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नहीं है ‘‘निराला‘‘ और नहीं है ‘‘बालकवि बैरागी‘‘

बसन्त का पर्व और खालीपन का अहसास

(डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर, मों. 9425105959)

अजीब सा खालीपन है, न तो बसन्ती रंग और न मन की उमंग। शीतलहर की चूभन है, वह भी बर्फबारी के प्रभाव से आयातित। निष्ठुर संसार में, अपनी मगन दुनियां में यूं भी कौन किस को याद रखता है ? और, याद करें भी तो क्यों?

खैर, यह लिखने का प्रसंग आवश्यक बन पड़ा और विश्व साहित्य के क्षितिज महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ तथा मालवी साहित्य के अग्रज हिन्दी के राष्ट्रीय कवि बालकवि बैरागी के अपूरणीय रिक्तता महसूस कर आदर और श्रद्धा से स्मरण कर रहे है। संयोगवश अभूतपूर्व साम्यता बन गई है। सन् 1896 में बसन्त पंचमी पर मिदनापुर पश्चिम बंगाल मंें जन्मे निराला और 10 फरवरी 1931 को मध्यप्रदेश के मनासा में जन्मे बालकवि बैरागी। इस बार बसन्त पंचमी 10 फरवरी को पड़ रही है। दोनों महाकवियों का जीवन संघर्ष पूर्ण रहा परन्तु आत्मा की आवाज, जीवटता के साथ शब्दों में उकेरी तथा जन -जन को झंकृत किया।

महाकवि निराला और बालकवि बैरागी की तुलना नहीं की जा रही अद्भूत साम्यता को उद्घृत करने का प्रयत्न मात्र है। महाकवि निराला ने अपने जीवन के विषाद, विष और अंधकार को जिस तरह करुणा और प्रकाश में बदला विलक्षण हैं वे गद्य और पद्य में निष्णात थे। हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख हस्ताक्षर बन गये। वहीं बालकवि बैरागी ने गरीबी और जीवन संघर्ष को कभी छुपाया नहीं, भुलाया नहीं। मूलतः मालवी और हिन्दी की सेवा की। राजनीति में आये पदों पर रहे परन्तु कभी कविता, लेखन और सृजन से मुंह नहीं मोड़ा। मंचों पर राष्ट्रीय स्तर तक और अर्न्तराष्ट्रीय स्तर तक सच्चे हिन्दी आग्रही रहे। गद्य भी लिखे और पद्य भी। मई 2018 में बालकवि बैरागी महाप्रयाण कर गये और मालवा अंचल ही नहीं हिन्दी साहित्य में खालीपन छोड़ गये। मनासा -नीमच -मंदसौर की एक विशिष्ट पहचान, मालवी और हिन्दी के स्थापित हस्ताक्षर बालकवि बैरागी की रिक्तता सदैव रहेगी। ‘‘में गद्य नहीं बेचुंगा‘‘ अर्थात ‘‘आत्मा‘‘ नहीं बेचुंगा जैसी दृढ़ता बिरले लोगो में ही होती है। देशकाल परिस्थितियों में अनेक असहमतियों के बावजुद बालकवि बैरागी का नाम और स्थान साहित्यिक योगदान के लिये, हिन्दी के लिये, मालवी उत्थान के लिये सदैव उत्कर्ष पर रहेगा।

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