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धड़ल्ले से चल रहा है अमानक पॉलिथीन का व्यापार

बिक रही अमानक पॉलीथिन : पॉलीथिन से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए प्लास्टिक वेस्ट (मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग) रूल्स 2011 को लागू हुए तीन साल से अधिक हो गए हैं। लेकिन जिला प्रशासन, नगर निगम शहर में इस नियम को लागू नहीं करा सका है। नियमों के तहत 40 माइक्रॉन से कम मोटाई के पॉलीथिन बैग की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगी हुई है। इसके बाद भी इन पॉलीथिन का उपयोग हो रहा है। शहर में सब्जी और फल की दुकानें पॉलीथिन का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

1 मई से पूरे प्रदेश में पॉलीथिन प्रतिबंधित की गई है। इसके बाद भी पॉलीथिन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हा़े रहा है। आंकड़ों के मुताबिक रोजाना शहर में करीब 120 किलो पॉलीथिन की बिक्री हो रही है। जबकि इस संबंध में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहा है। चर्चा यह भी है कि पॉलीथिन पर प्रतिबंध संबंधित कोई सरकारी कागजी आदेश न आने से इस्तेमाल पर रोक नहीं पा रही है। पॉलीथिन पर प्रतिबंध तो लगा दिया गया है। इसके बाद भी बाजार में इसका खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। जागरूकता के अभाव में पॉलीथिन का उपयोग बंद नहीं हो पा रहा है। वहीं दुकानों में भी धड़ल्ले से पॉलीथिन में सामग्री बेची जा रही है इससे नगर पालिका के स्वच्छता अभियान पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। नगर में फुटकर दुकानदार और सब्जी विक्रेता भी पन्नियों में सामान बेच रहे हैं।

रोज बिक रही पॉलीथिन का करीब आधा हिस्सा हर दिन कचरे में जा रहा है। जिससे पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। बताया जा रहा है कि शहर में अलग-अलग मोटाई और किस्म की पॉलीथिन रोजाना बिक जाती है। पॉलीथिन के थोक विक्रेताओं का कहना है कि अलग-अलग तरह के दुकानदार अपनी जरूरत के अनुसार मोटाई और साइज की पॉलीथिन का प्रयोग करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खपत कम मोटाई वाली पॉलीथिन की होती है।

सड़को व घरों के आसपास फेंकी जाती है पॉलीथिन
पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ ही पॉलीथिन शहर की नालियों को भी अवरुद्ध कर रही है, वहीं पॉलीथिन सहित कचरा व बेकार सामग्री खाने से पशु भी मर रहे है। जानकारी अनुसार शहर में करीब 20 से अधिक पॉलीथिन व्यवसायी हैं। प्रत्येक दुकान से प्रतिदिन औसत 60 किलो पॉलीथिन बैग बिकते हैं। इस हिसाब से शहर व जिले भर में प्रतिदिन सवा टन पॉलीथिन बिकती है। शहर में किराना दुकान, होटल, फल विक्रेता, सब्जी, कपड़ा व्यापारी सहित अन्य व्यापारी 10 से 15 लाख पॉलीथीन बैग में रोजाना सामग्री भरकर उपभोक्ताओं को देते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत पॉलीथिन बैग उसी दिन सड़कों और घरों के आसपास फेंक दी जाती है।
सरकार ने तय की जिम्मेदारी
प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोकने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने नियमों को और सख्त कर दिया है। केन्द्र सरकार ने सरकारी महकमों के साथ प्लास्टिक बैग बनाने वाले कंपनी मालिकों से लेकर स्ट्रीट वेन्डर तक की जिम्मेदारी तय की है। पुराने नियम प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेन्ट 2011 को संशोधित कर नया प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेन्ट नियम 18 मार्च 2016 से लागू किया है। इसके क्रियान्वयन के लिए प्रदेश सरकार को 6 माह का समय भी दिया गया था, लेकिन नियम महज औपचारिकता साबित हुए हैं।
नियमों का नहीं किया जा रहा पालन
नियम में यह भी कहा गया है कि प्लास्टिक बैग, थैलियां, कैरी बैग और पैकेजिंग पर उसके निर्माता का नाम पता दर्ज करना अनिवार्य होगा। नए नियमों के तहत प्लास्टिक से बने कैरी बैग की मोटाई 50 माइक्रॉन से कम नहीं होगी। इससे पहले प्लास्टिक के कैरी बैग की मोटाई न्यूनतम 40 माइक्रॉन निर्धारित थी, लेकिन अब तक धरातल में कहीं भी इन नियमों का पालन होता नजर नहीं आ रहा है।
कागज से बनी थैलियों का करना होगा उपयोग
मोहन माली, अनुसुईया राठौर, विनीत पाटीदार सहित कई लोगों का कहना है कि प्लास्टिक और पॉलिथीन का प्रयोग रोकने के लिए हमें लोगों को जागरूक करना होगा। तभी लोगों को इसके दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। लोगों को पॉलिथीन की पन्नियों की जगह सामान लाने और रखने में कपड़े के थैले का प्रयोग करना होगा।
पशु बन रहे पॉलीथिन का शिकार
पॉलिथीन की पन्नियों में लोग कूड़ा भरकर फेंकते हैं। कूड़े के ढेर में खाद्य पदार्थ खोजते हुए पशु पन्नी निगल जाते हैं। ऐसे में पन्नी उनके पेट में चली जाती है। बाद में ये पशु बीमार होकर दम तोड़ देते हैं।
प्लास्टिक का धुआं भी खतरनाक
पर्यावरण विशेषज्ञ नरेंद्रसिंह के अनुसार जो भी व्यक्ति प्लास्टिक का प्रयोग सर्वाधिक करता है वह अपने जीवन से खेलने का काम करता है। इतना ही नहीं वह पर्यावरण को प्रदूषित भी करता है। प्लास्टिक को जलाने से भी नुकसान होगा। इसका जहरीला धुआं स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। पर्यावरण के लिए मुसीबत बनी पॉलीथिन जिलेभर में धड़ल्ले से उपयोग में लाई जा रही हैं। 50 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन का विक्रय बंद करने के आदेश के कई वर्ष बाद भी प्रशासन इसके उपयोग पर अंकुश लगा पाने में असफल है।
ज्यादा दिन तक नहीं चले पहले के प्रयास
पॉलीथिन पर प्रतिबंध की कवायद सरकार पहले भी जोर- शोर से कर चुकी है। इस दिशा में सख्ती से प्रशासनिक स्तर पर कई बार प्रयास भी किए गए, लेकिन वे ज्यादा दिन तक नहीं चल सके। एक बार फिर मुख्यमंत्री ने पॉलीथिन पर प्रतिबंध एक मई से अमल करने की बात कही है। फिलहाल तो बाजार में तरह-तरह के प्लास्टिक से बने कैरी बैग और रंग- बिरंगी पन्नियां धड़ल्ले से चल रही हैं।
कैंसर का कारक
प्लास्टिक मूल रूप से विषैला या हानिप्रद नहीं होता। लेकिन प्लास्टिक के थैले में लगाया जाने वाला रंग जानलेवा होता है। इन रंगों को रजक धातु व अन्य अकार्बनिक रसायन मिलाकर बनाया जाता है। इसी से पॉलीथिन बैग में चमक आती है। जबकि यही रसायन और धातु कैंसर जैसी बीमारी का कारक बनते हैं।
ऐसे कारगर हो सकता हैं प्रतिबंध
– प्लास्टिक निर्माण करने वाली फैक्ट्रियों पर कड़ी नजर रखी जाएए जिससे वे मानक के विपरीत प्लास्टिक का निर्माण न कर सकें।
– दुकानदारों को प्लास्टिक के विकल्प के रूप में जूट एवं कागज के बने थैले सस्ते दामों में और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराए जाएं।
– जूट एवं कागज से बने थैलों के निर्माण के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जाए।
– प्लास्टिक के प्रयोग को निरूत्साहित करने के लिए स्कूल व कॉलेज स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
– मानक के विपरीत पॉलीथिन का उत्पादन व व्यापार करने वालों के विरूद्ध सख्त कार्रवाई की जाएं।
शहर में पॉलीथिन की प्रतिदिन अनुमानित खपत
  • सब्जी मंडी- 20 किलो
  • फल व सब्जी के ठेले- 25 किलो
  • फुटकर सब्जी विक्रेता- 35 किलो
  • किराना दुकानों पर- 20 किलो
  • कपड़ा दुकानों – 20 किलो

(नोट: आंकड़े संबंधित व्यवसायियों की खरीदी के अनुसार लगभग में है)

इनका कहना…
पॉलीथिन पर 1 मई से पूर्ण रुप से प्रतिबंध लगाने के शासन के आदेश मिले है। सरकार पहले स्वयं इसके उत्पादन पर रोक लगाए। साथ ही नगर पालिका को अधिकार प्रदान करे की वे पोलिथीन के उपयोग करने वालों पर कार्यवाही कर सके। – प्रहलाद बंधवार, अध्यक्ष, नगरपालिका,मंदसौर

 

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