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प्रेस और पुलिस का परस्पर सामंजस्यात्मक संबंध सहायक सिद्ध होगा पब्लिक हितों में- वरिष्ठ पत्रकार डॉ. घनश्याम बटवाल का पुलिस प्रशासन मंदसौर ने किया बहुमान-बंशीलाल टांक

वर्तमान परिवेश में देश आतंकवाद, महिलाओं के साथ बलात्कार, राजनैतिक गलियारों की सियासत से जिन विषम परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है उससे उबारने मे यदि कही आशा की कोई किरण दिखाइ्र देती है तो वह है एक तरफ न्यायपालिका और दूसरी तरफ मीडिया और दोनों के वजूब का अमलीजामा पहनाने की तीसरी कड़ी कोई है तो वह है पुलिस प्रशासन। मीडिया  सकारात्मक कार्यों में पुलिस प्रशासन के लिये जिस प्रकार सहायक की भूमिका में खड़ा होता रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। पुलिस को असामाजिक तत्वों से निबटने, गुनाहगार नेताओं को कानून के कठघरे में खड़ा करने में राजनैतिक हस्तक्षेप-दबाव के कारण जो कठिनाईयां उपस्थित हो रही है पुलिस कर्मियों की गुण्डा तत्वों द्वारा हत्याएं की जा रही है इसी प्रकार की अवांछनीय हरकते, प्रहार पत्रकारों पर भी हो रहे है, दोषियों बाहुबलियों के दोष-पाप उजागर करने वाले मीडिया कर्मियों को मौत का सामना ही नहीं करना पड़ रहा है उनकी हत्याएं की जा रही है परन्तु फिर भी पत्रकार अपने कर्तव्य निर्वाह में पीछे नहीं हट रहा है।
जहां तक पुलिस द्वारा समाज एवं राष्ट्र विरोधी तत्वों से सख्ती से सलूक करने का प्रश्न है पुलिस के पास कानून का डण्डा है परन्तु एक पत्रकार के पास कोई हथियार है तो वह है उसकी कलम-उसका कैमरा परन्तु कैमरा तोड़ दिया जाता है और कलम को कागज पर आने से रोकने के लिये सियासत साम-दाम दण्ड चारों नीतियों का पूरजोर प्रयोग कर अपने पक्ष में खबरें छपवाने के लिये दबाव डालने में कोई कसर नहीं रखती फिर भी एक पत्रकार की अडिगता, निर्भयता, निष्पक्षता उसे अपने धर्म से बिना डिगाये अपने कर्तव्य पर आरूढ़ डटे रहने के लिये प्रेरित करती रहती है।
एक तरफ हमारे माननीय-आदरणीय-सम्मानीय वै राजनेता है जो लोकतंत्र के पवित्र मन्दिर सदन में मामूली बहस मुद्दों पर क्रोध-उत्तेजना-आवेश के इस प्रकार बह जाते है कि समस्त मर्यादाताओं-शिष्टाचार-शालीनता को तिलांजली देकर हो हल्ला-एक दूसरे पर हाथ-पांव-लातों-घूसों का उपहार देने में भी नहीं चूकते वहीं दूसरी और जो ग्रीष्म की भीषण गर्मी की तपन की तरह अनपेक्षित घटनाओं की आग में जलते अवाम को बचाने के लिये अदृश्य शीतल हवा के झोंके की तरह जिसे  चौथा स्तम्भ (केवल वाणी से कहने और कानों से सुनने तक सीमित है क्योंकि विधान में अन्य तीन स्तंभ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की तरह इस चौथे स्तंभ के पास  कौन से अधिकार है) कहा जाता है। वास्तव में मीडिया चट्टान की तरह यह वह स्तम्भ है जिसको सर्दी-गर्मी-बरसात के थपेड़ांे की तरह संघर्ष चोटे तो बहुत झेलना पड़ती है परन्तु फिर भी वह अपने संयम को सीमा से बाहर जाने की इजाजत नहीं देता। एक पत्रकार को सत्यता-वास्तविकता प्रकट करने का चाहे उपहार, सम्मान मिले या ना मिले परन्तु अकारण अपमान के ऐसे क्षण जो उसे उत्तेजित करने की कोई असर नहीं छोड़ते फिर भी वह एक पत्रकार ही है जो कड़वे घूंट पीकर भी उफ तक नहीं करता। पत्रकार एक तपस्वी की तरह सहनशीलता, विनम्रता का कवच पहनकर सभी प्रहार सहन करना हुआ अपने पत्रकारिता धर्म को जुदा नहीं होने देता।
जहां तक मंदसौर नगर के मीडिया जगत का प्रश्न है यहाँ केे मीडिया ने चाहे बाबरी ढांचा ढहने के बाद का बवाल हो चाहे गोधरा काण्ड जैसे दिल दहलाने वाली घटनाएं हो, दशकों से नगर के साम्प्रदायिक सौहार्द, गंगा-जमनी तहजीब को कायम रखने में निर्वहन अहं भूमिका की सभी ओर सराहना हुई है और हाल ही में नगर के आदरणीय वरिष्ठ पत्रकार डॉ. घनश्यामजी बटवाल को माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंहजी चौहान द्वारा श्रेष्ठ पत्रकारिता में जो राज्य स्तरीय पुरस्कार से नवाजा है इसके लिये बटवालजी के माध्यम से नगर के प्रेस एवं इलेक्ट्रानिक सम्पूर्ण मीडिया को गौरव मिला है। बटवालजी का सहज-सरल स्वभाव उनकी विनम्रता सबके प्रति स्नेह-सम्मान-विशिष्ट गुणों के लिये नगर का मीडिया भी उनका कायल रहा है।
पुलिस विभाग से संबंधित विशेष जटिल वारदातों घटनाओं को सुलझाने पर जहां  पोलिस कंट्रोल रूम पर पुलिस कप्तान द्वारा प्रेस वार्ता आहुत की जाती रही है वहीं 13 अप्रैल को पुलिस कप्तान श्री मनोज कुमारसिंह के नेतृत्व में पुलिस प्रशासन द्वारा नगर के पत्रकारों की सन्निधी में श्री घनश्याम बटवालजी का जो सम्मान हुआ वह केवल बटवालजी का ही नहीं सम्पूर्ण मीडिया जगत का बहुमान हुआ है। हालांकी किन्हीं मुद्दों पर कभी-कभी प्रेस और पुलिस के मध्य सहमति-असहमति  की स्थिति उत्पन्न होने के बावजूद इस सम्मान से प्रेस और पुलिस प्रशासन का परस्पर सहयोगात्मक आत्मीय सम्बन्ध देखने को मिला जो प्रेरणास्पद होकर भविष्य में जनहित में सेतु का काम करेगा। पुलिस कप्तान श्री मनोज कुमार सिंह इसके लिये बधाई के पात्र है।

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