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प्रिन्ट मीडिया की आंतरिक सेहत खराब -समय रहते सम्भालें

प्रिन्ट मीडिया की आंतरिक सेहत खराब -समय रहते सम्भालें

(डॅा. घनश्याम बटवाल, मंदसौर) प्रिंट मीडिया, विश्वसनीय और प्रामाणिक अभिव्यक्ति का एक आधार सन् 1857 के गदर से लेकर अंग्रेजो के समक्ष दृढ़ता से सामना कर, आजादी प्राप्ति का प्रमुख कारक बना। आज भी दलित, शोषित ,पीड़ित, गरीब, कमजोर,महिला,किसान बुजुर्ग और युवा कमोबेश सभी वर्गो  और सभी धर्मो का मुखर -प्रखर स्वर प्रिन्ट मीडिया ही है। सरकार चाहे राज्यो  की हों या केन्द्र की प्रिन्ट -मीडिया के प्रभाव को जानती है मानती है।
मोटे तौर पर प्रिन्ट मीडिया (समाचार पत्र -पत्रिकाएं ) दैनिक, सांध्य दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रेैमासिक, विभिन्न भाषाओ  में प्रकाशित कई संस्करण देशभर में जाने -पहचाने जाते है। उजला पक्ष यह कि, देश भर में भिन्न भाषा -भाषायी आज भी सूर्य की पहली किरण के साथ सुबह -सवेरे अखबारों का उत्सुकता से इंतजार करते हैं। सूचनाओं, समाचारों, घटनाओं-दुर्धटनाओं, विचारों, को पढ़कर, देखकर अपनी मुहर लगाते हंै। इसके साथ ही खबर या सूचना अधिकृत रुप से ‘पुष्ट‘ मानी जाती है, और लोकतंत्र में जनमत निर्माण का आधार बनती है। देश की स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी प्रिन्ट मीडिया का महत्व बना हुआ है, परन्तु आज जो परिदृष्य उभर कर सामने आ रहा है चिंताजनक है। प्रमुख बड़े, लघु मध्यम और आंचलिक प्रिंट मीडिया की आंतरिक सेहत खराब हो चली है।चमक दमक आवरण की आभा क्षीण होती जा रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया, सोशल मीडिया, और विशेषकर डीजीटल मीडिया ने नई और गंभीर चुनौति सामने रखी है।
वर्तमान में राजनेता और राजनीतिक दल अपने और अपनी पार्टी को बचाने, स्थापित करने में विद्युत गति से जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं कुछ शांत परन्तु बहुत ही उलझा हुआ युद्ध चल रहा है, जो भीतरी रुप से लड़ा जा रहा हैं प्रिन्ट मीडिया के अस्तित्व की रक्षा के लिये। लोकतंत्र के एक प्रमुख स्तम्भ के रुप में मान्य प्रिन्ट मीडिया एसा माध्यम रहा है जहां कोई भी स्वतंत्र विचार प्रकट कर सकता है, कई बड़ी -बड़ी क्रांतिया समाचार पत्रों के माध्यम से हुई है, अनेक भ्रष्ट कारनामें उजागर किये है, हजारों – लाखो  को न्याय दिलाया है पर बहुत विडम्बना है कि यह आज संकट में है। कई ताकतें और तत्व एक साथ आ चुके हैं प्रिन्ट- मीडिया को जीर्ण-शीर्ण करने के लिये अथवा अपने अनुकुल बनाने के लिये।
देश के डेढ़ सौ वर्ष पुराने स्थापित समाचार पत्र ‘‘टाइम्स आॅफ इंडिया‘‘ में प्रकाशित टिप्पणी के अनुसार विष्व में अब तक चल रहे स्थापित सिद्धांतो पर टिके प्रिन्ट मीडिया का रक्त अभी से जहां -तहां बिखरा दिख रहा है। प्रति स्पर्धा और टिके रहने के लिये हर कहीं अखबारों की कीमतों में कमी, नित नये प्रयोग, प्रसार योजनाएं कई तरह की कटौतियां, स्टाॅफ में छटनी, संस्करण बंद करना आदि सब उसी के लक्षण हैं। कुछ क्षेत्रीय लघु और मध्यम समाचार पत्र बहुत समय से इन्ही हालातों में जैसे -तैसे गुजारा कर रहे हैं, परन्तु अब इन कारकों की मार बड़े तथा प्रमुख समाचार पत्रों -पत्रिकाओं, प्रकाशकों पर भी पड़ रही है। अब यह मुद्दा चर्चा का नहीं क्यों कि स्थापित और समाचार पत्र प्रकाशक संस्थान कर्मियों को उच्च वेतन भुगतान , अन्य व्यवस्था जन्य व्ययों के चलते नुकसान उठा रहे हैं। दक्षिण भारत के जाने माने आंग्ल दैनिक ‘‘दि हिन्दू‘‘ के अनुसार उन्हैं वर्ष 2013 -14 तथा 2014-15 में प्रिटेक्स हानि उठाना पड़ी है। देश की प्रमुख समाचार एजेन्सी के अनुसार उनके स्थापना और वेतन -भत्ते व्यय में वर्ष 2013-14 में 173 प्रतिशत बढ़ोत्री हुई जिससे उत्पादन -लागत तो बढ़ी परन्तु लाभ प्रदता शून्य पर पहुंच गई।
केन्द्र सरकार नोटबंदी को उचित ठहरा रही है, परन्तु प्रिन्ट मीडिया पर भी इसका बड़ा आघात लगा है। भारतीय समाचार उद्योग (प्रिन्ट मीडिया ) पुरी तरह विज्ञापन राजस्व पर आश्रित है जो कुल व्यवसाय का 70 से 80 प्रतिशत तक होता है। बड़ी जटिलताओ के बीच कुल विज्ञापन कारोबार में 4 से 6 प्रतिशत तक बनाए रखने की कवायद चल रही थी किन्तु नोटबंदी ने विज्ञापन कारोबार को बुरी तरह कस दिया है जो क्रमिक रुप से घट गया है। इसकी तुलना में इलेक्ट्रानिक मीडिया टी.वी. पर विज्ञापन 15 से 18 प्रतिशत एवं सोशल मीडिया डीजीटल मीडिया पर विज्ञापन 35 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि कर रहा है। अर्थात प्रिन्ट मीडिया की आय का सबसे बड़ा स्त्रोत डिजीटल व इलेक्ट्रानिक मीडिया के पक्ष में रुपान्तरित हो गया है।
इसे हम यूं समझ सकते हैं, राष्ट्रीय पत्रिका ‘बिजनेस टूडे‘ में प्रकाशित सर्वे की टिप्पणी अनुसार वर्ष 2015 में सभी मीडिया माध्यमों का सकल कारोबार लगभग 50 हजार करोड़ का रहा जो वर्ष 2017 में बढ़कर 61 हजार 200 करोड़ रु. तक होने का अनुमान है। वहीं प्रिन्ट मीडिया की हिस्सेदारी सन् 2015 में 16 हजार 800 करोड़ रु.की आंकी गई जो सन् 2017 में 18 हजार 260 करोड़ रु. अनुमानित है। मात्र 4 प्रतिशत वृद्धि दर्ज संभावित है। इसकी तुलना में इलेक्ट्रानिक मीडिया एवं टी.वी. माध्यम से सन् 2015 में 23 हजार करोड़ रु. की आय अर्जित हुई, वहीं सन् 2017 में 27हजार 380 करोड़ तक होने का अनुमान है। टी.वी. माध्यम से विज्ञापन में 8से 10 प्रतिशत तक की वृ़िद्ध हुई है। वहीं सर्वाधिक वृद्धि डीजीटल व सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दर्ज हुई हैं। सन् 2015 में जहां 5 हजार करोड़ रुपए का करोबार रहा, वह सन् 2017 में 9 हजार 500 करोड़ रु. तक पहंुचेगा। सन् 2015 से सन् 2016 में 47 प्रतिशत और सन् 2017 तक 30 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हो रही है और यह निरन्तर बढ़ रहा है। एनराइड मोबाईल, लेपटाॅप, कम्प्युटर, वाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर, यूटयूब, वेबसाइट,मोबाइल एप,ब्ल्युट्रथ,इंटरनेट वाई -फाई, वेबपोर्टल, ब्लाॅग, लिंक्कडीन, आदि को अपनाने वाले देश में लगभग सवासो करोड़ से अधिक उपभोक्ता जो तेजी से ‘‘मनोरंजन और सूचना -समाचार कभी भी, कहीं भी‘‘ की तरफ बढ़ रहे हैं। व्यस्तता -प्रतिस्पर्धा -आपाधापी और सीमित समय के चलते अधिकांश युवा और कामकाजी वर्ग अपनी हथेली से जुड़ा रह सकता है, चाहे आभासी दुनिया हो या वास्तविक।
डीजीटल मीडिया एसा अघतन सम्पर्क माध्यम बन गया है कि अत्यन्त व्यस्तता के बाद भी व्यक्ति अपने दफ्तर से घर पहुंचने के दरम्यान ही मोबाईल या लेपटाॅप से ‘‘अपडेट‘‘ हो जाता है। नई उभरती और ग्राह्य होती संस्कृति से टी.वी. को भुलाया जा रहा है एसा नहीं हैं परन्तु अवष्य ही विज्ञापन दाताओं को डीजीटल विडीयो प्लेटफार्म की तरफ मोड़ दिया है। स्पष्ट है, यही एकमात्र माध्यम है जहां विज्ञापन करोबार मे स्थायी वृद्धि दर्ज की जा रही है। अब तो रेडियो, सिनेमा में तेजी से विज्ञापन राजस्व में गिरावट दर्ज की है। रेडियो पर लगभग 2 हजार 400 करोड़ तथा सिनेमा से मात्र 500 से 600 करोड़ का विज्ञापन कारोबार है इसमें भी बड़ा हिस्सा सरकारों की योजनाओं का प्रचार -प्रसार प्रमुख है। प्रिंट मीडिया के प्रसार में भी कमी हो रही है।
केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिन डीएवीपी ;क्।टच्द्धने भी प्रिन्ट मीडिया को सम्बल प्रदान नहीं किया। मार्केट रेट की तुलना में दर वृद्धि नहीं की। डीएवीपी द्वारा विगत 7 वर्षो में सिर्फ एक बार सन् 2010 अक्टोबर में विज्ञापन दर संशोधित कीं है। आज यह दर इतनी कम है कि समाचार पत्र उतना राजस्व भी प्राप्त नहीं कर पाते जितनी उनकी अखबार छपाई की लागत है। ज्ञातव्य है कि अखबारों के विज्ञापन आय का बड़ा आधार डीएवीपी तथा प्रदेशो के जनसम्पर्क विभाग का रहा है। राज्यों के डीपीआर दरों में भी वृद्धि वांछित है। कहीं 2 साल में तो कहीं 6 सालों में संशोधित नहीं की गई है।
विगत वर्षो में तेजी से लागत बढ़ी है,उसकी तुलना मे विज्ञापन आय नहीं बढ़ पायी है। अखबारों के प्रसार, छपाई, वितरण, कागज, स्याही, मशीनें, विद्युत, एजेन्सी कमीशन, स्थापना व्यय, कम्प्युटर, मार्केटिंग संपादक,संवाददाताओं आदि पर ही इतना व्यय हो रहा है कि लाभप्रदता शून्य है,फिर अखबारो का मूल्य 2 रु. से 5 रु. के बीच ही रखा है ताकि आम जन मानस को उचित कीमत में अखबारों के माध्यम से मनोरंजन, शिक्षा -स्वास्थ्य -विज्ञापन -तथा समाचार -सूचनाएं विस्तारित और विष्वसनीय माध्यम से प्रदान की जा सके।
प्रमुख बड़े और लघु -मध्यम समाचार पत्रों की आर्थिक सेहत आंतरिक रुप से खराब हो रही है। कई नामी अखबारों पर करोड़ो रु. का ऋण बकाया है। एक राष्ट्रीय दैनिक ने गत वर्ष 4 प्रतिशत राजस्व वृद्धि ;ब्।ळत्द्ध दर्शायी है, जबकि उसके स्थापना और अन्य व्यय में 58 प्रतिशत वृद्धि हुई। हाल ही में आजादी आंदोलन में भागीदार रहे बड़े समूह हिन्दुस्तान टाइम्स के मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, सहित 6 संस्करण बंद कर दिये गये। इस ब्रांड को देश के सबसे धनी अंबानी गु्रप ने खरीदा है। इसी तरह विगत वर्षों में अनेक समाचार पत्र, पत्रिकाएं, दैनिक, साप्ताहिक, बन्द हो गये है। अथवा कई प्रकाशनों के स्वामित्व में परिवर्तन हुआ है। कार्पोरेट हाउसो के नियंत्रण में आ जाने से प्रिन्ट मीडिया अवाम की आवाज रह पायेगा, शंका है।
प्रिन्ट मीडिया एसा क्षेत्र है जो निजी क्षेत्र द्वारा संचालित है परन्तु इसके वेतन -भत्तों का निर्धारण सरकारें करती है। भाचावत वेज बोर्ड, माणीसाना वेज बोर्ड, मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा अनुशंसा की गई है जो अखबारों पर भारी पड़ रही है। प्रिन्ट मीडिया प्रबन्धन का मानना है कि युक्तियुुक्त करण करते हुए वेतन भत्तों की पुनः समीक्षा हो
सन् 2002 में राष्ट्रीय श्रम आयोग ने सुझाव दिया था कि उद्योगो में वेज बोर्ड की आवष्यकता नहीं हैं फिर भी सरकार ने इसे जारी रखा है। बेशक प्रिंट मीडिया में पत्रकारों, संपादकों, आदि की स्थितियों में आंशिक सुधार ही हो पाया है। अनुसंशित वेतनमान महानगरों, प्रांतिय राजधानियों तक ही सिमट कर रह गया है। पत्रकारों एवं पत्रकार संगठनों की मंाग रही है कि उन्हें सम्मान जनक वेतन, भत्ते तथा अन्य स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा मिले। ऐसी स्थिति में वास्तविक आकलन कर समाचार पत्र उद्योग के हित में पुनरीक्षण करना चाहिये।
केन्द्र सरकार द्वारा आगामी जुलाई 2017 से जी एस टी.कर पद्धती लागू की जाना हैं इसमें स्पष्ट नहीं है कि समाचार पत्र उद्योग की क्या स्थिति रहेगी। इसे सरकार को शून्य (0) दर्जा देकर राहत देना चाहिये ताकि ये स्थापित मार्ग दर्शक सिद्धांतो के मानकों को पुरा कर सके। टेक्सदर कम होने से या नहीं रखने से प्रिन्ट मीडिया को सम्बल मिलेगा। विगत सात दशकों से बोलने -लिखने की आजादी, तथा लोकतांत्रिक मूल्यों पर टिके रहने और आमजन की आवाज बनने से यह जनमत का सशक्त आधार है।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट व्याख्या की है कि संर्वेधानिक अधिकारों की रक्षा के लिये समाचार पत्र -पत्रिकाओं पर टेक्स एक प्रकार से शिक्षा, सूचना, ज्ञान, प्रचार और स्वतंत्रता पर अवरोधक की तरह होगा। इस सन्दर्भ में केन्द्र सरकार को जी एस टी व्यवस्था में प्रिन्ट मीडिया के लिये सरलीकरण कर शून्य प्रतिशत कर दायरे में रखना चाहिये साथ ही अखबारों की बिक्री वितरण, प्रसार,में भी छूट प्रदान करना चाहियें ताकि उचित न्यूनतम मूल्य में जनसाधारण को उपलब्ध हो सके। यह अन्तर्राष्ट्रीय मापदण्डो को
मानने वाली बात ही होगी। संपूर्ण विष्व में लोकतंत्र न केवल प्रिन्ट मीडिया को कर मुक्त कर रहा है, अपितु सुचारु संचालन के लिये मदद भी कर रहा है।
प्रिन्ट मीडिया के क्षेत्र में उतार -चढ़ाव का दौर चल रहा हैं। और कर नीतियां, हानिकारक तत्व, कार्पोरेट नियंत्रण, इस पर आघात कर रहे है। यह स्थितियों को सामने रखता है। और स्पष्ट है कि महानगरों, राजधानियों, संभागीय केन्द्रों तक यह आघात छोटे -बड़े अखबारों पर पड़ रहा है जिला व तहसील स्तर पर भी इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। चुनौतियां बढ़ती जा रही है लागत और व्यय की तुलना में विज्ञापन और राजस्व नहीं मिल पा रहा। प्रिन्ट मीडिया मे कार्यरत वर्ग देश भर में लाखों की संख्या मे हैं, इनके तथा इनके परिवारों के हितों में समाज और सरकार को समय रहते सम्भालना होगा। इस विष्वसनीय और प्रामाणिक धरातल को मजबूत बनाये रख कर सहयोग करना होगा।

 

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