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पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक हैं ‘‘शिव‘‘ – और नकार रहे हैं हम

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यूं तो पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता हमारी मूल संस्कृति है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसका पालन हम करते रहे हैं पर कुछ वर्षो से तो हम -आप क्या समूचा तंत्र और व्यवस्था ही प्रकारान्तर मे इसे नकार रही हैं परिणाम दुखद और त्रासद भी हम – आप और समाज भोग रहा है। हालात एसे ही चलते रहे तो हम आने वाले समय में सीमेन्ट – कंक्रीट के जंगल, विशाल अट्टालिकाएं और कार्बन उत्सर्जन का गुबार ही देखते रहेंगे और यह विकरालता पर्यावरणीय असन्तुलन का राक्षस बन समूची पीढ़ी को ही निगल जायेगी। पर्यावरण संरक्षण के बिना कोई भी विकास बेमानी है। आशंका जब और बढ़ जाती है जब अन्र्तराष्ट्रीय जलवायु पेरिस समझौते पर अमल किये बिना ही विश्व महाशक्ति अमेरिका ने हाल ही मे अपने को पृथक करने की घोषणा की। अत्यंत चिंतनीय है।
पौराणिक काल से कथानक अनुसार भगवान शिव को पर्यावरणविद माना गया है। विश्व संरक्षण है ‘शंकर‘। जो संतति संरक्षण के साथ पर्यावरण के भी सहज संरक्षण हैं। क्योंकि वे प्रकृति अर्थात शक्ति अथवा पार्वती के पति है। कहीं वे ‘‘विश्वनाथ‘‘ है तो कही बदरीनाथ, कहीं सोमनाथ है तो कहीं पशुपतिनाथ, कहीं महाकाल है तो कहीं रामेश्वरम। मूल में प्रकृति और पर्यावरण से शिव एसे जुड़े हैं जैसे शब्द से अर्थ और पर्यावरण संरक्षण वही कर सकता है जो उससे जुड़ा – बंधा हो। जब हम शिव को आद्य देवता की संज्ञा देते हैं उनके वचनों – कर्मो को शिरोधार्य करते हैं तो दैनन्दिन जीवन मे उन पर अमल क्यों नहीं कर पा रहे। क्या हम भगवान शिव की ही अवहेलना कर रहे हैं ? कथानक है कि देव – दानव युद्ध दौरान समुद्रमंथन में रत्नों के साथ हलाहल विष भी निकला। सब असहाय हो गये तब जड़ -चेतन जगत और प्रकृति की रक्षा के लिये शंकर ने ही हलाहल विष ग्रहण कर नीलकंठ बने। इसकी व्याख्या हम ‘‘विश्व पर्यावरण दिवस ‘‘ सन्दर्भ में करें तो प्रदूषण के महाविष से बचाने के लिये, सर्वकल्याण हितार्थ भगवान शंकर ने श्रेष्ठ आदर्श समुपस्थित किया। इसे शंकर के परिवार से बेहतर समझ सकते हैं। सृष्टि में विभिन्न प्रकार के जीव जन्तु , पेड पौधे, राष्ट्र, परिवार, समाज, भिन्न व्यक्ति रहते हैं विविधता में एकता का सूत्र प्रतिपादित करते है। जहां शिव का वाहन नंदी (बैल) वहीं पार्वती का वाहन सिंह, और कार्तिकेय का वाहन मोर तो गणेश का वाहन मूषक (चूहा) वहीं शिव का कंठहार सर्प हैं। वे परस्पर विरोधी स्वभाव और आकार के हैं परन्तु प्रकृति संरक्षक शिव अथवा आज के सन्दर्भ में मानें तो शिव के प्रभाव से संस्कारगत और स्वभावगत बैर को भुला कर साथ रहते हैं। इसी को आधार मानकर प्रगति और विकास से तादात्म्य स्थापित कर आगे बढ़े तो प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो सकेगी।
हम भगवान को माने पर भगवान की नहीं माने तो अन्याय ही होगा। प्रकृति के वरदान पेड़ -पौधे, जीवजन्तु, नदियां, तालाब, पर्वत को बचाना होगा, संरक्षण देना होगा केवल सरकारों, ष्शासन -प्रशासन, और कागजी एजेन्सीयों की बदौलत इसका संरक्षण नहीं होगा। आप -हम और समाज को चिंता रख कर सक्रियता लाना होगी।
चाहे शिवना हो या शिप्रा, चम्बल हो या नर्मदा, रेतम हो या बेतवा, गंगा हो या जमुना हर कहीं नदियो के प्रवाह बाधित है,मल – मूत्र, विषैले रासायनिक, कुडा – कचरा प्रतिदिन टनों डाले जा रहे हैं यह जानते हुए कि ‘उपलब्ध जलराशि में से मात्र 4 प्रतिशत ही पेयजल योग्य हैं और वर्षाजल का अधिकांश भाग समुद्र के खारे पानी मंे जा मिल रहा है।
अपने को बचाने, अपनी आने वाली पीढ़ी को बचाने अब कोई शिव नहीं आयेगा। विष पीने को कोई अब नीलकंठ नही मिलेगा। आपको – हमको प्रत्येक को सामुहिक दायित्व मानकर – समझकर प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिये शिव बनना होगा, पशुपतिनाथ बनना होगा, नीलकंठ बनना होगा, तभी हम अपने आप के साथ और समाज – राष्ट्र के लिए न्याय कर पायेगंे।

Post source : (डाॅ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर)

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