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बाज़ार “बंद” करना लोकतन्त्र पर हमले के समान है!

भारत वर्ष में अशोक सम्राट, महात्मा बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक कई ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया जो आज भी पूरे विश्व के लिए अहिंसा का पतीक माने जाते हैं। महात्मा गांधी ने तो ऐसे युग में जन्म लिया जबकि हमारा देश अंगेज हुकूमत का गुलाम था। अंग्रेज अपनी बर्बरता, चतुराई, रणनीति तथा `फूट डालो और राज करो’ जैसी नीतियों के लिए विश्व पसिद्ध थे। उनके शासन काल में जब भी भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्प कराने का कोई अभियान या आन्दोलन इस देश में छेड़ा जाता तो यह उस आन्दोलन को बर्बरता पूर्वक कुचल दिया करते थे। उसी दौरान महात्मा गांधी को एक युक्ति सूझी कि चूंकि हम अंग्रेजों का मुकाबला ताकत या हथियारों से नहीं कर सकते अतः शांति और अहिंसा रूपी हथियारों का पयोग अंग्रेजों के विरुद्ध किया जाना ही एक समझदारी भरा कदम होगा। हालांकि उस समय देश की आजादी की लड़ाई में अपनी जान को हथेली पर लिए और सर पर कफन बांध कर निकले तमाम देश भक्त मतवाले गांधी जी के इस अंहिसात्मक सत्याग्रह के तरीकों से पूर्णतया सहमत नहीं थे। उसके बावजूद दुनिया ने देखा कि अहिंसा के इस महान पुजारी ने अपने शांति, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे बह्म अस्त्रां का पयोग करते हुए भारत को आखिरकार अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवा ही दिया। गांधी जी ने आजादी की लड़ाई में शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए जिन अस्त्रां का पयोग करने की सलाह भारतवासियों विशेषकर स्वतत्रता संग्राम में सकिय सेनानियों व कांग्रेस जनों को दी थी उनमें शांतिपूर्ण पदर्शन, भूख हड़ताल, असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह,धरना, सांकेतिक व्रत तथा विरोध स्वरूप स्वैच्छिक बंद आदि उपाय शामिल थे। इन्हीं अहिंसक अस्त्रां से भयभीत होकर अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। भारत स्वाधीन हो गया। अहिंसा के उस महान दूत को अंग्रेज तो जान से मार देने का साहस न जुटा सके परन्तु हमारे ही देश के एक घोर साम्पदायिकता वादी एवं कट्टरपंथी विचारधारा का पाठ पढ़े हुए एक हत्यारे ने गांधी जी को कत्ल कर डाला। बेशक आज गांधी जी हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उनके द्वारा दिखाए गए शांति और अहिंसा के आदर्शों को आज भी न केवल पूरा देश बल्कि पूरा विश्व पूरे आदर व सम्मान के साथ स्वीकार करता है। गांधी जी के उन शांति पिय विरोध, पदर्शन के अस्त्रा का पयोग आज भी इस देश में समय समय पर न सिर्प गांधी वादियों या कांग्रेसजनों द्वारा ही किया जाता है बल्कि गांधीवादी विचारधारा का विरोध करने वाले लोग भी समय समय पर उन गांधीवादी लोकतांत्रिक विरोध पदर्शनों का सहारा लेते रहते हैं। ऐसे ही एक लोकतांत्रिक विरोध पदर्शन के तरीके को `बंद’ का नाम दिया गया है। `बंद’ का अर्थ यह होता है कि यदि किसी शासकीय व्यवस्था के विरुद्ध किसी संगठन द्वारा `बंद’ का आह्वान किया गया है तथा जनता उस `बंद’ के आह्वान को अपना समर्थन दे रही है तो वह स्वेच्छा से अपनी दुकान, व्यापारिक पतिष्ठान, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि को विरोध स्वरूप `बंद’ कर उस संगठन द्वारा आहूत `बंद’ में शामिल होकर व्यवस्था का विरोध करने वालों में स्वयं को भी सम्मिलित कर सकती है। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि आज तमाम संगठनों द्वारा समय समय पर उन गांधी वादी तरीकों का पयोग तो जरूर किया जाता है परन्तु वास्तव में उनमें अहिंसा के स्थान पर हिंसा तथा स्वेच्छा की जगह अनिच्छा व लोकतांत्रिक तौर तरीकों के इस्तेमाल के बजाए पूर्णतया जोर-जबरदस्ती व धक्के शाही वाले तरीकों का पयोग होता दिखाई देता है। राजनैतिक विरोध की यह अलोकतांत्रिक कही जा सकने वाली पकिया एक समय देश में अपने उस चरम तक पहुंच गई थी जबकि लगभग पूरे देश में हड़ताल, पदर्शन, तोड़फोड़, चक्का जाम तथा बंद जैसी घटनाएं आम हो चुकी थीं। देश में इन विरोध पदर्शनों ने अराजकता का रूप धारण कर लिया था। वैसे तो पूरा देश इस अशांति का सामना कर रहा था। परन्तु दुर्भाग्यवश देश का सबसे पिछड़ा व गरीब कहा जाने वाला बिहार राज्य इन घटनाओं में सबसे आगे था। यहां तक कि उसी दौरान बिहार में समस्तीपुर जिले में बिहार के ही सांसद एवं तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की एक बम विस्फोट द्वारा एक सार्वजनिक कार्यकम में हत्या तक कर दी गई। यह घटना किसी आतंकवादी या अलगाववादी आन्दोलन के कारणवश हुई हत्या नहीं बल्कि राजनैतिक विरोध पदर्शनों ने इस कद्र उग्र रूप धारण कर लिया था अथवा यह कहा जाए कि तमाम राजनैतिक व श्रमिक संगठनों द्वारा सत्तारूढ़ इन्दिरा सरकार के विरुद्ध किये जा रहे रोष पदर्शन इतने उग्र हो चुके थे कि इनके परिणाम स्वरूप स्वतत्र भारत की पहली शीर्ष राजनैतिक हत्या ललित नारायण मिश्रा के रूप में देश वासियों को देखनी पड़ी। पसिद्ध बड़ौदा डाईनामाईट काण्ड भी उसी जमाने की बात है जिसका आरोप जार्ज फर्नाडिज पर लगाया गया था। आखिरकार उपरोक्प हालात से तंग आकर व इन्हीं कारणों से देश की बिगड़ती हुई अर्थव्यवस्था को देखकर तथा अहिंसात्मक विरोध पदर्शन के तौर तरीकों को पूरी तरह हिंसापूर्ण होता हुआ देखकर इन्दिरा गांधी को देश में आपात काल की घोषणा करनी पड़ी थी। आपात काल की घोषणा होते ही देश की कानून व्यवस्था पटरी पर आ गई। सभी पकार के धरने पदर्शन व हड़ताल पतिबंधित कर दिए गए। हालांकि तमाम नेता देश में की गई आपातकाल की घोषणा को लोकतंत्र की हत्या तथा तानाशाही जैसी संज्ञा दे रहे थे परन्तु वास्तविकता तो यही है कि आपातकाल की घोषणा होने से पूर्व जब ललित नारायण मिश्रा की हत्या हुई या भारतीय रेल के चक्के जाम हुए, देश के तमाम बड़े व छोटे कल कारखाने ठप्प करा दिये गए, बड़ौदा डाईनामाईट कांड हुआ, उस समय तो देश में पूरा लोकतंत्र था। परन्तु क्या यह सभी घटनाएं एक सच्चे लोकतंत्र की देन कही जाने वाली घटनाएं थीं? बहरहाल, आज न तो देश में आपातकाल जैसी स्थिति है और सौभाग्यवश न ही आपात काल के पूर्व का अराजकतापूर्ण वातावरण । परन्तु राजनैतिक विरोध के तमाम कारणों के चलते अब भी कभी-कभार भारत बंद या पदेश बंद जैसे आह्वान होते जरूर देखे जा सकते हैं। इसे महज एक इत्तेफाक कहें या राज्य का दुर्भाग्य कि अभी भी `बंद’ के इस आह्वान में बिहार राज्य ही सबसे आगे नजर आता है। बेशक किसी भी शासकीय फैसले के विरोध में `बंद’ का आहवान करना किसी भी संगठन अथवा उससे जुड़े लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। परन्तु वास्तव में `बंद’ आखिर कहते किसे हैं? आज कल जिस पकार बंद का का आह्वान किया जाता है उसमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि आम लोगों के व्यवसायिक पतिष्ठानों, दुकानों व उद्योगों आदि को जोर जबरदस्ती से बल पूर्वक बंद कराने का पयास किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बंद में शामिल नहीं होना चाहता तो उसे बंद कराने वालों की हिंसा या रोष का शिकार होना पड़ता है। यहां तक कि गरीब, रेहड़ी व ठेला गाड़ी तथा रिक्शा चालकों तक को बंद में शरीक पदर्शन कारियों के आतंक का सामना करना पड़ता है। देखा जा सकता है कि बंद का आह्वान करने वाले मुठ्ठी भर पदर्शनकारी तलवारों व लाठी डंडों से लैस होकर अपने `बन्द’ के मिशन को पूरा करने के लिए सड़कों व बाजारों के बीच पूरी तरह भय और आतंक का वातावरण पैदा कर अपने `बंद’ को कथित रूप से सफल बनाना चाहते हैं। पिछले दिनों पंजाब राज्य के कुछ शहरों में भी कुछ संगठनों द्वारा जोर-जबरदस्ती के बल पर बाजार बंद करवाने के दौरान कुछ हिंसक घटनाएं घटी जिसमें कई लोग घायल हुए व पुलिस बल का भी पयोग हुआ। सवाल यह है कि क्या ऐसे अलोकतांत्रिक तरीके अपनाकर `बंद’ को सफल बनाना आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों तथा स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने के उनके मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है। विरोध पदर्शन, बन्द तथा हड़तालें आदि हमारे शांतिपूर्ण विरोध व्यक्त करने के तरीकों में जरूर शामिल हैं। परन्तु हमें इन अधिकारों का दुरुपयोग कतई नहीं करना चाहिए। हमें जहां अपना विरोध व्यक्त करने का अधिकार है वहीं हमें अपनी इच्छा को दूसरों की अनिच्छा पर थोपने का अधिकार हरगिज नहीं है। किसी भी बंद में उसी को शामिल किया जाना चाहिए जो स्वेच्छा से तथा वैचारिक रूप से `बंद’ के आह्वान में शामिल होता है। हिंसात्मक तरीके अपनाकर `बंद’ को कथित रूप से सफल बनाकर जनता की हमदर्दी कतई नहीं पाप्त की जा सकती।

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