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निज हितों के खातिर मिड इंडिया ब्रिज का विरोध करने वालों को हजारों रहवासियों की परेशानियों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए-बंशीलाल टांक

बच्चों से लेकर बुजुर्गों, महिलाओं, विद्यार्थी, कामगार, कर्मचारी, बीमार आदि पटरी पार अभिनन्दन आदि कई कालोनियों के रहवासी मिड इंडिया गेट से लगभग 12 वर्षों से जो घोर त्रास झेल रहे है उससे मुक्ति पाने के लिये काफी संघर्ष के बाद बड़ी मुश्किल से जो सुयोग अवसर प्राप्त हुआ है उसका विरोध करने वालों को सोचना चाहिये कि ऐसा करके वे यश के सहभागी हो रहे है अथवा अपयश का सेहरा सिर पर बांधने जा रहे है।
लगभग 12 वर्ष की मशक्कत के बाद ब्रिज निर्माण के विरोध में जो स्वर उठे है और उसमें जो तथ्य सामने आये है उन व्यवसायियों द्वारा ब्रिज निर्माण से अपने व्यवसाय पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ने का मुद्दा उठाया है। इस प्रकार का मुद्दा सीतामऊ फाटक ओवरब्रिज के व्यवसायियों द्वारा भी उठाया गया था परन्तु रेल्वे द्वारा चाहे ब्रिज निर्माण हो अथवा रेल्वे लाईन निकालना हो। तकनिकी दृष्टि से भविष्य को ध्यान में रखकर रेल्वे बोर्ड अपना कार्य करता है। जिसमें हस्तक्षेप की तो कहीं कोई गुंजाईश नहीं रहती।
मिड इंडिया ब्रिज निर्माण में व्यवसायियों से पहले जो विरोध हुआ उसमें राजनैतिक गलियारों तथा आमजन को सबसे आश्चर्य तो इस बात को लेकर हो रहा है कि संसद से लेकर विधानसभा तथा नगर परिषद्ों तक किसी मुद्दे पर जब कभी विरोध हुआ है तो वह विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष के विरोध में किया जाता रहा है परन्तु मंदसौर नगर परिषद् की दिनांक 11 फरवरी 2018 की साधारण सभा में जब मिड इंडिया ब्रिज का प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ तो उसका विपक्ष कांग्रेस द्वारा जहां स्पष्ट बहुमत से समर्थन किया गया वहीं सर्वप्रथम विरोध करने वालों में नगरपालिका में सत्ता पक्ष भाजपा के ही दो पार्षद पूरजोर इसके विरोध में खड़े हो गये। तत्पश्चात् एक समाज विशेष तथा व्यवसायियों द्वारा जो विरोध जताकर कलेक्टर एवं सीएमओ को वैकल्पिक मार्ग का सुझाव दिया गया। यह एक प्रकार से प्रारंभिक प्रायोजित विरोध को ही आगे बढ़ाने का एक नियोजित सिलसिला माना जा रहा है।
चाहे राजनीतिक दृष्टि हो अथवा पारिवारिक दृष्टि से जहां जिस कार्य से हजारों आमजनों को परेशानी और मुसीबतों से मुक्ति मिलती हो तब निजी परेशानियों अथवा निजी स्वार्थ की परवाह किये बिना पहले परमार्थ को महत्व देना श्रेयष्कर होगा। केवल अपनों का भला करने की सोच तो पशु-पक्षी भी रखते है परन्तु मजा तो तब है जब हम अपने निजी हितों को त्यागकर दूसरों की भलाई में आगे आये।
रामचरित्र मानस में कहा भी है ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा संग नहीं अघमाई।’ सनातन धर्म के अठारह पुराणों में भी इसी बात को उदृधत किया है- ‘अष्टादश पुराणेशु व्यासस्य वचनम् द्वय, परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीड़नाय।‘ अर्थात दूसरों को मुसीबतों, कष्टों से मुक्त करने से बड़कर कोई पूण्य नहीं है। और इसी प्रकार केवल दूसरों को सताना अथवा कष्ट देना ही पाप नहीं कहलाता, दूसरों को मुसीबत देखने के बाद भी उन्हें दुःख से और मुसीबत से छुड़ाने का प्रयास नहीं करके मुहं फेर लेना भी एक प्रकार से पाप ही माना गया है। ब्रिज निर्माण होने पर हजारों लोगों की दुआयें उसमें सहभागी बनने वालों को भी प्रतिदिन जो मिलेगी उससे बढ़कर परोपकार, पुण्य और क्या होगा ?

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