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नेताओं के बोल और व्यवहार बनाम मीडिया सम्पादकों की विवशता

मध्यप्रदेश के मीडिया में भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह द्वारा मीडिया के बारे में की गई टिप्पणी चर्चित है | इलेक्टानिक मीडिया पर उपलब्ध घटना के फुटेज, घटनाक्रम और उस पर सम्पूर्ण मीडिया में जारी बहस इस नये पदाधिकारी के संस्कार के साथ भारतीय जनता पार्टी के उस विवेक पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े करता है, जिसके तहत यह व्यक्ति भाजपा संसदीय दल का सचेतक और अब मध्यप्रदेश भाजपा का अध्यक्ष  बनाया गया है| जबलपुर संस्कारधानी कही जाती है, वहां के भाजपा नेता संस्कार की मिसाल रहे हैं| इतना क्षरण जबलपुर के संस्कारों में कैसे हो गया कि सरे आम गलती के बाद माफ़ी के बजाय मीडिया के कुछ लोगों को प्रदेश कार्यालय में प्रतिबन्ध पर नये अधिकारी विचार करने लगे| इस मामले का एक दूसरा पहलु भी है, मीडिया में स्व नियन्त्रण का अभाव|

राकेश सिंह ने मीडिया को बहुत हल्के में लिया और टिप्पणी कर दी “ मीडिया तो कुछ मिलने पर समाचार देता है”| यह बात गंभीर है और वर्तमान पद, भाजपा- मीडिया की प्रतिष्ठा के विपरीत वह भी  आसन्न चुनाव के परिप्रेक्ष्य में | भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री कैलाश जोशी ने अपनी टिप्पणी में कह ही दिया है कि “अब अच्छे गार्ड नहीं मिलते हैं |” जोशी जी की टिप्पणी गंभीर थी और मिसाल सामने आ गई | भाजपा को क्या करना है ? उसे मीडिया से कैसे रिश्ते रखने है वह जाने | जहाँ तक मीडिया का सवाल है उसमे जो क्षरण आया है उसकी जद में “संपादक संस्था” का मजबूत न होना है | अब मीडिया हॉउस में संपादक संस्था समाप्त  दिखाई देती है और संपादकीय नियन्त्रण जैसे संस्कार विल्पुत वस्तु| सारे नियन्त्रण प्रबन्धन और
मालिकों के हाथ में होते जा रहे हैं | ऐसे में इस तरह की घटिया सोच और टिप्पणी होना स्वभाविक है | प्रदेश ने  इस संस्था की मजबूती को भी देखा है, जिसने सरकार को घुटनों पर ला दिया था | इस  रोग की शुरुआत  मि० क्लीन कहे जाने वाले एक बड़े नेता के जमाने से हुई है, जिन्होंने “मीडिया बाईंग”  जैसी अवधारणा को जन्म दिया था | दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया जो कभी भाले की शक्ल का होता था अब छाते की शक्ल का होता जा रहा है | कोई मीडिया हॉउस की आड़ में अपने उद्ध्योग लगाता है, तो कोई उद्ध्योग ढाल के रूप मीडिया का उपयोग करता है | संपादक या तो होते ही नहीं है या उनके कर्तव्यों में संपादकीय दायित्वों को छोड़ इतर कार्य होते हैं | कमोबेश यही स्थिति सत्तारूढ़ भाजपा सांसदों – विधायकों – संगठन प्रमुखों के बयानों की जब – तब, यहां – वहां सामने आ रही है। पार्टी विथ डिफरेंस का दावा हवा होगया , पार्टी अब इन डिफरेंट में तब्दील होगई है । विचार आते हैं स्थापना
के बाद से होता रहा बदलाव कहां जाकर रुकेगा ? जिस व्यवस्था और समाज में, प्रजातंत्र में मीडिया को चौथा पाया मान विश्वास जताया है , उसे ही नकार कर , अपनी ज़ेब में रखा मान चल रहे राजनीतिक दल ” दंभ ” में जी रहे हैं, यह आत्मघाती ही सिद्ध होगा । ऐसे में राकेश सिंह जैसे लोग टिप्पणी नही तो क्या करेंगे ? संपादक संस्था की हत्या में सबकी भागीदारी है | अब हत्या का शाप सामने आ रहा है | इसे भोगना होगा |
गत दिनों तमिलनाडु के गवर्नर भाजपा के पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने महिला पत्रकार से माफ़ी मांगी , अब फिर भाजपा के वरिष्ठ नेता एस वी शेखर ने सोशल मीडिया पर महिला पत्रकारों पर अश्लील और विवादों भरी पोस्ट की है , जिसका देश भर में विरोध हो रहा है । क्यों करते हैं ऐसा राजनीतिक लोग ? प्रचार पाने के लिये या मीडिया को नीचा दिखाने के लिये ? कुछ भी हो वे हर वर्ग की समस्या बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं । कारपोरेट मीडिया संस्थानों में लुप्त होती सम्पादकों की अहमियत चिंतनीय है ।

घनश्याम जी बटवाल

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