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परम्परागत मीडिया बनाम सोशल मीडिया -बढ़ रही चुनौतियां

(डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर) मीडिया आज सषक्त बन गया है, हर प्र्रभावी तबका इसकी जद में है तो मीडिया भी कतिपय तत्वों और वर्ग का ‘‘अस्त्र‘‘ भी बन रहा है। यह सम्पूर्ण  समाज और प्रचलित व्यवस्थाओं में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही भूमिकाओं में सामने है। खबरो, सूचनाओं, घटनाओं, जानकारियों, तकनिकी ज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों की अद्यतन ज्ञान से परिपूर्ण मीडिया के बिना आज हम सभी का सुर्योदय जैसे रुक जाता है। बहुसंख्य वर्ग सूचनाएं और खबरें ही पढ़ता है, खबरें ही गढ़ता है और खबरें ही खाता हैं। पल -प्रतिपल रचना और सूचना संसार की संचार क्रांति हर किसी केा प्रभावित कर रही है। एसे में परम्परागत मीडिया प्रिंट मीडिया से अधिक और गहरे तक पहुंच पकड़ इलेक्ट्रानिक मीडिया के हाथ आई जो अब और आगे बढ़कर व्यक्ति की हथेली एन्ड्राइड मोबाईल माध्यम से सीधे उंगलियो की टीप पर पहुंच गई है। यह बड़ा बदलाव है और यह तेज गति से विस्तारित भी हो रहा है।

 

अगर कहा जाय तो सोशल मीडिया, वेब मीडिया, न्यूज पोर्टल, ट्वीटर, फेसबुक, वाट्सएप, इंटरनेट, मेसेंजर, इन्स्टाग्राम, ई -पेपर, यू -ट्यूब, स्काईप, लिंक्डइन विडियो क्रान् फेसिंग आदि की विस्तारित श्रंृखला अत्यंत विस्तारित और अघतन हैं। गूगल गुरु ने इसकी पहुंच और बढ़ाई है। सोशलश् और वेबमीडिया ने एक नई पत्रकारी संस्कृति को जन्म दिया है। इससे हिन्दी, अंग्रेजी के साथ अन्य भारतीय भाशाओं को भी गति मिली हैं। भाशायी पहुंच सुगम होेने से हिन्दी की स्वीकार्यता और जानने -समझने वालों की संख्या में आधिकारिक रुप से वृद्धि हुई है। वह भी तब जब देश में स्पेक्ट्रम 4 जी सेवाएं कमजोर हैं। एक सर्वे के मुताबिक दूरसंचार सेवाओं में 4 जी सुविधा में डाउन लोड स्पीड मात्र 9.12 एमबीपीएस दर्ज की गई,जबकि पड़ोसी देषों पाकिस्तान में यह 14.03 और श्रीलंका में तो यह रफतार 16.98 की रही है। अब तो विश्वभर में 5 जी सेवाएं प्रस्तुत होने जा रही है। अर्थात 4 जी से 5 जी होगा तो गति भी और दायरा भी बढ़ेगा एसे में प्रिंट मीडिया की चुनौैतियां अधिक बढ़ जाना है।

अपने दो सौ वर्शों से अधिक उम्र दराज प्रिंट मीडिया -समाचार पत्रों -पत्रिकाओं, के सामने कोई पच्चीस  वर्शों पूर्व उभर कर आया इलेेक्ट्रानिक मीडिया, टीवी चैनल दृष्य और श्रव्य माध्यम से स्थापित हो गया और घर -घर में जगह बनाई। जहां प्रिंट मीडिया के विभिन्न समाचार पत्रों ने सेटेलाईट संस्करण भी चालु किये, वेब प्रिंटींग  मशीने स्थापित की, नवाचार किये डिजाइनों का उपयोग किया नित नये, कन्टेन्ट देने का यत्न किया किन्तु उसकी प्रसार वृद्धि अपेक्षित नही हो रही पेडल मशीनें बदलकर कलर प्रिन्टींग मशीनें स्थापित की, देशी के साथ विदेशी ग्लेज्ड पेपर छपाई कर रंगीनी परोसी पर यह भी वर्तमान में नहीं भा रही, एबीसी के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो समस्त भाशायी समाचार पत्रों की ही प्रसार संख्या और आई आर एस के मुताबिक पाठक संख्या में आंशिक वृद्धि दर्ज की जा सकी है। अब समाचार पत्र उद्योग पर जी एस टी के दायरे में आने से प्रिन्ट मीडिया का राजस्व बुरी तरह प्रभावित हुआ है, प्रचलित नीति और नियमों से और मार पड़ना तय है यह प्रिन्ट मीडिया के अस्तित्व के लिये बड़ी चुनौति हो गई है। अनेक प्रकाशन बंद हो गये है, कई नामी पब्लिकेशन्स ने संस्करण घंटा दिये है, अनगिनत पत्रिकाओं, की छपाई रोक दी गई है। कुल मिलाकर चित्र उत्साह नहीं बढ़ाता। इन सबके बाद भी जो प्रकाशन संस्थान संचालित है उनमें संपादकों -उपसंपादकों -विषेश संवाददाताओं -पत्रकारों की स्थिति कमजोर करने के प्रयास कारपोरेट धरानों द्वारा किये जा रहे है। प्रधान संपादक अब प्रबंध संपादकों में तब्दील किये जा रहे है जो समाचारों -संपादकीय के ईतर अन्य कार्य के लिये उपयोग किये जा रहे है। काम -दायित्व और समय बंधन पत्रकारो पर अवांछित दबाव और तनाव बढ़ा रहा है।

 

इन सबके बीच इलेक्ट्रानिक मीडिया जो न्यूमीडिया के रुप में प्रचारित हो रहा है वह प्रिंट मीडिया की तुलना में त्वरित और दृश्य के साथ श्रव्य का बेहतर विकल्प बन गया है,भले ही जल्दबाजी में कन्टेन्ट विष्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो तब भी तत्काल की जिज्ञासा पूर्ति तो कर ही रहा है, जिस अखबार में छपी खबर का सुबह तक इन्तजार करना होता है, वह टीवी न्युज चैनल्स पर सामने देखी जा सकती है, वहीं टीवी चैनल्स से धारावाहिक सिरीयल, खेल, मूवी, टेलेन्टटन्ट, धार्मिक प्रवचन, संगीत -सीनेमा -शेयर बाजार -उद्योग और कृशि -युवा व महिलाओ और सबके लिये कुछ न कुछ प्रस्तुत हो रहा है, रंगीन वह भी चल चित्र की तरह।

परन्तु अब एन्ड्राइड मोबाईल के माध्यम से दुनिया आपकी मुट्ठी में आ गई है, संचार क्राति के रुप में इसका सकारात्मक उपयोग हो तो यह प्रिन्ट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया की प्रामाणिकता और विष्वास को स्थापित कर सकता है, क्योंकि घटनाएं -कार्यक्रम -योजना का अब मोबाईल धारी स्वयं साक्षी है, और स्वयं इसे प्रचारित -प्रसारित कर सकता हैं, वहीं नकारात्मक भूमिका में उपयोग करें तो जहां चाहे बवाल खड़ा कर सकता है, अफवाहों के आधार पर जानलेवा सिद्ध हो सकता है। जब प्रदेश सरकार ने वकीलों के लिए ‘‘प्रोटेक्शन एक्ट‘‘ को मंजूरी दी है जबकि पत्रकारों की सुरक्षा के लिये कानून की मांग वर्शों से की जा रही हैं। ‘‘प्रेेस प्रोटेक्शन एक्ट‘‘भी लागू किया जाना चाहिये।

आजकल के त्वरित सूचनाओं के आदान -प्रदान दौर में सोशलश् मीडिया बड़ी भूमिका में आ गया है। क्रिया -प्रतिक्रिया भी उतनी ही तिव्रता से होने लगी है। हाल के दिनों में हुई हिंसक और अहिंसक घटनाएं इस की साक्षी है। जहां महाराश्ट्र में किसानों का लामबन्द षांति पूूर्वक आन्दोलन वहीं अफवाह आधार पर लोगों ने सत्य जाने बिना लोगों को  मार डाला दोनों ही पक्ष है। वर्तमान में तो प्रमुख राजनीतिक दलों ने सोशलश् मीडिया की अलग विंग बनाकर दक्ष प्रोफेशनल्स को दायित्व सौंप दिये है, अपने दफतरों में वाररुम बना दिये हैं।  इनके माध्यम से प्रतिक्षण नई सूचनाएं आरोप -प्रत्यारोप का नया संसार रचा जा रहा है। हालत यह हो रही है कि चाह कर भी इन सूचनाओं -समाचारों -आरोपों से कोई बच नहीं पा रहा है। इस पर मोबाईल कनेक्षन प्रदाता द्वारा प्रतिदिन के लिये डेढ़ जीबी से तीन  जीबी तक डाटा मुहैया कराया जा रहा है।

इस नई विकराल परिस्थिति से जैसे सरकार, देश और समाज पुरी तरह तैयार नहीं लगता है, सूचनाएं -समाचार -साइबर क्राइम -अफवाहें तो आ – जा रही है पर इससे जुड़े नये अपराधों पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। डिजीटल युग में साइबर क्राइम तेजी से बढ़ रहे है जिनका समाधान नहीं हो रहा है। प्रशासन -पुलिस और सरकारी तंत्र उतने दक्ष और संसाधनों से युक्त नहीं है।

प्रिन्ट मीडिया -इलेक्ट्रानिक मीडिया की तुलना में सोशलश् मीडिया विस्फोटक रुप  से विस्तारित हुआ और हर स्तर पर सामाजिक -प्रशासनिक आर्थिक -सार्वजनिक -राजनीतिक क्षेत्र में दखलन्दाजी कर रहा है। जहां सदुपयोग है वहां तो ठीक है पर दुरुपयोग तेजी से बढ़ा है। मीडिया के माध्यम से कहीं ‘‘महिमामंडन‘‘ है तो कहीं ‘‘महिमाभंजन‘‘। यह रोज का ‘‘शगल‘‘ हो गया है। प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया इस मीडिया माध्यम को तरजीह दे रहे है। सीधे सोशल मीडिया से सूचनाएं -समाचार घटनाओं की जानकारी ले रहे है।

स्थापित और विष् वसनीय -प्रामाणिक प्रिन्ट मीडिया को दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिये भी चुनौति तो बढ़ी है पर दृष्य और श्रव्य माध्यम होने से वह सोशल मीडिया का उपयोग अपने हित में कर रहा है। इतना ही नही सोशलश् मीडिया पर विज्ञापन राजस्व में भारी वृद्धि दर्ज की गई जबकि उसकी तुलना में प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में उतनी नहीं। यह भी बड़ी चुनौति सामने आई है। सोशलश् मीडिया और डिजीटल होती व्यवस्थाएं निजता का उल्लंघन कर रही है, गूगल,फेसबुक, वाट्सअप से आपके -हमारे डाटा शेयर किये जा कर अर्थ उर्पाजित किया जा रहा है। यह चुनौति भी छोटी नही है, यही स्थिति रही और कारगर उपाय तथा रोकथाम नहीं की गई तो देश की संप्रभुता तक खतरा खड़ा हो सकता है।सोशलश् मीडिया संक्रामक वाइरस में तब्दील होता जा रहा है इस चुनौति से निपटना ही होगा।

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