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मंदसौर के स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी : स्व. चान्दमल कस्तूरचन्द मारू – संक्षिप्त जीवन परिचय

प्रसिद्ध स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अखिल भारतवर्षय श्वेताम्बर जैन स्थानकवासी समाज के कर्मठ कार्यकर्ता, दलित वर्ग के उद्धारक श्री चान्दमल मारु का 4 नवम्बर 1908 को मन्दसौर में सेठ कस्तूरचन्द्र जी मारु के यहां जन्म हुआ। आपकी माताजी का नाम कस्तूराबाई था। आपके 4 भाई और 3 बहनें तथा 4 पुत्र और 3 पुत्रियां हैं।

आपने 5 वर्ष की आयु में अपनी पढ़ाई गृह नगर में ही शुरु की और मिडिल स्कूल में हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती व संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। आपको अपनी लेखनी के साथ भाषण-कला पर भी पूर्ण अधिकार था। हजारों श्रोताओं को अपनी बुलन्द वाणी आकर्षित एवं प्रभावित कर लेते थे।

आपने मात्र 9 वर्ष की अवस्था में ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी व लोकमान्य तिलक जैसे महान नेताओं के विचारों से प्रभावित होकर स्कूलों में जगह-जगह अपने साथियों को इकट्ठे कर देश की आज़ादी देखने का सपना जाग्रत कर लिया। इस सपने को पूरा करने के लिये आप अपने धर्मगुरु श्री जैन दिवाकर चौथमलजी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर सन् 1921 में महान स्वतंत्रता सेनानी श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने आपको कांग्रेस का सदस्य बना दिया और जीवन पर्यन्त कर्मठ कांग्रेसी कार्यकर्ता बने रहे।

आप अपने धर्म का निर्वाह करते हुए कांग्रेस के कट्टर भक्त बन गये। इसके साथ ही आपने पूज्य गांधीजी द्वारा दिये गये उपदेशों को अपने जीवन में उतार लिया और जातिवाद जैसे नाग को समाप्त करने का संकल्प लिया और जीवनभर दलित वर्गा के उद्धार के लिये समर्पित रहे। इसी कारण न केवल हिन्दू, जैन, सिःख बल्कि मुसलमान, बोहरा, हरिजन अन्य जातियों के साथ आपका जीवनभर प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा।

सन् 1933 में राजस्थान के चित्तौड़ में विशाल जैन स्वर्ण जयंति महोत्सव सम्मेलन में आपने नेपाल के श्रीमंत राजा महैन्द्र प्रताप को बुलाकर अपने गुरु जैन दिवाकर का हीरक जयन्ति महोत्सव भी मनाया और गांधीजी द्वारा दिये गये उपदेश को अपने धर्म गुरु द्वारा विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए जातिवाद समाप्त करने का संकल्प लिया। इस सम्मेलन में आपने सभी धर्मा एवं जाति के लोगों को इकट्ठा किया था। जिसका पूर्ण श्रेय आपको ही है। इस महासम्मेलन के आप सूत्रधार कहलाये। तभी से लेकर जीवन भर आपने जाति, वर्ग के भेदभाव मिटाने का कार्य किया।

सन् 1940 के मन्दसौर की होली आन्दोलन में आप प्रमुख नेता के रुप में उभर कर आए और आपने फिर मन्दसौर में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता की भूमिका का निर्वहन करते हुए मन्दसौर की प्रगति में भरपूर योगदान दिया। कई बार आपको धन दौलत का लालच भी दिया गया परन्तु सत्यवादी, गांधीवादी, श्री मारु जी जनता के साथ धोखा कैसे कर सकते? आप अपने फैसले पर हमेशा अटल रहे, विचलीत नहीं हुए और निष्पक्ष बने रहे। सदैव सत्य का सहारा लिया और अहिंसा के द्वारा ही कार्या को पूर्ण किया। इस तरह मन्दसौर के हर आन्दोलन में आपका सक्रिय योगदान रहा तथा आपकी लोकप्रियता बढ़ती गई। मन्दसौर में ऐसा व्यक्ति जिसे सभी जानते और बाबूजी के नाम से पुकारे जाते।

सन् 1942 के ‘नमक आन्दोलन’ मेंआपने जमकर हिस्सा लिया। इसी समय अपने भतिजे की शादी की पर्वाह न करते हुए जेल जाना मंजूर किया। यह सब देखकर मन्दसौर की जनता अचम्भित रह गई कि ऐसे देशभक्त का स्वागत, अभिनन्दन करने के लिए अपार जनसमूह का सैलाब उमड़ पड़ा और आपके सर्वप्रिय नेता मान लिया।

सन् 1945 मेंसड़े अनाज के आन्दोलन में उग्र रुप धारण कर लिया था, जिसके फलस्वरुप आपको तीन माह बीस दिन (दिनांक 7.4.1945 से 27.7.1945) की भेरुगढ़ जेल भुगतनी पड़ी। तब आपके परिवार पर काफी संकट था, परन्तु मारु जी ने हर संकट का डटकर मुकाबला किया और पिछे मुड़कर नहीं देखा। वे अपने इरादे के पक्के और जिस कार्य को हाथ में लेते, उसे पूर्ण करना ही उनका ध्येय रहता; यह जिद्द उनकी कार्य के प्रति पूर्णता की मरणोपरान्त रही। बाद में हाइकोर्ट द्वारा आपको जेल से छोड़ा गया, तो पूरा मन्दसौर उन्हे देखने उमड़ पड़ा।

25 जुलाई 1945 को सार्वजनिक संगठन की ओर से टिहरी पर शहीद देव सुमन के बलिदान दिवस पर शिवना नदी के तट पर मेले में आयोजित स्मृति कार्यक्रम के अवसर पर श्री चांदमलजी मारु एवं श्रीमदनलाल जी दलाल का जेल से रिहा होने पर भावभीना स्वागत किया गया एवं विशाल जुलूस निकाला गया।

सन् 1946 में आपने अपने धर्म गुरु के नाम की लौ जलाने हेतु समाज के लोगों को , नेताओं को, सामाजिक कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर अखिल भारतीय जैन दिवाकर संगठन समिति की नींव डाली और संस्थापक के रुप में महामंत्री चुने गये जो जीवन पर्यन्त रहे। अखिल भारतवर्षय स्थानकवासी जैन श्वोताम्बर कान्फ्रेन्स में सन् 1947 में तेजस्वी नेता के रुप में उभरे और जैन कान्फ्रेन्स में जैन दिवाकर संगठन समिति का वर्चस्व स्थापित किया।

सन् 1949 में आप भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु के बहुत निकट हो गये और आपने पं. नेहरु को जैन कान्फ्रेन्स के कार्यो से अवगत कराया और मुनि सुशील कुमार जी महाराज सा. के साथ सर्वधर्म सम्मेलन का विश्व स्तरीय आयोजन दिल्ली में करवाया। इस सम्मेलन से आप पं. नेहरु के निकटतम हो गये थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा अहिंसा के कार्या में, दलितों के पुर्नउद्धार में, आप हमेशा अग्रणी रहें। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से भी आपका आत्मीय सम्बन्ध रहा।

आपने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी के साथ 15 दिनों तक देश में कई जगहों की यात्राएँ की और देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने, धर्म निरपेक्षता की भावनाओं से ओत-प्रोत तेजस्वी भाषण दिए। देश के प्रमुख नेताओं में आप श्री गुलजारी लाल नन्दा, श्री अशोक मेहता, श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित, श्री नीलम संजीव रेड्डी, श्री यू.एन. ढ़ेबर अन्य कई चोंटी के नेताओं से आपका जीवन-पर्यन्त बराबर सम्बन्ध रहा। अपने प्रदेश के कार्या में भी श्री मारु जी पिछे नहीं रहे चाहे वह कार्य गांधी सागर (चम्बल डेम) योजना का हो या विधान सभा का हो, जल समस्या का हो अथवा रोजगार का हो, सभी विकास के कार्या में आपका योगदान रहा। कार्य चाहे कांग्रेस का हो या जैन समाज का हो अथवा अन्य कोई सामाजिक कार्य हो सदैव अग्रणी रहे, तत्पर रहे। सार्वजनिक कार्या के प्रति आपकी काफी रुचि रही। डॉ. कैलाशनाथ जी काटजू के विचारों से आप अत्यधिक प्रभावित रहे और डॉ. काटजू भी मारु जी को हमेशा सम्मान देते रहे। श्री मारुज जी, डॉ. काटजू के साथ प्रदेश हेतु बहुत कुछ करना चाहते थे, परन्तु डॉ. काटजू का अकस्मात देहावसान हो जाने से बहुत धक्का लगा। तत्पश्चात् आपने प्रदेश की राजनीति में बाबू तरन्तमल जी जैन को उतारा, जो कि एक ईमानदार, कर्मठ कार्यकर्ता एवं अग्रणी नेता के रुप में प्रदेश कांग्रेस में उतरे थे। मारु जी ने बाबू तरन्तमल जी जैन को विधानसभा हेतु मन्दसौर से खड़ा करवाया, लेकिन मन्दसौर के भाग्य में यह नहीं हुआ, इसी दौरान पं. नेहरु के देश की प्रगति हेतु सुझाये गये कार्या को घर-घर पहुंचाने का कार्य एक दल को सौंपा गया जिसमें आपके साथ प्रकाशचन्द्र जी सेठी, मोहनलाल सुखाड़िया सहित कई नेता सम्मिलित हुआ और मारुजी के नेतृत्व में इस दल ने पूरे प्रदेश में कांग्रेस की एक ऐसी अलख जगाई। मारु जी ने अपने बल और हिम्मत के साथ मतदाताओं के नाम से पीटीशन लड़ा लेकिन दुर्भाग्य ही कहिये कि बाबू तरन्तमल जी जैन ने मन्दसौर से खड़ा होने से मना कर दिया। श्री प्रकाशचन्द्र सेठी, श्री मारु जी की इस अप्रत्याशित जीत से बहुत ही प्रभावित हुए और कांग्रेस का एक वफादार सैनिक निरुपित किया। तथा देश की स्वतंत्रता की 25 वीं वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1973 को स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान हेतु राज्य की ओर से प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का सम्मान-पत्र देने तात्कालिन मुख्यमंत्री श्री सेठी जी स्वयं श्री मारुजी के घर पर आए और उन्हे सम्मानित किया।

लेकिन ऐसे साधुवादी गुणों के धनी, सरल, स्वाभावी, सभी के प्रति स्नेह, बड़ों के प्रति सम्मान, मन्दसौर का एक मात्र सर्वप्रिय नेता श्री चान्दमल मारु को भी काल के गर्त ने दिनांक 13 अगस्त 1982 को अपनी नींद में सुला दिया। दशपुर माटी के लाल की मृत्यु समाचार सुनकर सारे मन्दसौर के नगरवासी घनघोर बारीश में उनकी अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने के लिए नम आँखों से दौड़ पड़े। इन्द्र देवता भी अपने सुश्रावक के स्वर्गारोहण पर भरपूर बरस पड़े और इधर श्री मारु जी की शोक श्रृद्धांजली सभा 5 घण्टे तक चलती रही, लोग अपने नेता को अश्रुपूरीत श्रृद्धांजली देते-देते अथक भाव से नम आँखों से, उदास मन से अंतिम बिदाई दी। यही थी एक सच्चे, सरल, नेता को भावमिनी श्रृद्धांजली।

लेखक : मांगीलाल गुप्ता (सेवा निवृत्त प्राचार्य) रामटेकरी, मन्दसौर मो.नं. 9826012482