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मंदसौर का ऐतिहासिक किला
यह कहानी है एक ऐसे दुर्ग की, जिसने लगभग 600 साल के अपने ज्ञात इतिहास में, दशौर से दशपुर के सफर में हुशंगशाह गौरी, मुगलों, खिलजी से लेकर होलकरों व फिर अंग्रेजों के हमले भी झेले हैं। इस दुर्ग की खासियत यह रही कि यह लंबे समय तक किसी एक राजवंश के अधीन भी नहीं रहा और न ही कोई राजा यहां रहा। जिसने भी इसे जीता अपने अधीनस्थ लोगों के हवाले कर दिया। इतने हमले झेलने के बाद आज भी इसके दरवाजे व जीर्ण-शीर्ण होती दीवारें पुरानी शानो-शौकत का फलसफां कह रही हैं। नई पीढ़ी के लिए यह जानना भी रुचिकर हो सकता है कि शहर में शिवना नदी किनारे ऊंचे टीले पर एक शानदार दुर्ग भी था।मंदसौर के ऐतिहासिक स्थलों में  मंदसौर का किला भी एक ऐतिहासिक स्थल है | इस किले के 12 दरवाजे  जो किले के चारो और भिन्न भिन्न दिशा में स्थित थे उनमे से कुछ दरवाजे आज भी स्थित  है  । यह शहर का प्राचीन किला है जो ऐतिहासिक रूप से काफी ज्यादा मायने रखता है। अतीत से जुड़े पन्ने बताते हैं कि इस किले पर तिमुर द्वारा आक्रमण किया गया था, जिसके बाद दिल्ली सल्तनत बहुत कमजोर हो गई थी। उस दौरान दिलावर खान मलावा प्रांत के गवर्नर थे।  वर्तमान में यह किला एक खंडहर के रूप में यहां मौजूद है।मंदसौर के प्रसिद्ध इतिहासकारों  के अनुसार  किले में पहले काफी दर्शनीय स्मारक थे पर लगातार हमलों में सभी नष्ट होते चले गए। शकर बावड़ी, जनाना बावड़ी अब गायब हो चुकी है। शाही हमाम अब शौचालय के रूप में प्रयुक्त होता है। इसके अलावा अंगे्रजों द्वारा बनाए गए भवनों में जिला न्यायालय सहित अन्य शासकीय विभागों के कार्यालय लग रहे हैं। दुर्ग तो लगभग नष्ट ही हो गया है। उसके परकोटे में बने सूरज पोल, गुदरी गेट, मंडी गेट ही अब साबूत बचे हैं।

इतिहास

मंदसौर शहर शिवना नदी के उत्तरी किनारे पर प्राचीन टीले पर बसे हुए प्राचीन दशपुर नगर का विस्तृत रूप है। यह नगर पांचवीं-छठी शताब्दी में औलिंकर सम्राटों के साम्राज्य की राजधानी भी रहा है। इतिहासकारों के मुताबिक मंदसौर दुर्ग का निर्माण सबसे पहले हुशंगशाह गौरी (1405-1434 ई.) ने अपने राज्य की उत्तरपश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए करवाया था। तबसे यह दुर्ग मांडू के शासकों की गतिविधियों का केंद्र रहा। गियासशाह (1469-1500 ई.) के सैनिक अधिकारी मुकबिल खान ने 7 अप्रैल 1498 को इस किले के दक्षिण पूर्व में स्थित सिंह द्वार, नदी दरवाजे का निर्माण कराया। 1519 में राणा सांगा ने इस किले पर अधिकार कर लिया था।

मार्च-अप्रैल 1535 में बहादुरशाह गुजराती पर आक्रमण करने आए हुमायूं ने लगभग एक माह 10 दिन तक इस किले पर निवास किया था। हूमायूं के पतन के बाद 1542 में यह किला शेरश्ााह सूरी के कब्जे में आ गया था। उसने सदर खां को यहां का किलेदार बनाया था। 1561 में अकबर ने इस किले पर कब्जा कर लिया था। उसके बाद से अकबर का कब्जा यहां बना रहा। 1597 में अकबर के मुरीद वहीदउद्दीन काजी ने खिलचीपुरा के परकोटे का निर्माण कराकर इसे संवारा था। उसके बाद औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह (1707-1712 ई.) के काल में 26 अगस्त 1709 को मंदसौर का फौजदार दिलावर खां को नियुक्त किया गया।

फरवरी 1733 में मालवा के मुगल सूबेदार आमेर महाराजा सवाई जयसिंह ने इस किले में डेरा डाला था। तभी मराठों ने आक्रमण कर मुगलों से किला छीन लिया। मराठों के समय भी सन् 1752 में यहां अब्दुल बेग को ही पदस्थ रखा गया था। सन् 1763 में उदयपुर महाराणा ने इस किले पर कब्जे के लिए चढ़ाई की थी। 1778 में मेवाड़ी सेना से पराजित होकर जावद के मराठा अधिकारी नाना सदाशिवराव ने इसी दुर्ग में शरण ली थी। तब रानी अहिल्याबाई होलकर व महादजी सिंधिया ने संयुक्त सेनाओं को मंदसौर भेजकर यहां कब्जा कर लिया था। उसके बाद से यहां सिंधिया राजवंश का शासन रहा। महादजी सिंधिया के समय यहां 1775 से 1790 तक मराठा सेनापति जीबवा दादा बक्षी भी पदस्थ रहा। इसके बाद से यहां अंग्रेजों के शासनकाल तक शाहजहां से लेकर होलकरों, सिंधिया के आने का भी उल्लेख मिलता है।


मंदसौर का किला ऐतिहासिक होकर गौरव गाथा को बया कर रहा है। इस ऐतिहासिक किले का निर्माण 15 वी शताब्दी में मांडू के सुल्तान हुशंगशाह ने करवाया था। इसका प्रमाण गुजरात में मिले ग्रंथ निराली सिकंदरी में है। यह किला अपने राज्य के उत्तरी और पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। यहां कोई स्वतंत्र राज्य नहीं था फिर भी किला मांडू के सुल्तान के अधीन था।

मालवा-मेवाड़ का रहा संधि स्थल
बताया तो यह भी जाता है कि चित्तौड़ पर आक्रमण करने जाते समय उनकी सेना यहां से गुजरती थी तब अतिरिक्त सेना जो होती थी वह यहां रुकती थी जहां उनका मुख्यालय था लगता है। मंदसौर मालवा और मेवाड़ का संधि स्थल यह किला व क्षेत्र रहा है यह दोनों के मध्य स्थित होने के कारण इस दुर्ग पर मालवा और मेवाड़ तथा मुगलों का समय-समय पर शासन होता रहा है।

वर्तमान में मंदसौर के इस खंडहर नुमा दिखने वाले किले के सालो बाद फिर से कायाकल्प की शुरुआत हुई। इतिहास का वर्णन करने वाला यह किला अब विलुप्त होता चला जा रहा था लेकिन कलेक्टर मनोज पुष्प ने इसका निरीक्षण कर यहा रंग-रोगन से लेकर इसके कायाकल्प की शुरुआत करवाई है।

पांचवी से सातवी शताब्दी के ओलिकर वंश रहा
मंदसौर का प्राचीन इतिहास गौरवपूर्ण है। पुरातत्वविद कैलाशचंद्र पांडे ने बताया कि पांचवी से सातवीं शताब्दी तक ओलिकर वंश यहां रहा। ऐसा प्रमाण भानपुरा में एक खंडित शिलालेख जो 475 ईसवी का है। उससे पता चलता है महाराणा कुंभा ने जब मांडू के सुल्तान को पराजित किया तब सोलवी शताब्दी में उनका इस पर कब्जा हुआ महाराणा कुंभा के किलेदार अशोक मूल राजपूत को यहां की जिम्मेदारी सौंपी गई।

18 वीं शताब्दी में यह मराठों के कब्जे में आया उस समय ग्वालियर के शासक सिंधिया के यह कब्जे में था। 26 अगस्त 1857 से 63 दिन तक यह शहजादे फिरोज के कब्जे में रहा जिसे दिल्ली के मुगल बादशाह के परिवार का होना बताया गया। ऐसा बताया जाता है कि उस समय उसका राज्यारोहण हुआ था।

गुजरात के शासन की सेना तालाब किनारे ठहरी थी
पुरातत्व विद् पांडे ने बताया कि 24 सितंबर 1857 को शहजादा फिरोज का अंग्रेजों की सेना से गुराडिया में युद्ध हुआ था जिसमें वह पराजित हो गया तो फिर वहां से भागकर उत्तर प्रदेश की ओर चला गया। मुगल सम्राट का गौरवशाली पक्ष यह भी है कि चित्तौड़ के दूसरे साके जोहर के समय चित्तौड़ की महारानी कर्मण्य वती ने राखी भेजकर मुगल सम्राट हुमायूं को आमंत्रित किया था तब हुमायूं ने इस किले में अपनी सेना सहित लगभग एक माह रुका था कि नए से उत्तर पश्चिम में गुजरात के शासक बहादुर शाह गुजराती की सेना तालाब किनारे यहां ठहरी थी। यहां 5 वी से 7 वी शताब्दी में कोई डेढ़ सौवर्षो ओलिकर वंश रहा। उसके बाद होशंग शाह से लेकर फिरोजशाह तक के राजवंशों ने यहां शासन किया अकबर ने 1561 में जब अपने राज्य का पुनर्गठन किया तब मंदसौर एक सरकार के रूप में विकसित हुआ। 1925 में सिंधिया ने यहां सुबायत कायम की थी।तब ॅ कलेक्टर कार्यालय का भवन बना था।

उस समय लकडिय़ों के मकान होते थे। दिल्ली के सुल्तानों की तरफ से माथुर परिवार को कानूनगों के रूप में पदस्थ किया गया था जिनकी सात मंजिला हवेली भी कभी इस किले में हुआ करती थी जो 400 वर्ष पुरानी हो गई थी।

मंदसौर के इस किले में है 12 दरवाजें
शहर में स्थित इस किले की खासियत एक और यह है कि इसमें 12 दरवाजे है। लेकिन देखरेख के भाव में जहां यह दरवाजे कुछ क्षतिग्रस्त हुए हैं वही इस किले की चार दिवारी जिसे परकोटा भी कहा जाता है को कुछ जगह से नुकसान पहुंचाया गया तो कुछ जगह से वह गिर गई है यह सभी 12 दरवाजे अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं। दक्षिण पूर्व में नदी दरवाजा इसका मुख्य मार्ग था। 1496 मुखबिर खान ने कराया था इसका दूसरा दरवाजा भी प्रख्यात है। वर्तमान में उसे मंडी गेट के नाम से भी जाना जाता है इस दरवाजे पर 1857 की क्रांति के दौरान शहजादा फिरोज की सेना ने जीरन के मैदानी युद्ध में 12 अक्टूबर 1857 को कैप्टन और टक्कर के सर काटकर गेट पर टांग दिया था। क्रांतिकारी लाला सोहरमल को छोड़कर 3 क्रांतिकारियों को 18 दिसंबर 1958 को फांसी दी गई थी।