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बंधे पत्थर और खुले कुत्तों वाला यह देश

कहीं एक लतीफा पढ़ा था। देश के किसी पहाड़ी इलाके में घूमते विदेशी सैलानी पर कुत्ते भौंकने लगे। उसने कुत्तों को भगाने के लिए पत्थर उठाना चाहा। पत्थर जमीन में धंसा हुआ था। सैलानी बोला, अजीब देश है, जहां कुत्तों को खुला रखा जाता है और पत्थरों को बांधकर। टीवी चैनल पर एक कार्यक्रम देखा था। जिसमें सांपों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में बताया गया। दो किस्म के सांप मुझे याद रह गये। एक वे जो उड़ने वाली शैली में एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक हवा में ही पहुंच जाते हैं। दूसरे, वे जो अपने भीतर भरे घातक जहर को खासी दूरी पर मौजूद दुश्मन तक पहुंचाकर उसका काम तमाम करने की क्षमता रखते हैं। गुजरे दौर की बरतानिया हुकूमत वाले ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन में आज एक आलेख पढ़ा। तो कुत्ते और सांप, दोनों से जुड़े यह किस्से दिमाग में तैर गये। जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफसर हैं, मुकुल केसवन। इन प्रोफेसर साहब का जहर-भरा आलेख इंसानी फितरत में छिपे शैतान के तमाम पहलूओं को सामने रख गया

प्रायोजित एवं आयातित मानसिकता वाला यह लेखन पूरी तरह एक एजेंडे का प्रतिनिधित्व कर रहा है। केसवन ने झूठ-दर-झूठ परोसकर देश की छवि को विदेशों में खराब करने का कुत्सित प्रयास किया है। केसवन के निशाने पर केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृह मंत्री अमित शाह नहीं रहे, उन्होंने हर उस शख्स को कलंकित करने का जतन किया है, जो देश में सीएए या एनआरसी के प्रावधानों का समर्थन करता है। वह लिखते हैं कि इन कदमों के जरिये देश में हिंदू राज्य स्थापित करने का कुचक्र रचा जा रहा है। वे अप्रत्यक्ष रूप से इसे मुस्लिमों के खिलाफ साजिश भी बताते हैं। जेएनयू में उपद्रवियों पर पुलिस की कार्रवाई को तो यूं बयान किया गया है, गोया कि वहां दूसरा जलियांवाला बाग कांड रच दिया गया हो। इसी विश्वविद्यालय में नकाबपोशों के हमले को भी पुलिस तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के विरुद्ध मनमाने तरीके से दर्शाया गया है। जाहिर है कि केसवन दोपाया होने के बावजूद कॉमरेड होने का फर्ज किसी चौपाये जैसी वफादारी के साथ निभा गये।

सारे आलेख में इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है कि सीएए में भारत के किसी भी वास्तविक निवासी (फिर वह चाहे किसी भी धर्म का क्यों न हो) को देश से बाहर निकालने या डिटेंशन सेंटर में भेजने जैसा कोई प्रावधान है ही नहीं। इसमें यह भी नहीं बताया गया कि किस तरह पाकिस्तान के एक गुरूद्वारे पर हुए हालिया धर्मोन्मादी हमले ने सीएए की आवश्यकता को स्थापित कर दिया है। केसवन इतने ही खुले दिमाग के हैं तो क्यों नहीं लेखन में यह ईमानदारी दिखा पाए कि कम से कम सीएए एवं एनआरसी के पक्षकारों की कुछ दलीलों को सामने रख देते! दरअसल, लगातार नाकामी से मिली हताशा कई बार इस तरह के आचरण की वजह बन जाती है। इसे यूं समझिए। शुभ अवसर पर किन्नरों का पैसे मांगना आम बात है। कई बार मामला धनराशि पर अटक जाता है। मनमाफिक पैसा न मिले तो किन्नर बद्दुआएं देने लगते हैं। मामला तो यहां तक पहुंच जाता है कि वे सामने वाले को लज्जित करने के लिए घोर अश्लील आचरण करने से भी नहीं चूकते।

तीन तलाक की कुप्रथा के खिलाफ बना कानून, अनुच्छेद 370 का जम्मू-कश्मीर से खात्मा, वहां सक्रिय अलगाववादियों पर कड़े कानूनी प्रतिबंध, इन सबके चलते एक खास किस्म की केसवनमयी विचारधारा के संवाहक पहले से ही बिलबिला रहे थे। तिस पर सीएए के कानून बनने एवं एनआरसी को लेकर केंद्र के कड़े रुख ने उन्हें किन्नरों वाली बौखलाहट से भी भर दिया है। वे इस कदर विचलित हुए कि देश की छवि को गलत तथ्यों के आधार पर दुनिया के सामने खराब करने का भौंडा प्रयास कर गुजरे हैं। उन्हें यह तक भान नहीं रहा कि जिस सरकार के खिलाफ वह यह षड़यंत्रकारी करतूत कर रहे हैं, उस सरकार को इसी देश की आबादी ने लगातार दूसरी बार बहुमत के साथ सत्ता में आने का अवसर दिया है। वह भी तब, जबकि मोदी तथा शाह ने पहले ही साफ कर दिया था कि सत्ता में आने पर सीएए एवं एनआरसी जैसे कदम उनके एजेंडे का हिस्सा होंगे।

तो जिस कार्यक्रम को देश की जनता ने बहुमत से नवाजा है, उसकी कोरे झूठ पर आधारित निंदा करके केसवन इस लोकतंत्र का अपमान नहीं तो और क्या कर रहे हैं! यह एक असंगठित गिरोह की संगठित कोशिशों वाला दौर चल रहा है। प्रमुख अखबारों को ही लीजिए। सीएए और एनआरसी के खिलाफ होने वाले मुट्ठी भर लोगों के उग्र प्रदर्शन को पहले पेज पर प्रमुखता से जगह दी जा रही है। इन्हीं दो प्रावधानों समर्थन में हो रही शांतिपूर्ण रैलियों और अन्य आयोजनों को भीतर बहुत छोटी खबर के रूप में स्थान दिया जा रहा है। गार्जियन इतना ही ईमानदार अखबार है तो क्या वह यह खबर प्रकाशित करेगा कि इस देश में बहुत बड़ा तबका यही कह रहा है कि घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए! यकीनन यह अखबार ऐसा करने में कोई रुचि नहीं लेगा। निश्चित ही केसवन जैसी मानसिकता सच को खुद से सप्रयास दूर रखेगी। वह जानते हैं कि यह भारत है। वह देश, जहां दुर्भाग्य से कई बार कुत्तों के खुले होने और उन्हें नियंत्रित करने में सक्षम पत्थरों के बंधे होने जैसे हालात बन जाते हैं। यह वह देश है, जहां से बैठे-बैठे देश के खिलाफ जहर को दुनिया में फैलाया जा सकता है। जहां इंसानों के रूप में पलते कई जहरीले सांप उड़कर अपने विचारों का देश की धरती के बाहर तक प्रचार कर सकते हैं। जब तक पत्थर बंधे रहेंगे, ऐसे दु:खद और घृणास्पद अध्याय को देखने एवं भोगने के लिए हम अभिशप्त हैं।

प्रकाश भटनागर

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