पाषाणयुगीन दुर्लभ श्री चिंतामणि गणपति जी की द्विमुखी पंचसुण्डीय प्रतिमा है आस्था का केन्द्र

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जिस जगही खड़ी हो गई प्रतिमा ले जा रही बैलगाड़ी और नाम पड़ गया गणपति चौक

मंदसौर। प्राचीन एवं ऐतिहासिक धार्मिक नगरी मंदसौर की पहचान देश की एक मात्र अद्वितीय भव्य द्विमुखी भगवान गणेशजी की प्रतिमा के कारण भी है। नगर के गणपति चौक जनकुपूरा स्थित यह दुर्लभप्रतिमा पाषाणयुगीन है, सात फिट ऊँची गणपति की खड़ी मुद्रा वाली इस अप्रतिम नयनाभिराम प्रतिमा का स्वरुप अत्यंत ही सुंदर व कलात्मक है । प्रतिमा के आगे का भाग पंचसुण्डीय रुप में और पीछे का स्वरुप श्रेष्ठी (सेठ)की मुद्रा को प्रदर्शित करता है। मस्तक पर सेठ के समान पगड़ी व शरीर पर बण्डी पहनी हुई आकृति है, प्रतिमा के आगे व पीछे दोनों मुखों के पूजा के विधान भी अलग-अलग है । इस अनोखी प्रतिमा के दर्शन के लिये देश के कौने कौने से अनेको दर्शनार्थी पधारते है।

 

85 वर्ष पुराना है इतिहास
श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति के नाम से विख्यात इस प्रतिमा का ज्ञात इतिहास लगभग 85 वर्षो पुराना है। हालांकि प्रतिमा का प्रस्तर आभा मंडल प्राचीन शिल्प का उत्कृष्ट व सर्वाेत्कृष्ट स्वरुप प्रदर्शित करता है, इस लिहाज से प्रतिमा का इतिहास अतिप्राचीन भी हो सकता है ।

 

तलाई से निकली प्रतिमा

प्रतिमा का प्राकट्य स्थल नगर के नाहर सय्यद दरगाह की पहाड़ी पर स्थित तलाई है । स्थानीय निवासी मूलचंद स्वर्णकार को स्वप्न में इस स्थान पर प्रतिमा के होने का आभास हुआ था, यह कोई किवदंती नही वरन् स्पष्ट तथ्य है । स्वप्न की पुष्टि के लिये मूलचंद स्वर्णकार ने जब उस स्थान पर जाकर देखा तो पत्थरों में दबी यह स्वप्न दृष्टा प्रतिमा सामने प्रत्यक्ष दिखाई दी । मूलचंद स्वर्णकार को सवंत 1986 में आषाढ़ सुदी पंचमी दिनांक 22 जून 1929 को प्रतिमा को प्रतिष्ठापित करने का प्रेरणात्मक आदेश प्राप्त हुआ । उन्होने आषाढ़ सुदी 10 विक्रम संवत 1986 को शाóीय विधि विधान के साथ इस अद्वितीय प्रतिमा को पत्थरों के बीच से निकालकर धुमधाम से बैलगाड़ी में विराजित कर आगे बढ़ाया ।

 

बैलगाड़ी आगे नहीं बढी और वहीं बना मंदिर,आज गणपति चौक के नाम से प्रसिद्ध
तत्कालीन समय के साथी व्यक्तियों के कथनानुसार द्विमुखी गणेशजी की इस प्रतिमा को नरसिंहपुरा क्षेत्र में किसी उचित स्थान पर प्रतिष्ठापित करने हेतु बैलगाड़ी से ले जाया जा रहा था। चूंकि उस समय नरसिंहपुरा जाने के लिये जनकुपुरा से मदारपुरा होकर जाना सुगम मार्ग था इसलिये बैलगाड़ी को जनकुपुरा से ले जाने का निश्चय किया गया । बैलगाड़ी जनकुपुरा में इस स्थान पर रुक गई जहां द्विमुखी चिंताहरण गणेशजी का मंदिर है ।पहले इस स्थान को प्रचलित नाम इलाजी चौक के नाम से जाना जाता था जो अब गणपति चौक के नाम से प्रचलन में आ गया है । इसी मंदिर के कारण यह नाम प्रचलित हो गया चूंकि प्रतिमा को नरसिंहपुरा ले जाने का निश्चय किया गया था इसलिये बैलगाड़ी का आगे बढ़ाने का खूब प्रयास किया लेकिन लाख कोशिश के बादभी बैलगाड़ी एक इंच भी आगे नही बढ़ी । भगवान गणेशजीकी इच्छा को सर्वाेपरि मानकर धर्मालुजनों द्वारा इसी स्थान पर दूसरे दिन यानि एकादशी को प्रतिमा की विधिपूर्वक स्थापना की गई तब से यह स्थान गणपति चौक के नाम से जाना जाता है।

 

बुधवार को होती है महाआरती
प्रति बुधवार यहां सायंकाल महाआरती होती है । मंदिर में अन्य देवी देवता की प्रतिमाएं भी स्थापित है । धर्मशाó के उल्लेख के अनुसार प्रतिमा को पंचतत्वों से संबंधित माना गया है । आगे के मुख जिस पर पांच सुण्ड है ये विघ्नहर्ता गणेशजी कहलाते है । पांच सुण्ड की दिशा बायी और है, पीछे के मुख की सुण्ड दाहिनी दिशा में है जिसे संकट मोचन गणेशजी कहा जाता है । मान्यता है कि श्री द्विमुखी गणपति मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है । ऐसी विलक्षण प्रतिमा के दर्शन करने दूर-दूर से दर्शनार्थी आते है व अपनी मन की कामनाएं पूरी होने की कामना करते है ।

 

गणेशोत्सव में होती है विशेष पूजन अर्चना
मंदिर में गणेशोत्सव के दसो दिन विशेष पूजा आराधना प्रतिदिन महाआरती होती है व विविध धार्मिक आयोजन भी होते है। अनन्त चतुर्दशी पर मंदिर की विशेष झांकी भी निकाली जाती है।

 

आज घर घर विराजेगे रिद्धी सिद्धी के दाता
आज गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर रिद्धी सिद्धी के दाता श्री गणपति जी घर घर विराजेगे साथ ही नगर के विभिन्न चौक चौराहो ं पर गणेश जी की चित्ता आर्कषक प्रतिमाएॅ विधि विधान के साथ स्थापित कर दस दिनों तक विध्नहर्ता की आराधना की जायेगी। इस बार अनेक स्थानों पर भगवान श्री गणेश की आदमकद प्रतिमाएॅ विभिन्न मुख मुद्राओं वाली स्थापित कि जा रही है। इसके लिये नगर में 200 से अधिक स्थानो पर वॉटर प्रूफ पाण्डाल बनाये गये है

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