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महामण्डलेश्वर श्री अनन्तदेवगिरीजी महाराज की धर्मसभा केशव सत्संग भवन में

दोहरे चरित्र से द्वेष-दुर्गुण-दुराचार में हो रही वृद्धि – स्वामी श्री अनन्तदेवगिरीजी महाराज

मन्दसौर। हालात बिगड़ रहे हैं न हम अपने को जान रहे, न अपने धर्म को, न अपने धर्मशास्त्रों को और न अपने कर्तव्य को। बहुसंख्या समाज का दोहरा चरित्र ही नजर आ रहा है। फलस्वरूप द्वेष-दुर्गुण और दुराचार में वृद्धि हो रही है। यह कहा महामण्डलेश्वर, श्री वामदेव ज्योर्तिमठ वृन्दावन के प्रमुख स्वामी श्री अनन्तदेवगिरीजी महाराज ने। आप केशव सत्संग भवन खानपुरा में गीता ज्ञान यज्ञ महोत्सव में धर्मसभा संबोधित कर रहे थे।
स्वामी श्री अनन्तदेव गिरीजी महाराज ने कहा कि मुगल काल का शासन रहा हो या ओपनिवेषिक ब्रिटीश साम्राज्य, तलवार लटकती रही तब भी देश की अस्मिता, संस्कृति, धर्म-अध्यात्म, संस्कार और स्वाध्याय बचा रहा परन्तु आज तो हम स्वतंत्र है फिर भी अपने स्वधर्म-कर्तव्य का पालन नहीं कर पा रहे। यह विडम्बना है कि हम धर्मों-मत-मजहब में, जाति-सम्प्रदायों, ऊँच-नीच के भावों में बंटते जा रहे है। इस विकार को समाज को, सन्त-महात्मा-आचार्यों को, जनप्रतिनिधियों को, मिलकर दूर करना चाहिये। स्वामीजी ने गीता के बारहवें अध्याय के भक्ति योग की व्याख्या में कहा कि समय की मांग है कि निज भक्ति नहीं, राष्ट्र भक्ति और सबको समान मानकर आचरण-व्यवहार करना होगा।
ईश्वरी सत्ता को स्वीकार करें, सबमें ईश्वर विद्यमान हैं यह व्यवहार में लाये बिना मनुष्य की गति नहीं है। आपने कहा कि आस्था भी मनमानें ढंग से हो रही, भक्ति का स्वरूप प्रदर्शन प्रियता से जुड़कर स्वयं को स्थापित करने के लिये हो रहा है। ये कतई अच्छे लक्षण नहीं है।
स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से धर्मसभा में कहा कि सम्पूर्ण विश्व में सबसे प्रमाणिक धर्मशास्त्र, चारों वेदों को माना गया है। वेद ही ईश्वर है, वेदों की ऋचाएं ही ईश्वर का संविधान है। इसे मानना ही चाहिये। इससे हम दूर होते जा रहे है। मानव जीवन के सोलह संस्कारों सहित करणीय कृत्य की व्याख्या भी इसमें स्पष्ट की गई है। गीता के 18 अध्यायों में स्वयं श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया उपदेश भी सम्पूर्ण मानव समाज के लिये है और यह कर्तव्य पालन तथा कर्म करने का संदेश महाभारत की रणभूमि में दिया गया है। अब यह जिम्मेदारी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की है। इसे जाने-समझे और व्यवहार में उतारे। हम सामान्य धर्म का पालन करते हुए कर्म करे यह भी पूजा है। स्वधर्म पालन से मानवता की रक्षा भी हो सकेगी, इसके अभाव में आडम्बर, पाखण्ड, महिमामंडन आकार ले रहा है। चिन्ता वर्तमान पीढ़ी को ही करना होगी कि हम आने वाली संतती को क्या और कैसा ज्ञान और वातावरण दे रहे है। आपने करपात्रीजी महाराज एवं स्वामी वामदेवजी महाराज के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि सच्चे संत ने सन्यास लिया है तो धर्मरक्षा के लिये अपने ज्ञान-आचरण और व्यवहार से परिवार-समाज और राष्ट्र को सावधान करते रहेंगे।
आरंभ में स्वामीजी ने ब्रह्मलीन केशव स्वरूपजी प्रतीमा पर पुष्प अर्पित किये। धर्मसभा में मंचस्थ स्वामी वेदानन्दजी, स्वामी मीतानन्दजी, स्वामी विष्णु चैतन्यजी, स्वामी लक्ष्मणानन्दजी महाराज एवं संत मण्डल विराजित थे। धर्मसभा के अंत में सामूहिक सस्वर प्रार्थना, आरती, पूजन में ब्रजेश् जोशी, दीपेश श्रीवास्तव, रमेश ब्रिजवानी, जगदीश सेठिया, सूरजमल अग्रवाल, कारूलाल सोनी डॉ. घनश्याम बटवाल,रूपनारायण जोशी, अरूण गौड़, रामगोपाल शर्मा, बंशीलाल टांक, राव विजयसिंह, कल्याणमल अग्रवाल, राधेश्याम गर्ग, ओम गर्ग, मोहनलाल पारख, डॉ. देवेन्द्र पुराणिक, राजेश तिवारी, प्रवीण देवड़ा, संतोष जोशी, रविशराय गौड़, प्रेमचंद पाटीदार, जगदीश गर्ग, गिरीश कटलाना सहित अनेक श्रद्धालु एवं माता-बहने शामिल हुए।

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