर्ण विश्‍व में अष्‍टमुखी शिव की यह एक मात्र प्रतिमा है जो इतनी विशाल, अलंकृत, प्रभावोत्‍पादक व प्राचीन है।
इस मन्दिर के समीप अनेक देवालयों का का निर्माण हो चुका है। इनमें राम मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, गायत्री मन्दिर, हनुमान मन्दिर एवं गणपति मन्दिर आदि प्रमुख है। प्र‍त्‍येक कार्तिक माह में यहाँ 10 दिवसीय मेला भरता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु दर्शन कर पुण्‍य अर्जित करते हैं। दर्शनार्थियों के लिए मन्दिर प्रांगण में ही धर्मशाला एवं भोजन की सुविधा उपलब्‍ध है।

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कुबेर मंदिर (मंदसौर-खिलचीपुरा) –
मंदसौर के खिलचीपुरा में स्थित धौलागढ़ महादेव मंदिर में भगवान कुबेर की दुर्लभ प्रतिमा है। शहर से 5 किलोमीटर दूर खिलचीपुरा के कुबेर मंदिर में धनतेरस पर श्रद्धालुओं का तांता लगाता है। यह मंदिर पशुपतिनाथ महादेव जी से लगभग 1.5 किमी दूर है, 1400 साल पुराने शिव-कुबेर मंदिर में धनतेरस के दिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते है। मंदिर के पुजारी हेमंत गिरि गोस्वामी की मानें तो यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। विश्व में दो ही स्थान ऐसे हैं, जहां शिव पंचायत में कुबेर भी शामिल हैं। एक देश के चार धामों में शामिल केदारनाथ में तथा दूसरी प्रतिमा गुप्तकाल के 1400 साल पुराने धौलागढ़ महादेव मंदिर में हैं। इतिहासविद् डॉ. कैलाश पांडेय के अनुसार कुबेर की प्रतिमा उत्तर गुप्तकाल 7 वीं शताब्दी में निर्मित है। मराठा काल में धोलागिरी महादेव मंदिर के निर्माण के दौरान इसे गर्भगृह में स्थापित किया गया। इस मंदिर में भगवान गणेश व माता पार्वती की प्रतिमा भी है। डॉ. पांडेय बताते हैं कि 1978 में इस प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में देखा गया। प्रतिमा में कुबेर बड़े पेट वाले, चतुर्भुजाधारी सीधे हाथ में धन की थैली और तो दूसरे में प्याला धारण किए हुए है। नर वाहन पर सवार इस प्रतिमा की ऊंचाई लगभग तीन फीट है। यह मंदिर पश्चिममुखी है। संभवत: पश्चिममुखी कुबेर प्रतिमा केदारनाथ के बाद मंदसौर में ही स्थापित है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि हर भक्त को सिर झुकाकर दर्शन के लिए जाना पड़ता है। शिव मंदिर में छोटा सा दरवाजा है। दरवाजे की ऊंचाई करीब तीन फिट है। इसमें एक साथ दो भक्त प्रवेश नहीं कर सकते। इसे गुप्तकाल की माना जाता है। प्रतिमा पहले अन्य किसी स्थान पर थी, जहां से इसे खिलचीपुरा स्थित शिव मंदिर में विराजित किया था। कुबेर की सबसे बड़ी प्रतिमा व प्रसिद्धि के चलते लोग इसे कुबेर मंदिर के नाम से जानने लगे। मंदिर के गर्भगृह में के दरवाजे में ताला नहीं लगाया जाता है। मंदिर के पट बंद नहीं करने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। मंदिर की सुरक्षा के लिए 20 साल पूर्व नंदीगृह में सुरक्षा दीवार बनाई थी। सुरक्षा बतौर जाली के दरवाजे लगाए लेकिन गर्भगृह को आज भी खुला रखा है।
कुबेर को धन का देवता कहा जाता है। धनतेरस पर मंदिर में पूजन और दर्शन विशेष फलदायी होता है। इसके चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु हर साल आते हैं। दूरदराज के श्रद्धालु भी पूजन के लिए आते है। मध्‍य प्रदेश के बाहर से गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों के दर्शनार्थी यहां पर आकर धर्म लाभ लेते हैं।
पहले पूजते हैं कुबेर, वंश पंरपरा से है पुजारी – मंदिर के पुजारी हेमंत गिरी गोस्वामी ने बताया धनतेरस पर मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश के बाद पहले कुबेर का पूजन करते हैं। इसके बाद शिव का पूजन कर जलाभिषेक करते हैं। वंश परंपरानुसार मंदिर की पूजन व्यवस्था पहले उनके पिता कन्हैयालाल गिरी और उनके दादा नंद गिरी ने संभाली। अब वे मंदिर की पूजन व्यवस्था संभाल रहे हैं।

परासली तीर्थ (तहसील शामगढ) –
परासली छोटा सा कस्‍बा है जहॉं जैन श्रावक का न‍ही है। देवविमान सम जिनालय में विराजमान श्री आदिनाथ भगवान एवं 23 अन्‍य प्रतिमाऍं है। यह शांत रमणीय साधना का केन्‍द्र है। दूर दूर से दर्शनाथी यहॉं आते है। य‍हॉं फाल्‍गुन शुक्‍ल 8 एवं 9, कार्तिक पूर्णिमा एवं अक्षय तृतीया को उत्‍सव मनाया जाता है जिसमें दूर दूर से उपासक आते है। यहॉं चमत्‍कारिक घटनाऍं भी देखी जाती है। शामगढ से 10 किलोमीटर डामर रोड द्वारा पहुँचा जा सकता है।

लक्ष्‍मी मंदिर (मंदसौर) –
नगर के गणपति चौक और किला रोड के डांगिया गली में प्राचीन लक्ष्मी मंदिर है। इसमें वे भगवान नारायण के साथ विराजित हैं। जहां रतलाम के लक्ष्मी मंदिर में श्रद्धालु कराेड़ों रुपए सजावट के लिए रखते है वहीं मंदसौर के इन मंदिरों में दर्शनार्थी नजर ही नहीं आते है।

किला रोड स्थित डांगिया गली लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी सुरेशचंद्र दुबे ने बताया वंश परंपरा के मुताबिक उनका परिवार पूजा कर रहा है। इसे करीब 1 हजार साल पुराना माना जाता है। सफेद पत्थर से बनी प्रतिमा आकर्षक है। पूर्व में मंदिर में पर्व-त्योहार पर लोग आते थे। अब बसाहट घनी होने से मंदिर के बारे में कम ही जानकारी रखते हैं। जिन्हें पता है, वे ही यहां आते हैं।

शहर में ही गणपति चौक पर करीब 400 साल पुराना दूसरा लक्ष्मीनारायण मंदिर है। पुजारी प्रमोद गणपतराव खिरे ने बताया मंदिर में ग्वालियर स्टेट के समय दीपावली और अन्य पर्व पर विशेष अनुष्ठान होते थे। अब भी पूजा की यह परंपरा निभाई जाती है पर श्रद्धालु कम आते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी नौवीं पीढ़ी मंदिर की सेवा में लगी है। दीपावली पर रविवार को मंदिर में विशेष पूजन-अभिषेक होगा। सुबह 5 बजे मंदिर के पट खुलेंगे और रात 12 बजे पट बंद होंगे। आमदिन में मंदिर सुबह 7 से रात 9 बजे दर्शन के लिए खुला रहता है।

गणपति चौक लक्ष्मीनारायण मंदिर।
डांगिया गली लक्ष्मीनारायण मंदिर।