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ब्रह्मलीन सत्यमित्रानंदजी ने वैदिक संस्कृति की नई चेतना जागृत करने का अनुपम दिव्य कार्य किया – अनन्तदेवजी महाराज

ब्रह्मलीन सत्यमित्रानंदजी की गुणानुवाद सभा का हुआ आयोजन

मन्दसौर। महात्माओं का धरती पर जन्म नहीं अवतरण होता है, इसलिये महात्माओं का जन्मोत्सव नहीं निर्वाणोत्सव मनाया जाता है। गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है कि जब-जब भी धर्म की ग्लानी होने लगती है तब भगवान इस धरती पर स्वयं न आते हुए अपने आने से पहले  महात्माओं को भेजते हैं जिससे धर्म संस्कृति की रक्षा हो सके। उक्त उद्गार वृन्दावन के महामण्डलेश्वर स्वामी श्री अनंतदेवजी महाराज ने निवृत्तमान शंकराचार्य भानपुरा पीठ महामण्डलेश्वर, भारत माता मंदिर हरिद्वार के संस्थापक, पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंदजी गिरी के ब्रह्मलीन होने पर उनकी स्मृति में श्री केशव सत्संग भवन खानपुरा में अनन्तदेवजी के सानिध्य में आयोजित गुणानुवाद सभा में व्यक्त करते हुए कहा कि स्वामी सत्यमित्रानंद गिरीजी महाराज ने निमिषाणय तीर्थ से अपनी आध्यात्म यात्रा शुरू की थी और उन्होंने शंकराचार्य के पश्चात् हरिद्वार में भारत माता मंदिर की स्थापना कर सम्पूर्ण विश्व में वैदिक संस्कृति की नई चेतना जागृत करने का अनुपम दिव्य कार्य किया। आपने कहा कि जिन महात्माओं ने उनका सानिध्य प्राप्त किया है उन्हें उनके द्वारा बताये गये लक्ष्य को प्राप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।

स्वामीजी ने कहा कि जन्म हुआ तो मृत्यु निश्चित है। आपने जगद्गुरू आद्य शंकराचार्य भगवान के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जन्म तो सब लेते है और मरते भी सब है परन्तु जन्म लेना भी उसका सार्थक है जिसे दुबारा फिर जन्म लेकर माँ की कोख में आना नहीं पड़े। इसी प्रकार मृत्यु भी उसी की सार्थक है जिसकी पुनः मृत्यु न हो। पूज्य स्वामी श्री सत्यमित्रांनदजी मृत्यु को नहीं निर्वाण को प्राप्त हुए है। आपने लोक और परलोक दोनों को साध लिया। कुल, परिवार, जननी, धरती, ऐसे महापुरूषों के अवतरण से पवित्र हो जाती है।
विधायक यशपालसिंह सिसौदिया ने स्वामीजी का सम्पूर्ण मालवा क्षेत्र के प्रति अगाध प्रेम, स्नेह और अनुग्रह बताते हुए कहा कि स्वामीजी समय और धर्म की प्रतिबद्धता के मूर्तिमान स्वरूप थे। सत्संग भवन सचिव कारूलाल सोनी ने कहा कि स्वामी सत्यमित्रानंदजी गिरी महाराज ने मंदसौर में चौतन्य आश्रम मेनपुरिया में सन् 1999 में सत्संग भवन के भूमि पूजन में एक लाख दान दिया। उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश गिरीराज सक्सेना, समाजसेवी गुरूचरण बग्गा, जिला सहकारी बैंक पूर्व अध्यक्ष मदनलाल राठौर, धीरेन्द्र त्रिवेदी, ब्रजेश जोशी, बंशीलाल टांक, विनय दुबेला, रमेशचन्द्र चन्द्रे, रवि बुन्देला आदि ने ब्रह्मलीन स्वामी के स्मरणों को याद कर भावांजली दी।

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