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मतदाता मौन, जीतेगा कौन – उम्मीदवार बेचैन!

मंदसौर। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। ऐसे में सभी राजनैतिक दलों की निगाहें इन दिनों इसी प्रदेश पर टिकी हुई हैं। वहीं हर प्रत्याशी लगातार अपने प्रचार के माध्यम से मतदाताओं का मन मोह लेने की पूरी कोशिशों में जुटा हुआ है। इसके बावजूद मतदाताओं का मौन यानि चुप्पी लगातार उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ा रहीं हैं।

अभी क्षेत्र की जो राजनीतिक स्थिति है, उसमें किसी भी दल की कोई एकतरफा लहर चलती दिखाई नहीं दे रही है। इसके चलते प्रत्याशी जातीय समीकरण के सहारे चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं। आगामी 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है। सभी प्रत्याशी अपने अपने स्तर से चुनाव की तैयारियां कर रहे हैं, लेकिन इस बार के चुनाव कुछ अलग तरीके के नजर आ रहे हैं। इस बार क्षेत्र में किसी भी दल की कोई एकतरफा लहर नजर नहीं आ रही। इसके चलते प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को जीत के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। वहीं मतदाताओं ने चुप्पी साध रखी है, जिससे यह साफ नहीं हो पा रहा है कि आखिर चुनाव में किस दल की स्थिति ज्यादा बेहतर है।

विधानसभा का चुनावी संग्राम अब अंतिम दौर में पहुंच गया है। सोमवार शाम प्रचार का शोरगुल भी समाप्त हो गया। आखिरी दिन सभी प्रमुख दलों ने जिले के नगरीय क्षेत्रों में अपना दम दिखाने की कोशिश की। 20 दिनों से गांव-गांव की खाक छान रहे उम्मीदवारों व उनके रणनीतिकारों ने हवा का रुख पढ़ने की जो कोशिश की है, उससे सभी की सांस ऊपर-नीचे हो रही है। चुप्पी साधकर बैठे मतदाता ने इस बार जनसंपर्क पर आए हर उम्मीदवार को एक समान सम्मान दिया है। इस बार न तो 1998 जैसा महंगे प्याज का सवाल खड़ा है और न ही 2003 जैसी भगवा लहर है और न ही 2013 की मोदी लहर चल रही है। मोदी की सभा होने के बाद भी जिले के चारों भाजपा प्रत्याशी भी अपनी जीत तय मानकर नहीं चल रहे हैं। मतदाताओं का मिजाज इस बार अप्रत्याशित परिणाम भी दे सकता है।

कांग्रेस प्रत्याशी जिले में 6 जून 18 को पिपलियामंडी में हुई राहुल गांधी की सभा के बाद बने माहौल और उसके बाद अभी कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की दो सभाओं व भाजपा प्रत्याशी मंदसौर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में आई भीड़ के सहारे ही अपनी नैया पार लगने के दावे कर रहे हैं। इस बार मंदसौर व मल्हारगढ़ में सीधा मुकाबला है तो गरोठ में चतुष्कोणीय, सुवासरा में त्रिकोणीय मुकाबला है। मतदाताओं की चुप्पी भी एक बड़ा कारण है कि कोई भी उम्मीदवार सहज ही नहीं दिख रहा है।

 

मंदसौर में नहीं रहा एकतरफा मुकाबला

मंदसौर विधानसभा से भाजपा से वर्तमान विधायक यशपालसिंह सिसौदिया व कांग्रेस से पूर्व मंत्री नरेंद्र नाहटा हैं। इस बार पिछले दो चुनाव की तरह कोई दमदार बागी मैदान में नहीं है तो सपाक्स भी ताल ठोक रही है। शुरुआत में एकतरफा मुकाबला बता रहे चुनावी पंडित बदलती परिस्थितियों में किसी की भी जीत का दावा नहीं कर रहे हैं। हालांकि उम्मीदवारों ने इस मुकाबले को धर्म से जोड़ने की कई कोशिशें की हैं। भाजपा प्रत्याशी का मुख्य मुद्दा शिवराजसिंह चौहान का कार्यकाल है तो कांग्रेस प्रत्याशी इसी कार्यकाल में प्रदेश की बदहाली बताने के साथ ही मंदसौर के स्थानीय मुद्दों तेलिया तालाब, सरकारी जमीनों, नालों पर कब्जों को लेकर लगातार आक्रामक है। सपाक्स प्रत्याशी को अंदर ही अंदर मिल रहा सवर्णों व सरकारी कर्मचारियों का समर्थन सबसे ज्यादा चौंका सकता है। पूरे विधानसभा क्षेत्र की खाक छान चुके उम्मीदवार भी अहसास कर रहे हैं कि मुकाबला एकतरफा नहीं रहा है।

 

मल्हारगढ़ में नए नवेले के सामने अनुभवी मुश्किल में

2008 के विधानसभा चुनाव में अस्तित्व में आई मल्हारगढ़ (अजा) सीट पर मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस में ही है। भाजपा से पूर्व मंत्री जगदीश देवड़ा व कांग्रेस से नए नवेले परशुराम सिसौदिया लड़ रहे हैं। शुरुआती दौर में देवड़ा की जीत तय मानी जा रही थी, पर गांव-गांव में परशुराम को मिले जनसमर्थन ने भाजपा की नींद उड़ा दी है। पूर्व मंत्री के मैनेजमेंट के जवाब में सांसद मीनाक्षी नटराजन ने भी अपने खास लोगों की टीम को पूरे विधानसभा में उतारा था। शिवराजसिंह की सभा के जवाब में इस क्षेत्र में ज्योतिरादित्य की सभा हो चुकी है और नगमा का रोड शो भी हुआ है। अभी तक बने हालातों को देखें तो मुकाबला बिलकुल बराबरी पर है। मतदाताओं की चुप्पी टूटने का इंतजार दोनों दल कर रहे हैं।

 

सुवासरा में बागी ने मचा रखी है खलबली

सीतामऊ विधायक नानालाल पाटीदार ने अपनी सेवानिवृत्ति पर 2008 में पुत्र राधेश्याम पाटीदार को भाजपा से टिकट दिलाया था। 2013 में भाजपाजनों ने ही भारी विरोध कर पाटीदार को हरा दिया था। और संभाग में कांग्रेस को यही एकमात्र सीट मिली थी। भाजपा ने अब फिर से पाटीदार को टिकट दे दिया है। तो वंशवाद को लेकर चली कलह फिर से भाजपाईयों की जबान पर आ गई है। राधेश्याम पाटीदार को भाजपा में अंदरुनी व कांग्रेस से बाहरी संघर्ष करना पड़ रहा है। तो कांग्रेस के बागी ओमसिंह भाटी ने भी दोनों ही दलों के बीच खलबली मचा रखी है। इसके अलावा सपाक्स से उतरे पूर्व शिवसेना नेता सुनील शर्मा भी ताल तो ठोक ही रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी विधायक डंग को भी खासी मेहनत करना पड़ रही है। पोरवाल समाज द्वारा टिकट देने की मांग को दोनों दलों द्वारा तवज्जों नहीं देने से समाज में थोड़ी नाराजगी है।

 

गरोठ में बना टक्कर का माहौल

गरोठ विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस से पूर्व मंत्री सुभाष सोजतिया व भाजपा से देवीलाल धाकड़ मैदान में हैं। महज ढाई साल के कार्यकाल में ही टिकट कटने से नाराज विधायक चंदरसिंह सिसौदिया को मनाने के लिए संगठन ने फिलहाल उन्हें कार्यकारी जिलाध्यक्ष बना दिया है। पर इसके बाद भी वह सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। इसके अलावा गरोठ के कुछ भाजपा पदाधिकारी भी धाकड़ के पक्ष में मुंह दिखाई की रस्म अदा कर रहे हैं। इधर भाजपा के बागी अमरलाल मीणा और कांग्रेस के बागी तूफानसिंह सिसौदिया को अंदर ही अंदर एक-दूसरे दलों का सहयोग भी मिलने की खबर हैं। इससे पूरा गणित ही गड़बड़ाया हुआ है। वहीं क्षेत्र में मतदाता पूरी तरह मौन है। कई जगह एक ही घर में दोनों प्रमुख प्रत्याशियों का स्वागत भी इस तरह किया जा रहा है कि परिणाम के लिए ईवीएम खुलने का ही इंतजार करना पड़ेगा।

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