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पापकर्म में नहीं धर्म कार्य मे धन खर्च करो- प्रसन्नचंदगसागरजी

मंदसौर। आत्मा कई बार संसार में जन्म लेती है और बार बार शरीर बदलती रहती है। जन्म मरण का यह चक्कर एक आत्मा के साथ कई भवों तक चलता है। इस संसार में उसी भवी आत्मा को पुरी तरह युक्ति मिलती है जो संसार के राग द्वेष को छोड नही पाती है और इसी चक्कर में कभी नरक कभी तिरन्य कभी मनुष्य तथा कभी देव गति में भटकती रहती है। यदि चारो गति से बचना है तो संसार के राग द्वेष को पंुरी तरह छोडने का प्रयाय करे। उक्त उदगार परम पूज्य जैन संत गणिवर्य श्री प्रसन्नसागरजी मसा ने तलेरा विहार सिथत चिदपुण्य आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने कहा कि मनुष्य को इस संसार से इतना राग हो जाता है कि उसे कसाय भी अच्छे लगने लगते है जिन शासन मिला है तो जिन शासन से प्रेरणा लो  और संसार के राग को छोडने का प्रयास करो। संसार के राग छोड परमात्मा से राग बढाओ- गणिवर्य श्री प्रसन्नचंद्र जी ने कहा कि जिन शासन में राग का अर्थ है मोह अर्थात संसार के मोह में छोड हमें परमात्मा के प्रति मोह रखना पडेाग। तभी इस संसार रूपी भव सागर से मुक्ति मिलेगी। राजा क्षणिक ने भगवान महावीर से इतना राग मोह किया कि वह परमात्मा के दर्शन के लिये सदैव प्रयत्यनशील रहता परमात्मा सिधर विचरण करते । क्षणिक उस दिशा उनकी गहुली करता है।  दिक्षार्थी की अनुमोदना करो- गणिवर्य प्रसन्नसागरजी ने कहा कि कोई व्यक्ति यदि दिक्षा ले रहा है तो कभी उसे मत रोके दिक्षार्थी के भाव अनुमोदना करके आओं वहा भोजन क्या बना केसा ब ना इसकी चर्चा नही बल्कि दिक्षार्थी ने कितना त्याग किया है उसकी चर्चा करो। पापकर्म में नही धर्म कार्य मे धन खर्च करो- श्री प्रसन्नचंद्रजी ने कहा कि विवाह समारोह बगला बनाने के लिये हम खुब धन खर्च करते है लेकिन यदि धर्म में धन खर्च करने की बात आती है तो हम पीछे हट जाते है। यह स्वभाव हमें बदलना चाहिए। जैन शास्त्रो में वस्तुपाल तेजपाल दो भाईयों का वर्णन है। दोनो भाईयों के पास  खुब धन था लेकिन वे धन था लेकिन वे धन को धर्म व सधर्मी भक्ति पर खर्च करते थे। 20 माला गिनने के बाद ही आहार करते थे सैकडो वर्षो के बाद भी जैन धर्म में उनका नाम अग्रर है।

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