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नव, नवीन, नूतन के स्वागत का पर्व है गुड़ी पड़वा खुशियों का त्यौहार

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पतझड़ और वसंत साथ-साथ आते हैं। प्रकृति की इस व्यवस्था के गहरे संकेत-संदेश हैं। अवसान-आगमन, मिलना-बिछुड़ना, पुराने का खत्म होना-नए का आना… चाहे यह हमें असंगत लगते हों, लेकिन हैं ये एक ही साथ…। एक ही सिक्के के दो पहलू, जीवन सत और सार दोनों ही…।
वसंत ऋतु का पहला हिस्सा पतझड़ का हुआ करता है…पेड़ों, झाड़ियों, बेलों और पौधों के पत्ते सूखते हैं, पीले होते हैं और फिर मुरझाकर झड़ जाते हैं। उन्हीं सूखी, वीरान शाखाओं पर नाजुक कोमल कोपलें आनी शुरू हो जाती हैं, यहीं से वसंत ऋतु अपने उत्सव के शबाब पर पहुंचती है।
फागुन और चैत्र वसंत के उत्सव के महीने हैं। इसी चैत्र के मध्य में जब प्रकृति अपने श्रृंगार की, सृजन की प्रक्रिया में होती है। लाल, पीले, गुलाबी, नारंगी, नीले, सफेद रंग के फूल खिलते हैं। पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं और यूं लगता है कि पूरी की पूरी सृष्टि ही नई हो गई है, ठीक इसी वक्त हमारी भौतिक दुनिया में भी नए का आगमन होता है नए साल का…।
यही समय है नए के सृजन का, वंदन, पूजन और संकल्प का, जब सृष्टि नए का निर्माण करती है, आह्वान करती है, तब ही सांसारिक दुनिया भी नए की तरफ कदम बढ़ाती है। इस दृष्टि से गुड़ी पड़वा के इस समय मनाए जाने के बहुत गहरे अर्थ हैं। पुराने के विदा होने और नए के स्वागत के संदेश देता यह पर्व है प्रकृति का, सूरज का, जीवन, दर्शन और सृजन का। जीवन-चक्र का स्वीकरण, सम्मान और अभिनंदन और उत्सव है गुड़ी पड़वा।
पौराणिक ग्रंथों जैसे ब्रह्मपुराण, अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में यह माना गया है कि गुड़ी पड़वा पर ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन की शुरुआत की थी। यहीं से नवीन का प्रारंभ हुआ माना जाता है और नवीनता का उत्सव ही हम गुड़ीपड़वा के तौर पर मनाते हैं। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पहली तारीख मतलब प्रतिपदा, पड़वा को गुड़ी पड़वा के तौर पर मनाया जाता है।
उत्तर भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है, जो रामनवमी तक चलती है। कहा जाता है कि महाभारत में युधिष्ठिर का राज्यारोहण इसी दिन हुआ था और इसी दिन विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर का प्रवर्तन किया था। किसान इसे रबी के चक्र के अंत के तौर पर भी मनाते हैं।
इस दिन की शुरुआत सूर्य को अर्घ्य देने से की जाती है। गुड़-धनिया का प्रसाद वितरित किया जाता है। घरों की साफ-सफाई कर सुंदर रंगोली बनाई जाती है। महाराष्ट्र में और अब तो मालवा-निमाड़ में भी घर की खिड़कियों पर गुड़ी लगाने को विशेष तौर पर शुभ माना जाता है। गुड़ी ब्रह्म ध्वज के प्रतीक के तौर पर लगाई जाती है। इसे राम की लंका विजय के तौर पर और महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी की विजय की ध्वजा के तौर पर लगाया जाता है।
लंबी डंडी पर गहरे हरे या फिर पीले रंग की नई साड़ी लगाकर उस पर छोटा लोटा या फिर गिलास सजाया जाता है। उस पर काजल से आंख, नाक, मुंह बनाए जाते हैं और उसे फूल-हार से सजाकर उसकी पूजा की जाती है।
घरों में श्रीखंड और पूरनपोळी बनाई जाती है। आरोग्य की दृष्टि से नीम की ताजी पत्तियों का सेवन किया जाता है। इस तरह नए साल की शुरुआत वसंत के उत्सव के साथ ही सुख, समृद्धि और आरोग्य के संकल्प के साथ की जाती है।

 

गुड़ी पड़वा हिंदुओं का एक मंगल सूचक त्यौहार है। यह मराठी हिंदुओं का बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है, क्योंकि इस दिन परंपरागत रूप से हिन्दू नव वर्ष का आरंभ होता है। गुड़ी पड़वा नामक यह त्यौहार महाराष्ट्र और भारत के अन्य भागों में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा बसंत ऋतु के आगमन का त्यौहार है और यह मार्च या अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। ‘पड़वा’ शब्द, संस्कृत के प्रतिपदा शब्द से लिया गया है और यह पंद्रह दिनों के चंद्रोदय के पहले दिन का प्रतीक है। वर्ष 2018 में, गुड़ी पड़वा नामक यह त्यौहार 18 मार्च को मनाया जाएगा।

गुड़ी पड़वा का त्यौहार परंपरागत नए साल के रूप में, उम्मीद और आशा का प्रतीक है। इस त्यौहार को बसंत के मौसम और परिपूर्णता का स्वागत करते हुए मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा के प्रतिच्छेदन बिंदु से ऊपर होती है, जो हिंदू पंचांग के अनुसार बसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। यह त्यौहार मूल रूप से फसलों की उपज का त्यौहार है और देश भर में इसके बहुत से नाम जैसे तेलगू में उगादि, कन्नड़ में युगादि, सिंधी में चेटी चंद और कश्मीरी में नवरेह हैं।

कुछ किंवदंतियों के अनुसार यह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना की गई थी, जिसका उल्लेख ब्रह्म पुराण में भी किया गया है। सृष्टि की रचना के बाद इस दिन सतयुग की शुरुआत हुई। पौराणिक रूप सेयह दिन राम द्वारा रावण की पराजय और प्रसन्नतापूर्वक अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा से जुड़ी एक अन्य ऐतिहासिक घटना हूणों पर शकों की जीत है। महान छत्रपति शिवाजी, जो एक मराठा शासक थे, उन्होंने गुडी प्रदर्शन के साथ इस प्रथा की शुरुआत करके इस त्यौहार को मनाया था। तब से लगभग हर मराठी परिवार में यह गुड़ी पड़वा का त्यौहार मनाया जाता है।

गुड़ी की सजावट:

गुड़ी मूल रूप से एक लकड़ी पर चमकीले रंग के कपड़े के साथ आम के ताजे पत्तों की कलियों से सजाई जाती है। इसे अन्य प्रकार की चीजों जैसे चीनी के क्रिस्टल, नीम के पत्तियों, आम के पत्तों और लाल रंग के फूलों की माला का उपयोग करके कपड़े से लपेटकर भी बनाया जाता है। एक चाँदी या ताँबे के बर्तन को लकड़ी और कपड़े पर उलटा करके रखा जाता है, जिससे गुड़ी का निर्माण होता है। गुड़ी को घर के बाहर दाहिनी ओर ऊँचे स्थान पर रखा जाता है, जहाँ से हर कोई इसे देख सके। यह त्यौहार शुभकामना और समृद्धि सहित बुराई के विरुद्ध विजय का प्रतीक है। प्रवेश द्वार पर रंगोली को सजाने के लिए लाल और पीले रंग के सुंदर फूलों का उपयोग किया जाता है।

गुड़ी पड़वा का उत्सव:

हालांकि, विशेष भोजन के बिना कोई भी त्यौहार पूरा नहीं होता है, इसलिए गुड़ी पड़वा कोई अपवाद नहीं है। इस उत्सव को पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। पूरन पोली, खीर आदि जैसे व्यंजन इस दिन बनाए जाते हैं। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं और मीठे व्यंजनों का आदान-प्रदान करते हैं। एक धार्मिक क्रिया को अपनाते हुए स्नान करते समय शरीर पर तेल लगाकर, ईश्वर से प्रार्थना करते हुए दिन की शुरुआत की जाती है। आमतौर पर मराठी परिवार व्यंजनों को नीम के पेड़ की कड़वी-मीठी पत्तियों, गुड़ और इमली के मिश्रण का उपयोग करके तैयार करते हैं और इसी से अपने दिन की शुरुआत करते हैं, जो रक्त को शुद्ध करने और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए बेहतर माना जाता है।

 

गुड़ी पड़वा : क्या करें इस दिन, जानिए 10 जरूरी बातें

गुड़ी पड़वा या नव संवत्सर के दिन प्रातः नित्य कर्म कर तेल का उबटन लगाकर स्नान आदि से शुद्ध एवं पवित्र होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर देश काल के उच्चारण के साथ सुख समृद्धि प्राप्त होती है।
* पूजन का शुभ संकल्प कर नई बनी हुई चौरस चौकी या बालू की वेदी पर स्वच्छ श्वेतवस्त्र बिछाकर उस पर हल्दी या केसर से रंगे अक्षत से अष्टदल कमल बनाकर उस पर ब्रह्माजी की सुवर्णमूर्ति स्थापित करें।
* गणेशाम्बिका पूजन के पश्चात्‌ ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ मंत्र से ब्रह्माजी का आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करें।
* पूजन के अनंतर विघ्नों के नाश और वर्ष के कल्याण कारक तथा शुभ होने के लिए ब्रह्माजी से विनम्र प्रार्थना की जाती है : –
‘भगवंस्त्वत्प्रसादेन वर्ष क्षेममिहास्तु में। संवत्सरोपसर्गा मे विलयं यान्त्वशेषतः।’
* पूजन के पश्चात विविध प्रकार के उत्तम और सात्विक पदार्थों से ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए।
* इस दिन पंचांग श्रवण किया जाता है।
* नवीन पंचांग से उस वर्ष के राजा, मंत्री, सेनाध्यक्ष आदि का तथा वर्ष का फल श्रवण करना चाहिए।
* सामर्थ्यानुसार पचांग दान करना चाहिए तथा प्याऊ की स्थापना करनी चाहिए।
* इस दिन नया वस्त्र धारण करना चाहिए तथा घर को ध्वज, पताका, बंधनवार आदि से सजाना चाहिए।
* गुड़ी पड़वा दिन नीम के कोमल पत्तों, पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिस्री और अजवाइन डालकर खाना चाहिए। इससे रुधिर विकार नहीं होता और आयोग्य की प्राप्ति होती है।
* इस दिन नवरात्रि के लिए घटस्थापना और तिलक व्रत भी किया जाता है। इस व्रत में यथासंभव नदी, सरोवर अथवा घर पर स्नान करके संवत्सर की मूर्ति बनाकर उसका ‘चैत्राय नमः’, ‘वसंताय नमः’ आदि नाम मंत्रों से पूजन करना चाहिए। इसके बाद पूजन अर्चन करना चाहिए।
विद्वानों तथा कलश स्थापना कर शक्ति आराधना का क्रम प्रारंभ कर नवमी को व्रत का पारायण कर शुभ कामनाओं के फल प्राप्ति हेतु मां जगदंबा से मन से प्रार्थना करनी चाहिए।

हिन्दू नया वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही क्यों मनाएं ?

चैत्र ही एक ऐसा माह है जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। इसी मास में उन्हें वास्तविक मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है। वैशाख मास, जिसे माधव कहा गया है, में मधुरस का परिणाम मात्र मिलता है। इसी कारण प्रथम श्रेय चैत्र को ही मिला और वर्षारंभ के लिए यही उचित समझा गया।

जितने भी धर्म कार्य होते हैं, उनमें सूर्य के अलावा चंद्रमा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन का जो मुख्य आधार अर्थात वनस्पतियां हैं, उन्हें सोम रस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसीलिए इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है।
शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही चंद्र की कला का प्रथम दिवस है। अतः इसे छोड़कर किसी अन्य दिवस को वर्षारंभ मानना उचित नहीं है।
संवत्सर शुक्ल से ही आरंभ माना जाता है, क्योंकि कृष्ण के आरंभ में मलमास आने की संभावना रहती है जबकि शुक्ल में नहीं।
ब्रह्माजी ने जब सृष्टि का निर्माण किया था तब इस तिथि को ‘प्रवरा’ (सर्वोत्तम) माना था। इसलिए भी इसका महत्व ज्यादा है।

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