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नैतिकता को छोड़ देश जिस प्रकार तेजी से पापाचार की ओर बढ़ा है, उसे रसातल में जाने से बचाना है तो समाज को आगे आना होगा

जानवरों से बदतर हो गया है भगवान की श्रेष्ठ कृती होने का दम्भ भरने वाला आज का इन्सान और वह भी संस्कृति प्रधान भारत में-बंशीलाल टांक

मन्दसौर। सभी जानते है कि संसार में जीवधारियों में सबसे श्रेष्ठ रचना भगवान ने किसी की बनाई है तो वह है मनुष्य । अन्य जितने भी थलचर-नभचर-जलचर पशु पक्षी जीव है-सब मनुष्य से निम्न कोटी की श्रेणी में आते है। जब से श्रृष्टी बनी तब से लेकर पशु पक्षियों ने सोने-जागने से लेकर खाने-पीने विहार आदि प्रत्येक दिनचर्या और स्वभाव में परिवर्तित नहीं हुआ है। विशेषकर गृहस्थ धर्म सन्तानोत्पत्ति हाथी-बैल-कुत्ता-शेर आदि सभी पशु-पक्षी सबका निश्चित रितुकाल  आने पर ही समागम करते है। उसके बाद साथ रहते हुए उनमें कभी काम की उत्पत्ति नहीं होती परन्तु जिस मानव के लिये ‘बड़े भाग मानुष तनु पाया। सुर दुर्लभ सब ग्रंथानि गावा’’ कहा गया है- जिस मानव देह को पाने को देवता भी तरसते है उसे क्या हो गया जो जानवरों से भी बद से बदतर  कार्यों में प्रवृत्त हो गया है, न उम्र का, न समय का, न स्थान का ख्याल, समस्त मर्यादाओं को तिलांजलि देकर, काम वासना का भूखा भेड़िया बनकर ढाई-तीन साल की एकदम मासूम अबोध हंसती-खेलती बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाकर उनकी हत्या करने जैसे महा जघन्य पाप करने में भी बिल्कुल ही नहीं हिचकिचा रहा है।
16 दिसम्बर 2012 जघन्य दिल्ली निर्भया काण्ड के 1600 दिन बाद जिस प्रकार देश में गुनाहगारों के प्रति गुस्सा फूटा था, लगता था दरिंदों मे ंभय व्याप्त होकर उनके नापाक इरादों पर लगाम लग जायेगी परन्तु ऐसा नहीं हुआ और बलात्कार-गेंगरेप का ग्राफ तेजी से बढ़ता हुआ 2018 वर्तमान तक चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। कारण स्पष्ट है-धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र के नाम पर एक तरफ नैतिक शिक्षा-संस्कारों का अभाव और दूसरी तरफ त्वरित सख्त कानून बनाने से परहेज का कारण रहा है। ऐसी अवस्था में फिर दरिंदों से लाड़लियों की लाज बचने का प्रश्न नहीं कहा रहा और यह कोई बकवास नहीं हकीकत है। उदाहरण सामने है। निर्भया काण्ड के बाद इन 6 साल 6 दिनों (22 अप्रैल 18 तक) में महिलाओं, ढाई से तीन साल की बच्चियों को तो हवस का शिकार बनाया है, अधेड़, उम्र दराज, दिव्यांग, गर्भवती महिलाओं तक को भी दरिंदों-पापाचारियों ने नहीं बक्शा, प्रेस मीडिया की कलम और इलेक्ट्रानिक मीडिया के एंकरों ने गला फाड़कर, चिल्ला-चिल्लाकर 2-4 दिन छोड़कर नहीं प्रतिदिन महिलाओं के साथ हो रहे गेंगरेप, बलात्कार-हत्याएं की घटनाओं को उजाकर कर सरकारों के रूंधे कानों से रूई निकालकर कुंभकर्णी नींद जगाने की भरपूर दरकार करता रहा परन्तु परिणाम बताने की आवश्यकता नहीं, घटनाएं स्वयं साक्ष्य है। महामहिम राष्ट्रपति ने स्वयं इन घटनाओं को राष्ट्र को शर्मनार करने वाली बताया है। इससे बढ़कर चुल्लूभर पानी में डूब मरने, शर्मिंदगी और क्या होगी कि भारत के मीडिया द्वारा बार-बार आगाज करने के बाद भी केन्द्र सरकार द्वारा फांसी जैसी सख्त सजा का प्रावधान नहीं करने और हाल के दिनों में कठुआ में मासूम बच्ची के साथ गेंगरेप के बाद हत्या करने, उन्नाव (उ.प्र.) की घटना में सम्पूर्ण देश को एक बार फिर झकझोर दिया।
बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं अभियान का श्री गणेश करने वाले माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी की 20 अप्रैल से पहले की चुप्पी पर विदेशी मीडिया अमेरिका अखबार न्यूयार्क टाईम्स भी सरकार की आलोचना करने से पीछे नहीं रहा। निर्भया काण्ड के बाद एक बार पुनः देश जिस प्रकार आक्रोशित उद्वेलित हुआ और फांसी को सख्त सजा के लिये केन्द्र पर दबाव बनाया तब  कही जाकर मोदीजी द्वारा 21 अप्रैल 18 को केबिनेट बुलाकर जिस प्रकार पास्कों कानून में संशोधन कर फांसी की सजा का प्रस्ताव पारित किया, काश यही पहले किया होता तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं का नारा थोथा चना बाजे घना तक सीमित न रहकर बेटीयों को दरिन्दों से बचाने में सार्थक सिद्ध हो गया होता।
देर से ही सही केन्द्र के केबीनेट ने बलात्कारियों के लिये फांसी की सजा मुकरर्र की है परन्तु यह केवल 12 साल की बच्चियों के साथ होने वाली ज्यादती के गुनहगारों के लिये ही की गई है और 12 साल से ज्यादा उम्र की बच्चियों के साथ दरिंदों को फांसी की सजा न देते हुए 20 साल  अथवा उम्रकैद दण्ड प्रावधान रखा गया है। 18 साल से पूर्व 17 वर्ष और 364 दिन तक की बालिका को जब नाबालिक माना गया है तो फिर 12 साल की बच्ची के बाद के आरोपी को भी फांसी क्यों नहीं ? इसी प्रकार रेपिस्ट चाहे नाबालिग ही क्यों न हो उसे भी फांसी अथवा उम्र कैद की सजा मिलना चाहिये। बलात्कार करने वाला कभी नाबालिग नहीं होता क्योंकि अबोध नासमझ बालक के मन में काम वासना हो ही नहीं सकती और जिसमंे काम वासना जागृत हो कर बलात्कार करने पर उतारू हो गया हो वह फिर नाबालिक कहां रहा ? निर्भयाकाण्ड के एक 17 वर्षीय मुख्य आरोपी  जिसे नाबालिग होने से सजा होने पर जेल के स्थान पर सुधार गृह में 3 वर्ष रहकर दिसम्बर में छूट गया है।
केन्द्र सरकार ने फांसी की सजा का प्रावधान कर तो दिया परन्तु यह दरिंदों के मन में कितना भय उत्पन्न कर सकेगा यह तो समय बतायेगा क्योंकि फांसी की सजा का कानून बनाने का निर्णय  केन्द्र ने तो अब लिया है जबकि म.प्र., हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में इसका प्रावधान पहले से होते हुए घटनाएं रूकी नहीं है। दूसरी तरफ न्यायालयों द्वारा सजा सुनाने के बाद उसे क्रियान्वित करने में लम्बा समय लग जाता है। निर्भया काण्ड में 6 में से एक आरोपी ने जेल के फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, एक नाबालिग होने के नाते 3 साल सुधार गृह में रहकर मुक्त हो गया। शेष चार को निचली अदालत के फांसी के फैसले को हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखने, ऐसे दरिंदों को धरती पर रहने का हक नहीं टिप्पणी करने के बावजूद 6 साल बितने के बाद भी राष्ट्रपति के यहां दया याचिका अपील के निराकरण के अभाव में चारों दरिंदों को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाये है।
फास्ट ट्रेक न्यायालय के निर्णय के बाद भी तत्काल आरोपी को फांसी नहीं होना भी दरिंदगी नहीं रूकने में कारण माना जा सकता है। निर्भया काण्ड के बाद 2012 से लेकर 2018 तक बलात्कार की हजारों घटनाएं हो चुकी है। परन्तु फांसी सजा याप्ता किसी दरिंदे की फांसी पर लटकाने के समाचार अभी तक तो प्रकाश में नहीं आये है। बेटीयों को बचाना है, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओं आयोजन को सिद्ध करके दिखा कर दरिंदों के मन में सपने में भी दुष्कर्म करने का विचार नहीं आने देना है तो प्रथम बार  निचली अदालत में फैसला होने के बाद फिर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और अन्त में राष्ट्रपति की दया याचिका तक लम्बी लाईन (समय) पार करने तक आरोपी को मौका न दिया जाकर तत्काल फांसी पर लटका देना चाहिये तभी दरिंदों के मन में भय पैदा होकर कुकर्मों का यह सिलसिला रूक सकेगा।

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