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पताशे का कारोबार भी पड़ा ठंडा – नहीं मिल रहा लाभ

(डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर )

मंदसौर। यह जाहिर है कि हर दुःख और सुख के मौके पर शकर (खाण्ड) से बने ‘‘पताशे‘‘ परिजनों द्वारा बांटे जाते हैं। मालवा -मेवाड़ क्या, निमाड़ और महाकौशल क्या, हाड़ोती और ढुंढाड़ क्या, गुजराती और आदिवासी क्या, मराठी और दिल्ली वासी क्या, मोटे तौर पर हिन्दू हो या मुसलमान, सिन्धी हो या राजपुत, ब्राहमण हो या जैन हर परिवार में रीती रस्म अनुसार जीवन के 16 संस्कारों के अवसर पर शगुन के तौर पर ‘‘पताशे ‘‘ बांटने का रिवाज दशकों से प्रचलित है। परन्तु आधुनिकता की मार इस रीती रस्म और रिवाज पर पड़ी है परिणाम स्वरुप   ‘‘पताशे‘‘ बनाने वाले परिवारों, समाज और कारीगरों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ‘‘पताशे‘‘ को बताशे भी कहा जाता है। परिवार में जन्म हो तो ‘‘पताशे ‘‘ मुण्डन हो तो ‘‘पताशे‘‘ यज्ञोपवित हो तो ‘‘पताशे‘‘ विवाह हो तो ‘‘पताशे‘‘, मांगलिक कार्य भी हो तो‘‘पताशे‘‘, यही नहीं मृत्यु संस्कार हो तब भी ‘‘पताशे‘‘ बांटने, भेंट करने वार कर फंेंके जाने का चलन है पर यह कम होता जा रहा है।

कैसे बनते हैं ‘‘पताशे‘‘ – शकर की चाशनी बना कर उबलते हुए घोल में हाइड्रो केमिकल का अंश मिलाया जाता है, फिर हेन्डल युक्त गहरी छोटी कढ़ाही में लकड़ी की डन्डी के माध्यम से बिछाये गये मोटे कपड़े पर बून्द -बून्द शकर चाशनी का तैयार घोल टपकाया जाता है जो क्रमानुसार कतार में होता है, कुछ ही अवधि में यह बिन्दू ‘‘पताशे‘‘ के आकार में ढल कर सूख कर कड़क रुप प्राप्त कर लेता हैं और एकत्र कर लिया जाता है। कन्डे और कोयले से तैयार भट्टी पर शकर घोल चढ़ाकर उबलते हुए चाशनी बनाई जाती है। मौसम और मांग अनुसार तैली समाज मालवा में यह कार्य करता है। ‘‘पताशे‘‘ भी मांग अनुसार छोटे से बड़े आकार में बनाये जाते है।

ग्रामीण क्षेत्रौं में तो रिवाज प्रचलित है कि आगन्तुक मेहमानों का स्वागत ‘‘पताशा‘‘ खिलाकर मुंह मीठाकर किया जाता है। ‘‘पताशे‘‘ घर परिवार में होना शुभ शगुन माना जाता है, जब कभी घर में शकर या खाण्डसारी -या शकर बुरा उपलब्ध न हो तो ‘‘पताशे‘‘ को गलाकर जलपान, शर्बत, चाय -दुध की व्यवस्था भी की जाती रही है। जैन समाज मंें तो पयुर्षण पर्व पर, नवकार मंत्र जाप अनुष्ठान पर, सन्तमण्डल स्वागत सम्मान पर बड़े आकार के विशेष रुप से निर्मित पताशे बांटने का, प्रभावना वितरीत करने का चलन रहा जो अब बहुत कम होता जा रहा है। आजकल ‘‘पताशे‘‘ के स्थान पर अन्य सामग्री दी जाने लगी है।
इस प्रतिविधि ने पताशा निर्माण और विक्रय भंडारण आदि की पड़ताल की। 60 वर्षीय धन्नी बाई शंकर लाल सिसौदिया ने बताया कि में तो बचपन से यही काम रही रही हूं अन्य काम आता नहीं तो क्या करुं पर अब बिक्री बहुत कम हो गई है। 55 वर्षीय बद्रीलाल राठौर ने कहा कि अब लोग समृद्ध होने लगे है। तो रिवाजों और परम्पराओं से दूर होते जा रहे है इससे पताशों का प्रचलन भी कम हो गया जिससे हमारी कठिनाई बढ़ी है।

धानमण्डी क्षेत्र के रामेश्वर दशोरा और तौरमल भाटी ने बताया कि पताशे निर्माण और बिक्री में मार्जिन लाभ भी कम रह गया है। शकर बाजार में 34 से 36 रु.किलो है जबकि पताशे 38 से 42 रु. प्रतिकिलो में विक्रय हो रहे हैं निर्माण लागत भी पुरी नहीं निकल पाती,शासन स्तर पर छोटे पैमाने के हमारे परम्परागत कामकाज पर कोई मदद नहीं है।

जनकुपुरा के बद्रीलाल ने बताया कि शकर चाशनी पताशे के लिये कन्डे और कोयले की भट्टी से बनाई जाती है। कमर्शियल गैस सिलेन्डर 1350 से 1400 रुपये होने से महंगा पड़ता है। आपने बताया कि कोई 15 -20 वर्ष पूर्व मंदसौर नगर में ही 35 से 40 भट्टीयों पर पताशे बनाये जाते थे जो आज घटकर मात्र 5 -7 भट्टीयों तक सिमट गया है। वैवाहिक लग्नसरा के दौरान प्रतिदिन नगर में ही 100 क्वींटल प्रतिदिन से अधिक खपत होती थी जो आज घट कर मात्र 8 से 12 क्वींटल प्रतिदिन रह गई है। इस संकट और समस्या के चलते हमारे परिवारों के युवा यह काम नहीं कर रहे, कुछ अन्य क्षेत्रों में चले गये। पताशे निर्माण और मांग के अन्तर को दूर करने में कोई सहयोग नहीं होने, आधुनिक मशीन आदि उपयोग में नहीं लाने से आय का संकट खड़ा हो गया है। आपने कम होते पताशा निर्माण के लिए सरकार और समाज से सहयोग का आव्हान किया है।

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