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पुरातात्त्विक स्‍थल

पुरातात्त्विक स्‍थल

पुरातात्त्विक दृष्टिकोण से मन्‍दसौर का अपना एक अलग ही स्‍थान है, मन्‍दसौर अनेक ज्ञात-अज्ञात पुरातात्त्विक सम्‍पदाओं धनी है जिसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण मन्‍दसौर का पुरातत्‍व संग्रहालय है। अनेक प्रख्‍यात पुरातत्‍ववेत्ता डॉ. विष्‍णु श्रीधर वाकणकर ‘पद्म श्री’ (1919 ** 1988) के अनुसार नगर की स्थापना ताम्रकाल 2000 ई. पूर्व में हो चुकी थी। इस नगर को 5 वीं – 6 ठी शबाब्‍दी में महान औलिकर सम्राटों के साम्राज्‍य की राजधानी होने का सौभाग्‍य मिला है। 7 वीं शबाब्‍दी से 14 वीं शताब्‍दी तक दशपुर का इतिहास अन्‍धकारमय व अटकलों पर ही टिका है।

कीर्ति-स्‍तम्‍भ, सौंधनी

यशोधर्मन स्‍तम्‍भ् और अभिलेख- स्‍तम्‍भ व अभिलेख में रूचि रखने वाले पर्यटकों के लिये मन्‍दसौर के निकट सौधनी ग्राम स्थित यशोधर्मन के स्‍तम्‍भ आकर्षक का केन्‍द्र हैं। इन स्‍तंभों में यशोधर्मन की वीरता एवं हूणों पर विजय का वर्णन हैं। इतिहास प्रेमी पर्यटकों को यह स्‍तम्‍भ सुखद अनुभूति का बोध कराते हैं । विश्‍व में प्रथम विज्ञापन की जानकारी देने वाला बन्‍धुवर्मा का अभिलेख भी इस नगर में प्राप्‍त हुआ हैं।
मन्‍दसौर से 6 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित सौंधनी में ओलिकर सम्राट यशोधर्मा के कीर्ति-स्‍तम्‍भ रखे हैं, जो दशपुर के इस औलिकर सम्राट द्वारा हूण सम्राट मिहिरकुल को पराजित करने के बाद विजय के उल्‍लास में स्‍थापित कराये गये ये। 40 फुट ऊँचे एकाश्‍म से निर्मित ये स्‍तम्‍भ 1500 वर्ष प्राचीन यांत्रिकी कला का अनुपम उदाहरण है।
स्‍तम्‍भों पर गुप्‍तयुगीन ब्राह्मी में दोहरा लेख उत्‍कीर्ण है। यह यशोधर्मा की स्‍तुति में लिखी गई प्रशस्ति है जो राजकवि वासुल द्वारा रची गई व उत्‍कीर्णक गोविन्‍द द्वारा इन स्‍तम्‍भों पर उत्‍कीर्ण की गई थी। इन स्‍तम्‍भों के निर्माण कराने वाले करीगरों के नाम नणप्‍पा व दासप्‍पा थे, जो सम्‍भवत: दक्षिण भारतीय रहे होंगे।

प्रशस्ति के 1 से 8 तक के छन्‍द स्‍त्रग्‍धरा व 9 वाँ अनुष्‍टुप में रचा गया है। इसके सातवें श्‍लोक में कहा गया है कि- ”उस महान् यशोधर्मा ने, जिसकी भुजाओं का तेज इस स्‍तम्‍भ के समान है, उस भूप ने पृथ्‍वी को नापने हेतु यह स्‍तम्‍भ खड़ा किया, जो प्रलय पर्यन्‍त स्थिर रहेगा।”
सम्‍भवत: ये स्‍तम्‍भ किसी प्राकृतिक आपदा से टूट गये होंगे। सन् 1881 में आर्थर सुलवीन ने इन्‍हें देखा, फ्लीट ने इन्‍हें एकत्र कर अभिलेखों का वाचन किया। सन् 1926 में ग्‍वालियर राज्‍य के पुरातत्‍व विभाग के अधिकारी श्री एम.वी. गद्रे ने इन्‍हें व्‍यवस्थित रखवाया। वर्तमान में यह केन्‍द्रीय सरकार का संरक्षित स्‍मारक है। इनमें से एक स्‍तम्‍भ सन् 2003 में खड़ा करवा दिया गया है।

धर्मराजेशवर

धर्मराजेश्‍वर मंदिर जिले की शैलोत्‍कीर्ण आदर्श की उत्‍कृष्‍ट कृति हैं। आठवी शताब्‍दी में निर्मित इस मंदिर की तुलना एलौरा के कैलाश मंदिर से की जाती हैं क्‍योकिं धर्मराजेश्‍वर का यह मंदिर भी कैलाश मंदिर की भॉति एकाष्‍म शैली में निर्मित हैं, जिसमें चटृटान को खोखला कर के ठोस प्रस्‍तर शिला को देवालय में परिवर्तित किया जाता हैं।
मन्‍दसौर जिले की गरोठ तहसील में चन्‍दवासा से 3 कि.मी. दूर धर्मराजेशवर अथवा धर्मनाथ उत्तर भारत का एलोरा है। डॉ. आनन्‍दकुमार स्‍वामी के अनुसार- ”यह मन्दिर नागर शैली का सजीव उदाहरण है। इसकी गणना मसरूर कांगड़ा की शैल वास्‍तु की कोटि में की जा सकती है। ”
सुन्‍दरता विशालता और उत्‍कृष्‍टता लिये हुए यह मंदिर 54 मीटर लम्‍बी 20 चौडी तथा 09 मीटर गहरी शिला को तराशकर बनाया गया हैं। जो उपर से समतल दिखाई देता हैं। उत्‍तर भारतीय मंदिर की भांति इस मंदिर में भी द्वार मण्‍डप, गर्भगृह व शिखर निर्मित हैं। मध्‍य में एक बडा मंदिर हैं, जिसकी लम्‍बाई 1453 मीटर तथा चौडाई 10 मीटर हैं जिसका उन्‍नत शिखर आमलक तथा कलश से युक्‍त हैं इस मंदिर में महामण्‍डप की रचना पिरा‍मिड आकार में उत्‍कीर्ण की गई हैं। मंदिर की सुन्‍दर तक्षणकला आगुन्‍तको को पत्‍थर में कविता का बोध कराती हैं। मध्‍य में लगभग 14.52 मीटर लम्‍बाई व 10 मीटर चौड़ाई का शिखरयुक्त देव-प्रासाद तथा इसके चारों ओर छ: लघु देवालय हैं। दोनों पार्श्‍व में सोपान मार्ग हैं जो मन्दिर के प्रांगण में प्रविष्‍ट होते हैं। बाएँ कोने में एक मीठे जल की कुइया है। देवालय से जल के निकास हेतु 68 मीटर लम्‍बा, 4 मीटर चौड़ा तथा 9 मीटर गहरा सुरंगनुमा मार्ग खोदा गया है। इस पर आवागमन हेतु तीन पुल निर्मित किए गए हैं। देव-प्रासाद के प्रांगण में प्रवेश के लिए पुल की लम्‍बाई लगभग 7 मीटर रखी गई है। इसके द्वार के दोनों पार्श्‍वगृहों में बाईं ओर भद्रकाली व दाईं ओर नटराज की भग्‍न प्रतिमाएँ है।
धर्मराजेश्‍वर में गुफा में स्‍थित मंदिर में बलुआ पहाड को काटकर विष्‍णु मंदिर बनाया गया जिसे बाद में शिव मंदिर का रूप दिया गया। पहाड काटकर बौध्‍द गुफाएँ, चैत्‍य विहार एवं बुध्‍द प्रतिमाएँ बनाई गई है। गुफाऍं शामगढ से 12 किलोमीटर सडक मार्ग की दूरी पर है। भीमबैठका एवं गुफा में स्‍थित स्‍तूप भी दर्शनीय है। गुफा में स्‍थित मंदिर को एक ही चटृटान को काटकर बनाया गया है। लेटराइट चट्टान में उत्‍कीर्ण यह मन्दिर दशपुरीय शैलकर्म की एक उत्‍कृष्‍ट कृति है, जो लगभग 8 वीं शताब्‍दी में निर्मित मानी जाती है। इस उत्‍कृष्‍ट कृति को निहारने लोग दूर-दूर से यहाँ आते है।
मन्दिर से दूसरी ओर बौद्ध चैत्‍यगृह व विहारों की श्रृंखला है। यहाँ सम्‍भवत: मालवा का विशाल शैलोत्‍कीर्ण विहार रहा है। ये गुफाएँ जेम्‍स टॉड द्वारा प्रकाश में लाई गई थी। सन् 1960-61 में गुफाओं की सफाई के दौरान यहाँ मृण-मुद्रा मिली थी जिस पर गुप्‍तयुगीन ब्राह्मी लिपि में ‘चन्‍दनगिरि विहारे’ उत्‍कीर्ण है।
लेटराइट चट्टान में उत्‍कीर्ण यहाँ लगभग 80 गुफाएँ हैं। इनमें से 3, 4, 7, 9, 11, 12, 13, 14 क्रमांक की गुफाएँ चैत्‍यगृह हैं व 2, 7, 10, 12 क्रमांक की गुफाएँ विहार है। इन गुफाओं में क्रमांक 7 बड़ी कचहरी, 9 छोटी कचहरी, 12 भीम बाजार व 14 छोटा बाजार कहलाती है।
बौद्ध धर्म के महायान सम्‍प्रदाय से सम्‍बन्धित इन गुफाओं का निर्माण 5 वीं – 6 टीं शताब्‍दी के मध्‍य हुआ होगा। ऐसा अभिलेखितक व साहित्यिक साक्षों से अनुमान होता है। वर्तमान में यह केन्‍द्रीय पुरातत्‍व विभाग द्वार संरक्षित है।

पोला डूँगर

गरोठ से 20 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में गरोठ-बोलिया मार्ग पर कालाखेड़ा से लगभग 3-4 कि.मी. दूर पोला डूँगर स्थित है। ‘पोला-डूँगर’ का शब्दिक अर्थ है ‘खोखला पहाड़’। यहाँ पहाड़ी को काटकर लगभग 32 विहार व चैत्‍य का निर्माण किया गया है। इनमें गुफा क्र. 5 कचहरी, 10 रंगारा की औरी, 11 ग्‍वाले की औरी, 15 लीलगरा की औरी, 19 गुजरन, 20 व 26 धोबी, 28 बलाई की औरी कहलाती है। क्र. 24 सूरजपोल या हाथ्‍यापोल कहलाता है, जिसमें 4.30 मीटर ऊँचा स्‍तूप है। गुफा की छत टूट गई है। यहाँ बुद्ध प्रतिमा नहीं मिली है। अत: ये हीनयान सम्‍प्रदाय द्वारा 5 वीं-6 टीं शताब्‍दी में निर्मित की गई ऐसा जान पड़ता है। बौध्‍द गुफाएँ, स्‍तूप, हनुमानजी का स्‍थान आदि है। यहॉं का प्राकृतिक सौन्‍दर्य भी अत्‍यंत रमणीय है।

खेजड़िया भूप

शामगढ़ से 32 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित खेजड़िया भूप सुवासरा तहसील में स्थित है। यहाँ सुवासरा, घसोई, गर्दनखेड़ी होतु हुए पहुँचा जा सकता है। इस स्‍थल की खोज गद्रे ने की थी। यहाँ 500 गज की लम्‍बाई में, अश्‍वनाल आकृति में 28 गुफाएँ लोहसिकताश्‍म (मुरमीली) चट्टान में उत्‍कीर्ण की गई है। 27 गुफाएँ विहार है जिनमें बौद्ध भिक्षु निवास करते थे। गुफा क्र. 10 व 11 के मध्‍य खुले आकाश में 3 मीटर ऊँचा स्‍तूप निर्मित है, इसके अधिष्‍ठान का व्‍यास 2.25 मीटर व अण्‍ड का व्‍यास 1.25 मीटर है। भग्‍नावस्‍था में इस स्‍तूप के ये दोनों भाग शेष हैं। स्‍थानीय भाषा में इसे ‘भीम की बैठक’ (भीम को बेनो) कहते हैं। इन गुफाओं में क्र. 11, 17, 21, 23, 25 व 27 दर्शनीय है। ये गुफाएँ भी हीनयान सम्‍प्रदाय से सम्‍बन्धित रही हैं। निर्माण काल लगभग 5 वीं – 6 ठी शताब्‍दी है।