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मन्‍दसौर का इतिहास

मन्‍दसौर भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है। मन्‍दसौर का प्राचिन नाम दशपुर था ! पुरातात्विक और ऐतिहासिक विरासत को संजोए उत्तरी मध्य प्रदेश का मन्‍दसौर एक ऐतिहासिक जिला है। यह 5530 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। आजादी के पहले यह ग्वालियर रियासत का हिस्सा था। मन्‍दसौर हिन्दू और जैन मंदिरों के लिए खासा लोकप्रिय है। पशुपतिनाथ मंदिर, बाही पार्शवनाथ जैन मंदिर और गांधी सागर बांध यहां के मुख्य दर्शनीय स्थल हैं। इस जिले में अफीम का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। मन्‍दसौर राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कोटा, भीलवाड़ा, झालावाड़ और मध्य प्रदेश के नीमच व रतलाम जिलों से घिरा हुआ है।

अफीम की खेती के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध इस नगर का प्राचीन नाम दशपुर है जो गौरवमय इतिहास का धनी है। मन्‍दसौर शिवना नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित प्राचीन ताम्राश्‍मयुगीन टीले पर बसा है। प्रख्‍यात पुरातत्‍ववेत्ता डॉ. विष्‍णु श्रीधर वाकणकर ‘पद्म श्री’ (1919 ** 1988) के अनुसार नगर की स्थापना ताम्रकाल 2000 ई. पूर्व में हो चुकी थी। इस नगर को 5 वीं – 6 ठी शबाब्‍दी में महान औलिकर सम्राटों के साम्राज्‍य की राजधानी होने का सौभाग्‍य मिला है। 7 वीं शबाब्‍दी से 14 वीं शताब्‍दी तक दशपुर का इतिहास अन्‍धकारमय व अटकलों पर ही टिका है।
अभिलैखिक साक्ष्‍यों के आधार पर ईसा से लगभग 200 वर्ष पहले इस नगर का नामकरण ‘दशपुर’ के रूप में हो चुका था। प्राचीन ‘दशपुर’ के एतिहासिक व साहित्यिक प्रमाण अनुपलब्‍ध है लेकिन अभिलैखिक साक्ष्‍यों की कमी नहीं है। मत्‍स्‍यमहापुराण में इसे ‘दशपुर’ तथा कुमारगुप्‍त प्रथम व बन्‍धुवर्मन के अभिलेख में ‘पश्चिमपुर’ कहा गया है। मन्‍दसौर के प्राचीन नाम दशपुर का उल्‍लेख प्राचीन साहित्‍य एवं अभिलेख दोंनों में मिलता हैं। अभिलेखों में दशपुर का सर्वप्रथम उल्‍लेख द्वितीय शताब्‍दी ई.पू. के अवंलेश्‍वर स्‍तम्‍भ लेख में हैं तत्‍पश्‍चात् क्षहरावंशीय नहपान के जमाता (दामाद) उषवदात् के नासिक गुहा अभिलेख में दशपुर की गणना भ्रगुकच्‍छ, सूर्पारक प्रभास तथा गोवर्धन पर्वतों के साथ की गई हैं। साथ ही इस अभिलेख में यह भी उल्‍लेख हैं कि नहपान ने दशपुर में धर्मशालाऍ, उद्यान एवं तालाब निमार्ण के लोकापयोगी कार्य किये। इसके अतिरिक्‍त दशपुर जनपद से प्राप्‍त अभिलेखों में भी दशपुर का नामोल्‍लेख मिलता हैं । कुमार गुप्‍त प्रथम तथा बन्‍धुवर्मा के अभिलेखों में दशपुर नगर को पश्चिमपुरम् कहा गया हैं । वत्‍सभट्टि ने अपनी प्रशिस्‍त में दशपुर नगर का सुन्‍दर वर्णन करते हुए इसे मालवा का शिरोभूषण कहा गया हैं । महाराज गौरी के आधित्‍यवर्धनकालीन खण्डित अभिलेखों में दशपुर को दसादिकपूरम् कहा गया हैं । दशपुर नगर से ही प्राप्‍त कुमारवर्मा के खण्डित अभिलेख में दशपुर का नाम दशाहवयपुर उल्‍लेखित हैं । साहित्‍य में दशपुर नाम का उल्‍लेख स्‍कंदपुराण, मार्कण्‍डेपुराण, मेघधुत, राजतरंगिणी, कादम्‍बरी, वृहत्‍तसंहिता, अमरकोष, के साथ जैन साहित्‍य और बौघ्‍द साहित्‍य में भी मिलता हैं। स्‍कंदपुराण में इस क्षेत्र को दशारण्‍य कहा गया हैं। मार्कण्‍डेपुराण में दशपुर की गणना आभीर, अवन्ति तथा आकर के साथ की गई हैं। महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिघ्‍द ग्रंथ मेघदूत में उल्‍लेख किया हैं। वे मेघ को को अपनी नगरी अलका की ओर जाने का मार्ग बताते हुये रामिगिरी से विदिशा व उज्जियनी जाते हुए विशेष रूप से दशपुर जाने को कहता हैं, जहॉ की रमणियों के नेत्रों के सौन्‍दर्य का वर्णन कालिदास की लेखिनी ने इन शब्‍दों में किया हैं-

‘तामुत्‍तीर्य व्रज परिचित भूलताविभ्रमाणां,पक्ष्‍मोत्‍क्षेपादुपरि विलसतकृष्‍णसार प्रभाणाम्।
कुन्‍दक्षेपानुगमधुकर श्रीमुषामात्‍म् बिम्‍बं,पात्रीकुर्वन् दशपुर वधुनैत्र कौतूहलानाम्।

( हे मेघ चम्‍बल पार कर तुम दशपुर पहुंचोगे,उस दशपुर में जहां रमणियॉ अपने कटीलें कक्षाओं से विलोकने में चतुर जानी जाती हैं, वे अपनी बरौनियॉ उठाकर तुम्‍हें निहारेंगी, तो उनके नयनों की श्‍वेत- श्‍यामप्रभा, ऐंसी लगेगीं मानों डोलते कुन्‍द- कुसुम पर मंडराते भौंरों की छटा उन्‍होनें चुरा ली हों)

 

मेघदूत में अभिवर्णित उपरोक्‍त सौन्‍दर्य वर्णन तथा अन्‍य कतिपय तथ्‍यों के आधार पर बंगाल के महामोपाध्‍याय स्‍व. हरिप्रसाद शास्‍त्री और नागपुर के डा. केदारनाथ शास्‍त्री जैसें विद्ववान को अभिमत हैं क‍वि कालीदास की जन्‍मभूमि भी यही दशपुर रही हैं। मेघदूत के टीकाकार मल्लिनाथ के अनुसार दशपुराधिपति महाराजा रन्तिदेव द्वारा यहॉ ग्‍वालम्‍भ यज्ञ किया गया । उस यज्ञ के चर्म समूह से जो सरिता प्रवाहित हुई, उसे चर्मवती (चम्‍बल) नाम दिया गया। श्‍यामल कवि द्वारा रचित पादताडिकम् में दशपुर निवासी को दाशरेक कहा गया हैं। तथा दशपुर के राजा को दाशरेकाधिपति कहा गया हैं। राजशेखर अपनी काव्‍यमीमॉसा में मध्‍यप्रदेश के कवियों को तत्‍कालीन सभी भाषाओं के पण्डित बताते हुए कहता है कि दशपुर के निवासी भूतभाषा की सेवा करते हैं। बाण्‍भटटृ ने अपनी प्रसिघ्‍द कादिम्‍बरी रचना में इस नगर को दशपुर कहा हैं, उसके अनुसार कुमार चन्‍द्रापीड वैशम्‍पायन से मिलकर इन्‍द्रा युद्ध अश्‍व पर सवार हो क्षिप्रा पार कर रातों रात तीन योजन की यात्रा कर दशपुर स्थित स्‍कन्‍धावार में पहुंचता हैं। उपरोक्‍त संस्‍कृत साहित्‍य के अतिरिक्‍त अनेक जैन ग्रंथों में दशपुर का उल्‍लेख है। इसमें जैन आगम आवश्‍यक वृत्‍ति दशवैकालिक आवश्‍यक चूर्णि उत्‍तराध्‍ययन सूत्र नन्‍दीसूत्र विविध तीर्थ कल्‍प जैन तीर्थ माला एवं त्रिष्‍ठीशलाका पुरूष चरित आदि ग्रंथ की रचना की। दशपुर नगर में ही आर्य रक्षित सूरी ने जैन आगमों को धर्म कथानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्‍यानुयोग, गणितानुयोग नामक चार अनुयोगों में विभक्‍त किया जिससे आगमों की दुरूहता कम हुई और सहजता से सार ग्रहण किया जाने लगा। इस प्रकार दशपुर का उल्‍लेख जैन तीर्थ के रूप में होता है। संवत् 1561 में साण्‍डेर सूरी द्वारा रचित ललिता चरित में भी दशपुर का वर्णन मिलता है। यद्यपि बौद्ध साहित्‍य में दशपुर नाम का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं मिलता है किन्‍तु हेनसांग का मानना है कि मालवा में लगभग 100 संघाराम थे जिनमें सहस्‍त्र भिक्षु विद्यमान थे। आज भी यहॉं विद्यमान बौद्ध गुफाऍं व शैलोत्‍कीर्ण विहार तथा स्‍तूप इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के तत्‍कालीन अस्‍तित्‍व के साक्षी है। मन्‍दसौर के मूल नाम दशपुर के उद्भव के विषय में अनेक मत प्रचलित है। तारीख ए मालवा के लेखक मुंशी सईद करीम अली मीर मुंशी के अनुसार इस नगर को पहले रामचन्‍द्र अवतार के पिता राजा दशरथ ने बसाया था तथा इसका नाम दशरथपुरी रखा। अनुश्रुतियों के अनुसार भी राजा दशरथ के नाम पर इस पगर का नाम दशपुर पड़ा। ऐसा माना जाता है कि मन्‍दसौर के नजदीक श्रवण नाले के किनारे दशरथ के बाण से अंधे माता पिता की एकमात्र संतान श्रवण कुमार की मृत्‍यु हुई थी। यहाँ खंडित तोरणद्वार के एक स्‍तम्‍भ प‍र स्‍त्री पुरूष एवं बालक की आकृति उत्‍कीर्ण है इसे श्रवण व उसके अंधे माता पिता माना गया है। जैन आगम आवश्‍यक सुत्र की चुर्णि नियुक्ति और वृत्ति के अनुसार भगवान महावीर के समय सिन्‍धु सोवीर देश के भीतभयपुर पतन के राजा उदयन के यहॉ महावीर स्‍वामी (जीवंत स्‍वामी) की एक प्रतिमा थी। राजा उदयन एवं उसकी रानी प्रभावती उस प्रतिमा की पूजा करते थे। प्रभावती की मृत्‍यु के पश्‍चात इस प्रतिमा की पुजा का कार्य देवदत्‍ता नामक दासी को सौंपा गया। देवदत्‍ता का उज्‍जयिनी के राजा चण्‍डप्रद्योत से प्रेम हो गया। फलत: चण्‍डप्रद्योत ने वैसी ही दूसरी प्रतिमा बनाकर वहाँ रख दी एवं मूल प्रतिमा व दासी को अपने साथ ले गया। जब राजा उदयन को दासी व प्रतिमा के अपहरण की बात ज्ञात हुई तो उसने दस अन्‍य राजाओं के साथ चण्‍डप्रद्योत का पीछा किया और उसे पकड कर अपने साथ कैद काके ले आया। रास्‍ते में वर्षा ऋतु आ जाने से उदयन राजा को एक जंगल में पडाव डालना पड़ा। सुरक्षा के लिए उसके साथी राजाओं ने मिटृटी के दस किले बनाकर अपना अपना पड़ाव उसमें डाल दिया । इस तरह दस छोटे-छोटे पुर बस जाने से इस स्‍थान का नाम दशपुर प्रसिद्ध हो गया। जिसे प्राकृत भाषा में दस उर कहते हैं यही आगे चलकर दसौर हुआ तथा कालान्‍तर में समीप ही मड नामक स्‍थान से संबद्ध होने के फलस्‍वरूप मड दसौर हुआ तथा परिमार्जन के पश्‍चात् परिष्‍कृत होकर मन्‍दसौर हो गया। इससे यह स्‍पष्‍ट है कि दशपुर नगर की स्‍थापना लगभग छठी शताब्‍दी ईस्‍वी पूर्व में हो गई थी। फ्लीट के अनुसार दस मोहल्‍ले के एकीकरण के पश्‍चात् इस नगर का नाम दशपुर पडा, जो पुरा कहलाते है। जिनके नाम इस प्रकार है खानपुरा, खाजपुरा, खिलचीपुरा, चन्‍द्रपुरा, मदारपुरा, नरसिंहपुरा, कागदीपुरा, जगतपुरा, डिब्‍बीपुरा व नयापुरा। इस नगर की उत्‍पत्ति के विषय में तारीख-ए-मालवा में उल्‍लेखित कथा के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने इस नगर को पुन: बसाया था। जब यह नगर आबाद हुआ तो गुजरात का माल यहाँ आकर बिकने लगा और यह दिसावर अर्थात् दूसरा देश नाम से प्रसिद्ध हो गया। आगे चलकर दिसावर का दिसौर और दसौर रह गया। भगवानलाल इन्‍द्रजी के अनुसार मुस्लिम आक्रमण के फलस्‍वरूप जब दशपुर का प्रभाव मंद पड गया तो इस नगर का नाम मन्‍दसौर पड़ गया। एक मत यह भी है कि गुप्‍तकाल में यहाँ भव्‍य सुर्य मंदिर था संभवत: इसी के आधार पर मढ (मंदिर) व सौर (सूर्य) मन्‍दसौर नाम पडा है।

दशपुर ने भारतीय इतिहास व साहित्‍य के अनूठे रत्‍न दिये। शिवना के आँचल में औलिकरों के विशाल राजवंश के साम्राज्य का उदय एवं अस्‍त ही नहीं हुआ बल्कि इसके आँगन में अनेक जातियों ने निर्माण व विनाश की अंगड़ाइयाँ भी ली हैं। भारत की सीमाओं का प्राचीनतम अभिलेखिक प्रमाण दशपुर ने ही दिया है। यहाँ के मूल्‍यवान व महीन रेशमी वस्‍त्रोद्योग के लिए संसार का प्रथम विज्ञापन इसी नगर में उत्‍कीर्ण किया गया – ”(जिस प्रकार) तारूण्‍य तथा सौन्‍दर्य से युक्‍त होने पर भी तथा सुवर्णहारों, ताम्‍बूल एवं पुष्‍पों से प्रसाधन हुए होने पर भी कोई स्‍त्री कौशेय निर्मित वस्‍त्र-युग्‍म धारण किए बिना अपने प्रिय से मिलने नहीं जाती (तद्नुरूप) पृथ्‍वी का यह सम्‍पूर्ण भू भाग (मानों आवश्‍यकता से अधिक) सुस्‍पर्श, विविध वर्णों के प्रयोग से विचित्रित (तथा) नेत्र-सुखद रेशमी वस्‍त्र से अलंकृत है।
दशपुर से प्राप्त अभिलेख में वासुदेव-कृष्ण का सबसे पहला कलात्‍मक विवरण प्राप्त होता है। ‘वत्‍सभट्टी’ व ‘वासुल’ के पाषाण काव्‍यों में संस्‍कृत साहित्‍य का अनूठा रस पका। एशिया माइनर से उठी बर्बर हूणों के आक्रमण की आँधी इसी दशपुर के रणक्षेत्र में थमी, झुकी और पददलित हुई। दुर्दान्‍त हूण आक्रमणकारी तोरमाण (499-502 ई.) व इसके पुत्र मिहिरकुल (502-528 ई.) इसी नगर के शासक क्रमश: प्रकाशधर्मा व यशोधर्मा के चरणों में नतमस्‍तक हुए। प्राचीनकाल में युद्ध विजय का पहला विशाल कीर्ति-स्‍तम्‍भ पहली बार दशपुर में ही बना।
यहाँ के अभिलेखों में गगनचुम्‍बी इमारतों व मेघों को रोकने वाले उच्‍च शिखरयुक्‍त देवालयों का उल्‍लेख उस युग में मिलता है जब भारत के अन्‍य क्षेत्रों में विधाएँ अज्ञात ही थीं। महाकवि कालिदास ने अपने ‘मेघदूत’ में इस नगर का स्‍मरण कर इसे तत्‍कालीन भारत के अति महत्‍वपूर्ण नगर के रूप में रेखांकित किया है। प्रकाशधर्मा की रिंस्‍थल प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि कोई 1500 वर्ष पूर्व यहाँ का प्रकाशेश्‍वर नामक शिवालय सम्‍पूर्ण भारतवर्ष में प्रख्‍यात था।
प्राचीनकाल में युद्ध विजय का पहला विशाल कीर्ति स्‍तंभ पहली बार दशपुर में ही बना। सम्राट यशोधर्मन द्वारा स्‍थापित दो अभिलिखित कीर्ति स्‍तंभ यहाँ सौंधनी में विद्यमान है। हूण शासक मिहिरकुल की पराजय के अवसर पर स्थापित कराये गए 39.3 फीट ऊँचे ये विशाल स्तंभ भारत के प्राचीनतम कीर्ति स्तंभ है।
पुराने लोगों की मान्‍यता है कि लंका नरेश रावण का विवाह मंदोदरी से हुआ था ओर नामदेव समाज के बंधुओं ने मंदोदरी को अपनी बहन स्‍वीकार किया था इसलिए आज भी मन्‍दसौर खानपुरा क्षेत्र में रावण स‍जीव प्रतिमा है व नामदेव समाज के बंधु इस प्रतिमा की पूजा आर्चना करते है।
शैवधर्म का केन्द्र यह प्रख्यात यह नगर दशपुर मुस्लिम काल में मन्‍दसौर के नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान में यहाँ के अष्‍टमुखी पशुपतिनाथ मंदिर ने राष्‍ट्रीय सीमाओं को पारकर विश्‍व में अपनी पहचान बना ली है। मन्‍दसौर का पुरातत्त्व संग्रहालय मन्‍दसौर के इतिहास की खान व जीता जागता प्रमाण है। हम सभी दशपुर (मन्‍दसौर) प्रेमियों का यह कर्तव्‍य बनता है कि हम मन्‍दसौर की पुरातत्त्व सम्‍पदा की रक्षा कर शहर के इतिहास को आने वाली पीढीयों के लिए सुरक्षित रखे।
मन्‍दसौर क्षेत्र के नागरिको ने शहजादा फिराज के नेतृत्‍व में 1857 के स्‍वतंत्रता सग्राम में अंग्रेजो से तीन दिन तक सघर्ष किया । जिसमें अंग्रेज अधिकारी रेडमेन गुराडिया में मारा गया। मराठा शासनकाल में मन्‍दसौर सहित इस जिले का कुछ भाग ग्‍वालियर के सिधियां शासको के शासनकाल में रहा तो कुछ भाग होल्‍कर शासको के अधीन रहा, सीतामउ स्‍वतंत्र रियासत थी। मन्‍दसौर नगर का द्रुतगति से विकास सिधिंया के शासनकाल में हुआ । इन्‍होने अनेक भवन, सडके, जल व्‍यवस्‍था तथा नगर पालिका की स्‍थापना करके विकास के ढांचे को संरचना प्रदान की।

निर्माण: देश की आजादी के पूर्व मन्‍दसौर ग्‍वालियर रियासत का एक जिला था । इसमें मन्‍दसौर, सुवासरा, नीमच, सिंगोली व गंगापुर नामक पाँच तहसीलें थी । सन् 1934 में जिले की आबादी 15,386 थीं ।
15 अगस्‍त, 1947 को भारत की आजादी के बाद मध्‍य भारत की 22 रियासतों के प्रमुख राजाओं ने 22 अप्रैल, 1948 को मध्‍य भारत प्रांत का निर्माण किया गया । मन्‍दसौर, मध्‍यभारत का एक प्रमुख जिला रहा । तब इसमें सुनेल टप्‍पा सम्मिलित था । मध्‍य भारत में तीन डिवीजन ग्‍वालियर, उज्‍जैन व इन्‍दौर थे । उज्‍जैन डिवीजन में छ: जिले थे । इनमें सबसे बड़ा मन्‍दसौर जिला था ।
इस जिले का निर्माण पूर्व ग्‍वालियर राज्‍य के मन्‍दसौर जिले, इन्‍दौर राज्‍य के रामपुरा-भानपुरा जिले (गरोठ, नन्‍दवई, भानपुरा, सुनेल, मनासा, रामपुरा) भूतपूर्व सीतामऊ राज्‍य और जावरा राज्‍य की संजीत एवं मल्‍हारगढ़ तहसीलों से मिलकर हुआ था । इस जिले में 3 उपमण्‍डल, 8 तहसीलें, 4 टप्‍पे, 12 कस्‍बे, 1673 आबादी और 211 वीरान ग्राम थे । जिले में 11 नगरपालिकाएँ थीं ।
मध्‍य भारत का अस्तित्‍व 31 अक्‍टूबर 1956 तक रहा । इसके बाद राज्‍य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के अनुसार मध्‍यभारत, विंध्‍यप्रदेश, भोपाल, राजस्‍थान का सिरोंज इलाका तथा पूर्व मध्‍यप्रदेश के 17 जिलों के एक नये राज्‍य का निमार्ण किया गया । यह नीवन राज्‍य मध्‍य प्रदेश कहलाया ।
मध्‍यभारत से मध्‍य प्रदेश निर्माण के दौरान पूर्व मन्‍दसौर जिले की सीमा में कुछ परिवर्तन हुआ । इन्‍दौर राज्‍य का सुनेल राजस्‍थान में विलय कर दिया गया । तत्‍कालीन मध्‍य प्रदेश में 7 कमिश्‍नरियाँ, 43 जिले व 190 तहसीलें थीं । मन्‍दसौर जिला, इन्‍दौर कमिश्‍नरी के 9 जिलों में से एक था । तत्‍कालीन इस जिले में – मन्‍दसौर, सीतामऊ, नीमच, गरोठ, मनासा, मल्‍हारगढ, भानपुरा व जावद ये आठ तहसीलें थी ।
इस जिले की उत्‍तर से दक्षिण तक की लम्‍बाई लगभग 132 कि.मी. थी । पश्चिम से पूर्व तक की चौड़ाई लगभग 114 कि.मी. थी । जिले का कुल क्षेत्रफल 10271 वर्ग कि.मी. था । जिले में 18 शहर तथा 1761 ग्राम थे । कृषि जोतों की संख्‍या 99 हजार थी ।
सन् 1983 ई. में म.प्र. के 45 जिलों में से 14 बड़े जिलों को विभाजित करके 16 नवीन जिलों के गठन की योजना बानई गई । आपत्तियों के कारण यह योजना 30 जून 1999 को लागू हुई । दिनांक 6 जुलाई को नीमच, जावद, मनासा तहसील से नवीन नीमच जिले का जन्‍म हुआ ।