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भगवान महावीर का आत्मधर्म जगत के प्रत्येक प्राणी के लिए समान 

भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक पर्व विशेष-

(कमल कोठारी)

पंचशील सिद्धांत के प्रवर्तक एवं जैन धर्म के चौवीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी अहिंसा परमो धर्म के मूतिमान प्रतीक थे। उस काल युग में हिंसा पशुबलि जाति पाति के भेदभाव का बोलबाला था। उसी युग में भगवान महावीर स्वामी ने जन्म लिया। भगवान महावीर स्वामी ने सम्पूर्ण मानव जाति को सत्य, अहिसां, अपरिग्रह, परमो धर्म का उपदेश दिया, मानव जाति को सत्य अहिंसा के मार्ग पर चलने का रास्ता दिखाया। जैन धर्म की स्थापना वैदिक काल में हुई थी। इसके संस्थापक पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। भगवान महावीर स्वामी ने 30 साल की युवा अवस्था में सन्यास ग्रहा किया तथा कठोर तप तपस्या में लीन हो गये। भगवान महावीर स्वामी ने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था। जिसके कारण वे जिन कहलाये एवं पराक्रम के कारण महावीर कहलाये जिन शब्द से ही जैन शब्द का अविष्कार हुआ है। अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के कारण भी वे जिन कहलाये। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को सम्पूर्ण विश्व को मानवता, एकात्मकता का संदेश देने वाले भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक पूरे विश्व में धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान महावीर का आत्मधर्म जगत के प्रत्येक आत्मा प्राणी के लिए समान है। समस्त जीवों पर करूणा दया रखने के भाव को ही जैन धर्म का मूल सिद्धांत बताया है। जीओ और जीने दो के नारे के साथ प्राणीयों को जीवदया अहिंसा मैत्री भाव समरसता बनाये रखने की मिसाल कायम कर जीवन में चरितार्थ करने का मानव  को संदेश दिया जो व्यक्ति भगवान के सिद्धांत व नियमों को आत्मसात करता है वह केवलि भी हो सकता है। जीवन दर्शन सम्यक चरित्र दर्शन अपरिग्रह अहिंसा, जीओ और जीने दो, सम्यक दृष्टि इन सभी दर्शनों, विचारों के साथ जैन दर्शन शास्त्र, दर्शन कला और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का अपना महत्वपूर्ण योगदान है। जैन दर्शन शास्त्र जीवन जीने की कला के साथ मोक्षग्रामी बनने के मार्ग को भी प्रशस्त करता है।

जैन धर्म शास्त्र राग, द्वष, ईश्या, व्यभिचार को खत्म कर सिर्फ मानव मात्र के कल्याणक के तथा आत्म से परमात्म मौन से मोक्ष तक पहुंचाने का सरलतम मार्ग है। भगवान महावीर स्वामी ने  तप तपस्या, साधना, आराधना के बल पर चल कर आत्मा से परमात्मा बनने की प्रेरणादायी सीख दी है। मनुष्य जन्म लेना सौभाग्य की बात है लेकिन जैन धर्म कुल में जन्म लेना परम् सौभाग्य की बात होती है। भगवान महावीर के संदेशों को यदि सरकार पाठ्यक्रम में जोड़ने का प्रया करती है तो निश्चित ही समाज में नहीं अपितु विश्व में भी मेत्री भाव कल्याणक मानव जाति के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास होगा।

महावीर जयंती के इस शुभ प्रसंग में समाज के मैत्रीभाव समरसता, करूणा, दया, अहिंसा के भावों के साथ श्री महावीर के अनुयायी के साथ हम महावीर के अणु बनने का सार्थक प्रयास करे। सभी नगरवासी को शुभकामनाएं।

जय जिनेन्द्र

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