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नवीन शिक्षा सत्र मजाक बनकर रह जायेगा -श्री चन्द्रे

मन्दसौर। शासन द्वारा शिक्षा क्षेत्र में नित नये प्रयोग सराहनीय है किन्तु नये प्रयोगों को जन्म देते समय उसके प्रभावों के बारे में और साथ ही उनकी व्यवस्थाओं के बारे में कोई भी चिंता सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नहीं की जाती है। इस वर्ष सीबीएसई पेटर्न के तर्ज पर राज्य शासन ने 31 मार्च को परीक्षा फल घोषित करने एवं नया सत्र 2 अप्रैल से जारी करने के निर्देश दिये है जबकि- शिक्षा विभाग का अधिकांश अमला 10वीं, 12वीं के मूल्यांकन कार्य में व्यस्त है। नये सत्र के हिसाब से पुस्तकें उपलब्ध नहीं है। स्कूल गणवेश जो वर्ष भर पहनने से पुराने हो जाते है तथा पहनने काबिल नहीं रह जाते है अतः नये सत्र में नई स्कूल युनिफार्म न तो बाजार में है और न ही शासकीय विद्यालयों में। अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दी गई है शासकीय व अशासकीय भवनों की मरम्मत, फर्निचर इत्यादि की मरम्मत एवं अन्य शैक्षणिक व्यवस्थाओं के प्रबंधन का समय शासकीय व अशासकीय क्षेत्र के जिम्मेदारों को नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिति में 2 अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ करना कहीं मजाक बनकर न रह जावे क्योंकि अभिभावकों एवं छात्र-छात्राओं की मानसिकता बनाने के पर्याप्त प्रयास शासन द्वारा नहीं किये गये है। पूर्व वर्षों में भी अप्रैल में शिक्षा सत्र मे नवीन सत्र प्रारंभ करना व्यवहारिक सिद्ध नहीं हुआ है।

उक्त विचार व्यक्त करते हुए शिक्षा विद् श्री रमेशचन्द्र चन्द्रे ने कहा कि किसी भी परंपरागत व्यवस्था में परिवर्तन यदि करना है तो शासन प्रशासन को प्रदेश के कृषक, कर्मचारी, व्यापारी इत्यादि वर्ग के बारे में विचार करना चाहिये क्योंकि अप्रैल व मई माह में इन वर्गों के पास कार्यों की अधिकता होती है।

श्री चन्द्रे ने सुझाव दिया है कि नवीन शिक्षा सत्र यदि एक जून से प्रारंभ किया जावे तो सभी वर्ग के लिये सुविधा जनक रहेगा।

श्री चन्द्रे ने यह भी मांग की है कि शिक्षा को लागू करने वाला अंतिम व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र का शिक्षक होता है। अतः शिक्षा मंत्री को इनके साथ जिलाशः संगोष्ठी कर निर्णय लिये जाने चाहिये।

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