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भारतीय नववर्ष गुडी पडवा हम सबके लिये अत्यंत गौरव का दिन,सृष्टि के प्रथम दिन का हर्षोल्लास के करें स्वागत

मंदसौर। भारतीय नववर्ष विश्व का सर्वश्रेष्ठ दिन है। हम लोग वेद,पुराण,इतिहास,शास्त्रों को जोडकर नव संवत्सर मनाते आ रहे है। इस दिन प्रत्येक हिन्दू को नववर्ष का स्वागत अपने घर के उपर भगवा पतका फहराकर प्रकाश कर अपने घर के द्वार पर रंगोली सजाकर मित्रों को शुभकामना संदेश देकर पूरे हर्षोल्लास से इस दिन का स्वागत करना चाहिए। प्रातः काल ब्रम्ह मुहुर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान भुवन भास्कर सुर्य को अर्ध्य देना चाहिए। इस दिन पवित्र सरोवर में भी स्नान का महत्व है। पश्चिम के अन्धानुकरण के कारण भ्रम पूर्ण स्थित में जीेने का मजबूर हैं। इस दिन नीम,काली मिर्च और मिश्री का प्रसाद खाने का भी बहुत बडा महत्व है।

भारतीय ग्रंथो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी एकम थी उस परंपरानुसार प्रतिवर्ष हिन्दूओं द्वारा चैत्र शुदी एकम को हिन्दू नववर्ष मनाया जाता है। चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था। हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरू होता है, इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है, हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है।

पेड़-पोधों मे फूल ,मंजर ,कली इसी समय आना शुरू होते है , वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है। जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है, इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था नवरात्र की शुरुआत इसी दिन से होती है जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है।

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं श्रीराम रूप धारण कर उतर आए, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इसी दिन भगवान झुलेलाल का भी अवतरण संसार में हुआ था जिसे सिंधी समाज के लोग चेटीचण्ड के रूप में मनाते है। आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आध्य सरसंघचालक प.पू. केशवराव हेडगेवार जी का जन्मदिन भी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवकों के लिये यह दिन विशेष महत्व का है।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चौत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चौत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चौत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है , पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन , आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई। नई फसल घर मे आने का समय भी यही है। इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है , जिससे पेड़ -पौधे , जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है। लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है। गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है , मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है।

दो हजार वर्ष पूर्व शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंतिका (उज्जैन) पर आक्रमण किया तथा विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरौकर शक्तिशाली मोर्चा खडाकरके ईसा पूर्व 57 में शकों में भिषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। थोडे समय में ही इन्होने औंकड,सौराष्ट्र और सिंध प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करवा लिया। विक्रमादित्य ने शकों ने उनके गढ अरब में भी करारी मात दी। इसी विक्रमादित्य सम्राट के नाम पर भारत विक्रमी संवत् प्रचलित हुआ। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल में इसी संवत के अनुसार कार्य चला। इसकेे बाद भारत में मुगलों के शासन के दौरान सरकारी शासन हिजरी सन चलता रहा इसे भाग्य की विडम्बना कहें अथवा स्वतंत्र भारत के कुछ नेताओं की अकर्तज्ञता कि सरकार ने शक संवत् को स्वीकार कर लिया लेकिन सम्राट विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित विक्रम संवत् को स्थान नहीं दिया।

भारतीय नववर्ष के वृतांत के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है क्योंकि भारतीय व हिन्दू नववर्ष का आध्यात्मिक व ऐतिहासिक जगत में बहुत बडा महत्व है। इसलिये हम सभी को भारतीय नववर्ष पर गर्व होना चाहिए व इसे पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाना चाहिए।

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